उस्ताद साहब चले गए, अब धुन बची न लय... ताल के इस 'खाली' को कौन भर पाएगा?

तबले की ताल में तीन मुख्य चीजें हैं. सम, ताली और खाली... सम से ताल की धुन शुरू होती है, ताली... यानी बीट पर वो जगह जहां से ताल दी जाती है और खाली... बीट के बीच एक रिक्त स्थान जहां कोई ताल नहीं पड़ती और वह खाली जाती है. उस्ताद साहब के जाने से तबले और ताल में वही खाली स्थान बन गया है. अब न वहां ताल बची न लय और शायद सदियों तक होगी भी नहीं. अलविदा उस्ताद... 

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उस्ताद जाकिर हुसैन साहब के जाने से ताल की दुनिया में एक खालीपन आ गया है उस्ताद जाकिर हुसैन साहब के जाने से ताल की दुनिया में एक खालीपन आ गया है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 16 दिसंबर 2024,
  • अपडेटेड 8:43 PM IST

13वीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में दिल्ली सल्तनत का परचम बुलंद था. इतिहासकारों की नजर में ये वक्त बड़े बदलावों वाला रहा है. एक तरफ जहां आक्रांताओं की आक्रामकता हावी थी तो दूसरी तरफ इसी दौर में एक कवि मन भी था, जो भाषाओं और सभ्यताओं के गहरे समंदर से इंसानी सभ्यता के लिए अमूल्य मोती चुन रहा था. इस आदमी का नाम अमीर खुसरो था, जो खिलजी के दरबार में कवि था, गायक था, संगीतकार था और संगत करने वाले कलाकारों का कद्रदान भी. 

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अमीर खुसरो ने बनाया था तबला
कहते हैं कि उस दौरान खुसरो ने संगीत की दुनिया में बड़े ही दिलचस्प प्रयोग किए. उसने भारत की प्राचीन राग गायन शैली और वाद्य यंत्रों को बड़ी ही बारीकी से समझा. उन्हें नए स्वरूप-नए आयाम दिए और ऐसा प्रचारित-प्रसारित किया कि वह अपनी उसी प्राचीन शास्त्रीय विधा में उसी तरह रच-बस गए, जैसे कि वह युगों से उसमें ही समाए रहे हों. इन्हीं अमीर खुसरो ने ताल शास्त्र के सबसे बड़े वाद्य यंत्र पखावज को दो हिस्सों में बांटा और उसे तबले में तब्दील कर दिया. 

पखावज के परिवार से आया तबला
पखावज एक तरफ चौड़े गोलाकार हिस्से वाला और दूसरी तरफ बेहद पतले गोल हिस्से वाला वाद्ययंत्र था. जिसमें चौड़े हिस्से से धमक दी जाती थी और पतले हिस्से से ताल के मूल स्वरूप की आवाज आती है. पखावज प्राचीन भारतीय संगीत विधा का सबसे मुख्य वाद्य यंत्र रहा है. मृदंग इसका ही बदला हुआ स्वरूप है. दक्षिण भारतीय संगीत, खासकर कर्नाटिक संगीत विधा में आज भी पखावज या मृदंगम ही मुख्य वाद्य हैं, तबला नहीं. इसका उदाहरण आपको दक्षिण भारत के कई मंदिरों में होने वाले धार्मिक संगीत समारोहों में मिल जाएगा. 

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खैर, तबले पर आते हैं. अमीर खुसरो ने तबले को स्वरूप जरूर दे दिया था, बावजूद कई सालों तक यह ताल वाद्य उपेक्षित सा ही रहा, लेकिन 16-18वीं सदी के बीच उत्तर भारतीय संगीत में इसकी स्वीकार्यता बढ़ने लगी. घराना संगीत के कर्णधारों ने कथक जैसी नृत्य शैलियों में संगत के लिए इसे उपयुक्त जाना और फिर संगीत की शास्त्रीय विधा में तबले का विधि-विधान से अभिषेक हुआ. इसका ताल शास्त्र आज भी पखावज का ही है, केवल बजाने का तरीका ही थोड़ा अलग हुआ है.

तबला वादक के दोनों हाथ सीने के समांतर आ गए और इस तरह तबले की बोलों में आने वाले तिरकिट, तिट, गदिगन, क्रधा, किटधा धा, तकटित जैसे बोल और भी स्वतंत्र हो गए. फिर तो तबला ऐसा हो गया कि मानों वह सिर्फ बज नहीं रहा है, बल्कि वही गा भी रहा है. भरी महफिल में जब गायक के सुर, सितार की तान, बांसुरी की धुन और तबले की तिरकिट में फर्क करना मुश्किल हो जाए तो इसे ही तबले का जादू कहते हैं. 

       उस्ताद जाकिर हुसैन साहब को तबले की इस जादूगरी में महारत हासिल थी. 

मॉडर्न एरा की ये खूबसूरती रही कि, हमने-आपने उस्ताद साहब को जीते-जागते तबले से अलौकिक चमत्कार उत्पन्न करते देखा. उस्ताद साहब का तबला वो चकमक पत्थर था, जिस पर हथेलियों की रगड़, उंगलियों की थिरकन और बाएं हाथ की थाप वो उजाला पैदा करती थी कि इसकी रौशनी में आदम जात को अपना अतीत, वर्तमान और आने वाला कल तीनों एक साथ नजर आते थे. क्या बिजली की चमक, क्या बादलों की गड़गड़ाहट और क्या बारिश की छमछम... ऐसा लगता था कि ये सारे भाव उस्ताद साहब के तबले से ही निकल कर इस दुनिया में छाए हुए हैं. इसे महसूस करना है तो यूट्यूब पर प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया के साथ उनकी संगत सुनिए, आप शास्त्रीय विधा के कायल न भी हों, फिर भी जादू में न खो जाएं तो कहिएगा.  

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क्या है तबले का शास्त्र
वैसे तबले को आज भी प्राचीनता के लिहाज से बहुत शास्त्रीय नहीं माना जाता है, लेकिन समय के साथ और कलाकारों की अपनी साधना का असर ये रहा कि तबले के बिना शास्त्रीय संगीत की शान ही अधूरी सी लगने लगी. गायकों के साथ तो तबले ने संगत का एक अलग इतिहास रचा ही, इसके अलावा तबले ने एकल वाद्य के तौर पर भी खूब ख्याति पाई. उदाहरण में इसे ऐसे समझें कि, मान लीजिए कोई राग तीनताल में गाने के लिए निबद्ध है. 

तीनताल 16 मात्राओं की ताल है, सामान्य तौर पर इसका ठेका 'धाधिं धिंधा, धाधिं धिंधा । धातिं तिता, ताधिं धिंधा' है. अगर कोई तबला वादक किसी गायक के साथ संगत कर रहा है तो उसे इसी ठेके को लूप में बजाना होगा. बीच-बीच में वह इसी मात्रा और गति के साथ कुछ हरकतें जरूर दिखा जा सकता है, लेकिन रहना उसे इसी दायरे में होगा. वहीं जब तबला सोलो (एकल) की प्रस्तुति की बात आती है, तब तो जैसे तबला वादक को खुला आसमां, खुला मैदान मिल जाता है. तब सामने आता है तबले का असली चमत्कार, जिसे कहते हैं, कायदा, पलटा, परन, तिहाई, चक्करदार तिहाई, डेढ़गुन, दुगुन, चौगुन, अष्टगुन.

तीनताल तो महज कई तालों में से एक ताल भर है. एकताल, दीपचंदी ताल, झपताल, कहरवा ताल, दादरा, धमार, रुद्रताल और ऐसी अनेक तालों से तबले का शास्त्र भरा-पूरा और संपन्न है. हर ताल की अलग-अलग खूबी है. उसकी मात्राएं अलग हैं. उनके पलटे-कायदे, परन, टुकड़े और तिहाइयां अलग-अलग हैं और अलग है सबका जादू. मानिए कि तबला एक सागर है और उसकी हर गहराई में एक अनमोल खजाना छिपा है, एक अनमोल मोती. अब आप अंदाजा लगाइए कि उस्ताद जाकिर हुसैन इस तबला सागर के कितने गहरे गोताखोर थे.

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तबले के शास्त्र रूपी रथ पर आरूढ़ हुआ यह महारथी संगीत और संगत की दुनिया में दिग्विजय की राह पर निकला तो बांसुरी में हरि प्रसाद चौरसिया, सितार में पंडित रवि शंकर, संतूर में शिवकुमार शर्मा, नृत्य में बिरजू महाराज, गायन में बड़े गुलाम अली खां साहब और नीलाद्रि कुमार के साथ संगत की. हुसैन साहब ने संगीत की इन अमर ज्योतियों के साथ सिर्फ संगत ही नहीं कि बल्कि अपने भीतर उनकी कला, उनके मुकाम और उनकी बारीकियों को भी आत्मसात किया. अभी के दौर में आप एक पल ठहर कर सोचेंगे तो शास्त्रीय विधा के किस हुनरमंद का नाम आपको याद आएगा, शायद जोर देकर भी आप किसी सजीव आत्मा को न याद कर पाएं, ऐसे में उस्ताद जाकिर हुसैन का जाना संगीत की दुनिया में एक ऐसा शून्य बना गया गया है, जिसे किसी और से स्थानांतरित कर पाना शायद ही मुमकिन हो. 

ब्रह्मांड की आवाज है तबला
बात शून्य की आई है तो एक किस्सा याद आता है. ये बात ग्रैमी अवार्ड्स जुड़ी है. जाकिर हुसैन तब तबले के फ्यूजन पर काम कर रहे थे. अमेरिकी जैज में कई इलेक्ट्रॉनिक और आधुनिक वाद्य यंत्रों का एक साथ प्रदर्शन लहर पैदा करता है, लेकिन हुसैन साहब को हर बीट के बाद एक रिक्त स्थान सा लगता था, ऐसा कि जैसे वहां कुछ हो ही नहीं, नथिंग, लाइक जीरो...  उन्होंने ड्रम की बीट के बाद वैकेंट स्पेस को तबले की तिरकिट से भरा और ये एक शानदार जुगलबंदी बन गई. 

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एक बार वह इसी तरह के किसी समारोह में तबले की प्रस्तुति दे रहे थे, तब विदेशी कलाकारों ने तबले को नथिंग कहा था. उनका मानना था कि ड्रम से शक्तिशाली कोई वाद्य यंत्र नहीं हो सकता. हुसैन साहब ने तबले को द्रुत गति में ऐसी धमक के साथ बजाया कि उसका स्वर ड्रम को भी भेद गया. इसे सुनकर कलाकार आश्चर्य में पड़ गए. उन्होंने कहा "हम सोचते थे कि ड्रम सबसे शक्तिशाली यंत्र है, लेकिन तबले में तो ब्रह्मांड की आवाज़ है. यह अंतरिक्ष में फैलती है "  जाकिर हुसैन ने संक्षिप्त जवाब दिया, लाइक जीरो.. नथिंग.

तस्वीर फरवरी 1995 की है. पंडिर रविशंकर के साथ तबले पर संगत करते उस्ताद जाकिर हुसैन. यह कार्यक्रम राजधानी दिल्ली में हुआ था

जब पंडित रविशंकर बोले- आपका तबला तो गाता भी है 
उनकी नाचती उंगलियों के मुरीद तो पंडित रविशंकर भी थे. एक बार किसी लाइव कन्सर्ट में पंडित जी का सितार वादन था. तबले से संगत पर थे उस्ताद साहब. अब एक तरफ सितार के तारों पर पंडित जी राग हंसध्वनि को संवार रहे थे तो दूसरी तरफ उस्ताद साहब की उंगलिय़ां तबले पर थिरक रही थीं. राग हंसध्वनि तीन ताल में निबद्ध राग है. पंडित जी सितार पर इसकी तान ले रहे थे.

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इसकी बानगी देखिए
तान थी, निरेग निरेग  निरेगसा... गपग गपग गपगसा... रेपगनि पग रेग रेग रेसा ... निप निरे , पनिसा...नि रे ,पनिसा...नि रे ,पनिसा

इस तान को पंडित जी चक्करदार में ले रहे थे तो जैसे ही सम पर आते तो उस्ताद साहब के तबले से भी वैसी ही सुमेलित आवाज आती.  

धाती _धा ती धाती धातिरकिट तक ता तिरकिट तक
तिरकिट तक ता तिरकिट धाती _धा, तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा
तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा... 

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तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा, तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा
तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा...

धाती _धा ती धाती धातिरकिट तक ता तिरकिट तक
तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा, तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा
तिरकिट तक तातिरकिट धाती _धा...

अब ऐसा लगे कि मुख्य वाद्य तो तबला है, जिस पर पंडित रविशंकर सितार के साथ संगत कर रहे हैं. इसी बीच पंडित जी ने मुस्कुरा कर उस्ताद साहब की ओर देखा और उन्होंने अपने तबले के निनाद को कुछ हल्का कर लिया. कला की जादूगरी के साथ कलाकार जाकिर हुसैन साहब से विनम्रता का यह पाठ भी पढ़ सकते हैं. जब उस्ताद साहब तबला बजाते थे, तो जिस वाद्य के साथ वह संगत कर रहे होते थे, तबले के दाहिने से वह उसी वाद्य जैसा निनाद प्रकट कर देते थे. शंख की ध्वनि, बांसुरी जैसी ध्वनि, थपकी, जल तरंग, घंटा ध्वनि... उस्ताद साहब में ऐसी फनकारी थी कि वह इन सारे वाद्य यंत्रों की आवाज अपने तबले से ही निकालने का आभास करा सकते थे. पंडित रविशंकर ने एक दफा उनसे कहा भी था, 'आपका तबला तो सितार के साथ गाने ही लगता है.' बांसुरी श्रेष्ठ हरिप्रसाद चौरसिया तो मजाक में कहते थे, उस्ताद साहब का तबला बांसुरी भी बजाता है.

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घराने से निकलकर दुनिया में मशहूर हुआ तबला
जाकिर हुसैन साहब की खूबी ये रही कि उन्होंने तबले को सिर्फ दिल्ली, अजराणा, बनारस या पंजाब घराने का ही नहीं रहने दिया. उन्होंने इसे संगीत की महफिलों से निकालकर दुनिया के मंच पर पहुंचाया और कई आयामों से परिचित कराया. इसी लक्ष्य को साधकर उन्होंने ‘शक्ति’ बैंड का गठन किया था, जो जाकिर हुसैन साहब के जीवन का तो मील का पत्थर साबित हुआ ही, तबले की धमक के लिए भी महत्वपूर्ण बना.  यह बैंड भारतीय और पश्चिमी संगीत के संगम का प्रतीक बन गया. एक बार एक प्रस्तुति के दौरान, जॉन मैकलॉलिन, जिन्हें महाविष्णु नाम से भी जाना जाता है, वह भी मौजूद थे. पहले वह रॉक बैंड की प्रस्तुति सुन रहे थे, लेकिन उनके कानों में तबले की धुन अलग ही मिश्री घोल रही थी. प्रस्तुति के बाद जॉन मैकलॉलिन के विशेष अनुरोध पर उस्ताद साहब ने उन्हें अपने सोलो तबला की जादूगरी दिखाई. वह ऐसा कायल हुए कि बोल पड़े "आप विश्व में संगीत के राजदूत हो." यह घटना उनके तबला फ्यूजन की यात्रा में तो महत्वपूर्ण साबित हुई ही, साथ ही उस्ताद साहब के लिए ग्रैमी अवार्ड्स की राह भी प्रशस्त की. 
 

उस्ताद जाकिर हुसैन साहब की ग्रैमी यात्रा
जाकिर हुसैन को 1988 में पद्म श्री, 2002 में पद्म भूषण और 2023 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था, इसके साथ ही उन्होंने तीन बार ग्रैमी अवॉर्ड भी जीता था. दुनिया के सबसे सम्मानित म्यूजिक अवार्ड्स कहे जाने वाले ग्रैमी अवार्ड्स-2024 में फ्यूजन बैंड 'शक्ति' को 'बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक एल्बम' का अवॉर्ड मिला था. इस बैंड में शंकर महादेवन, जॉन मैकलॉलिन, जाकिर हुसैन, वी सेल्वागणेश और गणेश राजगोपालन जैसे दिग्गज कलाकार थे. बैंड 'शक्ति' को म्यूजिक एल्बम 'दिस मोमेंट' के लिए 66वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में 'बेस्ट ग्लोबल म्यूजिक एल्बम' कैटगरी में विनर घोषित किया गया था. बैंड ने 45 साल बाद अपना पहला एल्बम रिलीज किया था, जिसे सीधा ग्रैमी अवार्ड मिला था.

इंग्लिश गिटारिस्ट जॉन मैकलॉलिन ने 1973 में भारतीय वायलिन प्लेयर एल. शंकर, तबला वादक जाकिर हुसैन और टी.एच. 'विक्कू' विनायकराम के साथ फ्यूजन बैंड 'शक्ति' की शुरुआत की थी, लेकिन 1977 के बाद ये बैंड बहुत एक्टिव नहीं रहा. 1997 में जॉन मैकलॉलिन ने फिर से इसी कॉन्सेप्ट पर 'रिमेम्बर शक्ति' नाम से बैंड बनाया और इसमें वी. सेल्वागणेश (टी.एच. 'विक्कू' विनायकराम के बेटे), मैन्डलिन प्लेयर यू. श्रीनिवास और शंकर महादेवन को शामिल किया था. 2020 में ये बैंड फिर से साथ आया और 'शक्ति' के तौर पर इन्होने 46 साल बाद अपना पहला एल्बम 'दिस मोमेंट' रिलीज किया था.

तबले की ताल में तीन मुख्य चीजें हैं. सम, ताली और खाली... सम से ताल की धुन शुरू होती है, ताली... यानी बीट पर वो जगह जहां से ताल दी जाती है और खाली... बीट के बीच एक रिक्त स्थान जहां कोई ताल नहीं पड़ती और वह खाली जाती है. उस्ताद साहब के जाने से तबले और ताल में वही खाली स्थान बन गया है. अब न वहां ताल बची न लय और शायद सदियों तक होगी भी नहीं. अलविदा उस्ताद... 

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