संसद का बजट सत्र में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध जारी है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ प्रविलेज मोशन (विशेषाधिकार प्रस्ताव ) नहीं बल्कि सब्सेटेंटिव मोशन लाया गया है. बीजेपी के सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ गुरुवार को लोकसभा में सब्सटेंटिव मोशन लाने की नोटिस लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को दी है.
निशिकांत दुबे ने कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ कोई प्रिविलेज मोशन नहीं है, मैंने एक सब्सटेंटिव मोशन दिया है. राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाते हुए निशिकांत दुबे ने कहा कि कांग्रेस सांसद देश को गुमराह कर रहे हैं और उनके जॉर्ज सोरोस जैसे भारत-विरोधी ताकतों से संबंध हैं. साथ ही उन्होंने राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द करने और उनके अजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग की है.
लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन की नोटिस दी गई है. 20 साल पहले 11 सांसदों की सदस्यता चली गई थी. आजतक के स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन के बाद संसद में हंगामा मच गया था और ऑपरेशन में दिखाए सांसदों को खिलाफ प्रस्ताव लाया गया था. ऐसे में सवाल यह उठता है कि राहुल गांधी के खिलाफ में लाया सब्सटेंटिव मोशन क्या हैं और इसके क्या प्रावधान है?
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निशिकांत दुबे ने राहुल पर लगाए गंभीर आरोप
निशिकांत दुबे ने लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि मैंने मैंने एक सब्सटेंटिव मोशन दिया है, उसमें मैंने ये जिक्र किया है कि कैसे राहुल गांधी सोरोस फाउंडेशन के साथ, फोर्ड फाउंडेशन के साथ, यूएसऐड के साथ मिलकर थाईलैंड जाते हैं, कंबोडिया जाते हैं, वियतनाम जाते हैं,अमेरिका जाते हैं, भारत-विरोधी ताकतों के साथ किस तरह से मिले हुए रहते हैं. राहुल गांधी लोकसभा सदस्यता रद्द हो और इन पर के जिंदगी भर के लिए चुनाव लड़ने के लिए प्रतिबंधित भी लगाया जाए.
सब्सटेंटिव मोशन क्या है और कैसे लाया जाता है
भारत की संसदीय व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों को कई तरह के विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं. इसी में से एक सब्सटेंटिव मोशन भी है, जिसे ठोस प्रस्ताव भी कहते हैं.यह प्रस्ताव किसी भी सदस्य या मंत्री द्वारा लाया जा सकता है. सब्सटेंटिव मोशन एक स्वतंत्र और औपचारिक प्रस्ताव होता है, जिसे सदन की मंजूरी के लिए पेश किया जाता है. इसका उद्देश्य किसी खास मुद्दे पर सदन की राय या फैसला प्राप्त करना होता है. आमतौर पर इस प्रस्ताव के जरिए किसी संसद के सदस्य के आचरण या आरोपों की जांच के लिए समिति गठित करने की मांग की जाती है.
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सब्सटेंटिव मोशन की नोटिस सांसदों की सदस्यता रद्द करने से लेकर राष्ट्रपति पर महाभियोग लाने या मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाने की मांग की जाती है. अब इस सब्सटेंटिव के जरिए बीजेपी निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के संसद में कथित व्यवहार की जांच के लिए समिति बनाने की मांग की है. साथ ही राहुल गांधी की सदस्यता को खत्म करने और उनके जीवनभर चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग की है.
बीजेपी सांसद की नोटिस पर अब क्या होगा?
निशिकांत दुबे के द्वारा राहुल गांधी की खिलाफ दिए गए सब्सटेंटिव मोशन को स्वीकार करना करना और नहीं लोकसभा के स्पीकर के ऊपर निर्भर करेगा. किसी भी संसद के द्वारा दिए जाने वाले सब्सटैंटिव मोशन को सदन में स्वीकार करना या अस्वीकार करना पीठासीन अधिकारी यानी लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है.
नियम के मुताबिक सबसे पहले इस प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा के महासचिव को दिया जाता है, जो संसदीय प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा होता है. यदि लोकसभा अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं और सदन में इस पर चर्चा होती है, तो इसे मतदान के लिए रखा जा सकता है. यदि सदन इस प्रस्ताव को पारित कर देता है, तो लोकसभा अध्यक्ष आरोपों की जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन कर सकते हैं.
यह समिति मामले की विस्तृत जांच करेगी और तय समयसीमा के भीतर अपनी रिपोर्ट लोकसभा में पेश करेगी. रिपोर्ट पेश होने के बाद सदन फिर से इस पर चर्चा करेगा और समिति की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार करने का फैसला करेगा. ऐसे में अगर समिति गंभीर आरोपों को सही पाती है, तो संसद सदस्यता समाप्त करने जैसी कार्रवाई भी संभव हो सकती है.
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ब्सटेंटिव मोशन के इस्तेमाल कब-कब किया गया
सब्सटेंटिव मोशन के प्रस्ताव का उपयोग जजों,सीएजी जैसे लोगों को हटाने के लिए लाया जाता रहा है. साल 1991 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी रामास्वामी के खिलाफ लोकसभा में प्रस्ताव लाया गया था. मार्च 1997 में, उस समय के लोकसभा स्पीकर पी ए संगमा ने उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हालात और उस समय के गवर्नर रोमेश भंडारी की भूमिका के बारे में विपक्षी दल बीजेपी के एक मूल प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. इस प्रस्ताव में गवर्नर को वापस बुलाने के लिए कहा गया था.
साल 2011 में कलकत्ता हाई कोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में चर्चा से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. साल 2005 में 10 लोकसभा सदस्यों और एक राज्यसभा सदस्य को कैश फॉर क्यएरी के मामले में हटाया गया था, क्योंकि आजतक के स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन के दिखाए जाने के बाद संसद में हंगामा मच गया था. इसके बाद 10 लोकसभा सांसद और एक राज्यसभा सांसद के खिलाफ यह प्रस्ताव दिया गया था और एक एथिक्स कमेटी बैठी थी, जिसमें इन सभी सांसदों को दोषी पाया गया था.
ऑपरेशन दुर्योधन से 11 सांसद की गई सदस्यता
आज तक की पड़ताल ऑपरेशन दुर्योधन में उजागर हुआ था कि कैसे संसद में सवाल पूछने के बदले सांसद सदस्य पैसे लेते हैं. आजतक ने 2005 में संसद में प्रश्न पूछने के बदले नकद राशि लेने वाले लोकसभा के 10 सांसद और एक राज्यसभा के सदस्य का पर्दाफाश किया था.. इस बात के सामने आने के बाद 11 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था और सदन ने इसी के लिए एक मोशन पास किया था.
लोकसभा स्पीकर ने ऑपरेशन दुर्योधन में नाम आने वाले सांसद सदस्यों को अगले फैसले तक सदन में न आने के निर्देश दिए थे. आरोपों की जांच के लिए पवन कुमार बंसल की अगुवाई में पांच सदस्यों की एथिक्स कमेटी बनाई थी. इसके बाद कमेटी ने पड़ताल करके अपनी रिपोर्ट 22 दिसंबर, 2005 को हाउस में रखी गई. एक दिन बाद, उस समय हाउस के लीडर प्रणब मुखर्जी ने सब्सटेंटिव मोशन पेश किया. इसके कमेटी की रिपोर्ट में पाया गया कि संसद का बर्ताव सही नहीं था. संसद में सवाल पूछने वाले सभी 11 सांसदों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी थी.
जानिए किन-किन सांसदों की गई थी सदस्यता
संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में जिन सांसद सदस्यों की सदस्यता गई है, उसमें सबसे ज्यादा बीजेपी के सांसद रहे हैं. 2005 में पैसे लेकर जिन 11 सांसदों की सदस्यता गई थी, उसमें 10 लोकसभा और एक राज्यसभा सदस्य थे. बीजेपी के 6 सांसद, बसपा के 3 सांसद. इसके अलावा कांग्रेस और आरजेडी के एक-एक सांसद थे.बीजेपी के राज्यसभा सदस्य रहे छत्रपाल सिंह लोधा को बर्ख़ास्त किया गया था तो लोकसभा सदस्य गंवाने वाले वाईजी महाजन, चंद्रपाल सिंह, अन्ना साहेबा एमके पाटिल, प्रदीप गांधी और सुरेश चंदेल थे.
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वहीं, बीएसपी के 3 लोकसभा सदस्यों को पैसे लेकर सवाल पूछने के चलते बर्खास्त किया गया था, जिनमें नरेंद्र कुमार कुशवाहा, लाल चंद्र कोल और राजा रामपाल थे. आरेजडी के मनोज कुमार और कांग्रेस रामसेवक सिंह को लोकसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी थी. उससे साल 2005 में 11 सांसदों को निष्कासन को लेकर लेकर संसद में लंबी बहस चली थी और उसके बाद मतदान हुआ तो बीजेपी ने वॉकआउट कर दिया था. ऐसे में बीजेपी की अनुपस्थिति में यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया.
कांग्रेस नेता पवन बंसल ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा था भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और पूरा देश इस मामले पर नजरें गडाए हुए है. हर निर्णय अदालत में नहीं हो सकता. हमें अन्य बातों से ऊपर उठकर सदन की गरिमा को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना चाहिए.
निष्कासित सांसदों का मामला अदालत तक पहुंचा
निष्कासन की जांच कर रही पवन बंसल समिति ने मामले से जुड़े बताए जाने वाले 11 सदस्यों को सदन से निष्कासित करने की सिफारिश की थी. इसके बाद बर्खास्त सांसदों ने अपने निष्कासन के मामले को लेकर अदालत में अर्जी लगाई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिल सकी. सुप्रीम कोर्ट ने 2007 में एक फैसले ने सांसदों को निष्कासित करने के संसद के फैसले को बरकरार रखा.
ऑपरेशन दुर्योधन की तरह ही एक दूसरे टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में देख गया था कि कुछ सांसद कैसे अपनी संसदीय निधि को खर्च करने के लिए घूस मांगते हैं. दिसंबर 2005 में यह बात सामने आई थी कि कई सांसद अपने संसदीय निधि के पैसे खर्च करने के लिए घूस लेते हैं. इसके लिए भी बंसल के अगुवाई में सात सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई थी, रिपोर्ट पेडिंग रहने तक कमेटी ने हाउस में नहीं आने के आदेश दिया था. इसके बाद स्पीकर ने उनके गलत बर्ताव के लिए संसद में फटकार लगाई थी.
कुबूल अहमद