पहली बार नहीं बढ़ रहीं संसद में सीटें, 1947 में 489 सीटों के लिए हुआ था चुनाव, तब से 5 बार बदल चुका नंबर

महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन को लेकर संसद में दो दिन से बहस जारी है. दक्षिण भारत के प्रतिनिधित्व में कमी की आशंका के बीच सरकार का तर्क है कि लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर लगभग 850 हो जाएंगी.

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लोकसभा में परिसीमन बिल को लेकर चर्चा जारी है लोकसभा में परिसीमन बिल को लेकर चर्चा जारी है

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:31 PM IST

महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन लागू करने के मुद्दे पर संसद में दो दिन से बहस जारी है. परिसीमन को लेकर कहा जा रहा है, इससे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा. जबकि सरकार का इस बारे में तर्क है कि अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं और महिला आरक्षण लागू करने के लिए जरूरी परिसीमन होने के बाद ये संख्या 850 (राउंड फिगर) तक हो जाएगी. 

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अभी सिर्फ सीटों के बढ़ने को लेकर बात करें तो यह पहली बार नहीं है. यह समझना जरूरी है कि लोकसभा सीटों की संख्या में बदलाव कोई नई बात नहीं है. आज जिस 543 सीटों वाली लोकसभा को हम जानते हैं, वह कई स्टेप्स से गुजरकर यहां तक पहुंची है.

आज़ादी के बाद हुए पहले आम चुनाव से लेकर अब तक, सीटों का गणित पांच बार बदला और फिर एक लंबा ‘फ्रीज’ का दौर भी आया, जिसने राजनीति और प्रतिनिधित्व दोनों को गहराई से प्रभावित किया.

पहला चुनाव और 489 सीटों का दौर
भारत में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 के बीच कराया गया. यह दुनिया का सबसे बड़ी लोकतांत्रिक एक्सरसाइज थी. इसमें लोकसभा की 489 सीटों के लिए मतदान हुआ. उस समय देश की आबादी, राज्यों की संरचना और प्रशासनिक जरूरतें अलग थीं, इसलिए सीटों का यह आंकड़ा शुरुआती व्यवस्था के हिसाब से तय किया गया था.

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1957 और 1962: धीरे-धीरे बढ़ती संख्या
1957 में दूसरे आम चुनाव के समय सीटों की संख्या बढ़कर 494 हो गईं. इसके बाद 1962 के चुनाव में भी यही संख्या बनी रही. यह वह दौर था जब जनसंख्या में वृद्धि और राज्यों के पुनर्गठन के कारण प्रतिनिधित्व का दायरा धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा था.

1967: बड़ा उछाल, 520 सीटें
1967 के चौथे आम चुनाव में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 520 हो गई. यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत थी कि देश की जनसंख्या और राजनीतिक विविधता को समेटने के लिए संसद का आकार भी बढ़ाना जरूरी हो रहा था.

1971 और 1977: घटत-बढ़त का दौर
1971 के चुनाव में सीटों की संख्या घटकर 518 हो गई. हालांकि इसके बाद 1977 में यह संख्या बढ़कर 542 पहुंच गई. यह समय राजनीतिक उथल-पुथल का था, लेकिन साथ ही प्रतिनिधित्व के ढांचे में भी बदलाव हो रहा था.

1980: 543 सीटों का स्थायी आंकड़ा
1980 में लोकसभा सीटों की संख्या 543 हो गई और तब से अब तक यही संख्या बरकरार है. यही वह आंकड़ा है, जिसके आधार पर देश की संसदीय राजनीति पिछले चार दशकों से चल रही है.

1976 का ‘फ्रीज’: राजनीति का टर्निंग पॉइंट
सीटों के इस लगातार बदलते गणित पर 1976 में ब्रेक लगा, जब परिवार नियोजन को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए सीटों की संख्या को ‘फ्रीज’ कर दिया गया. इसका मतलब था कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद सीटों की संख्या नहीं बढ़ेगी. पहले यह फ्रीज 2001 तक के लिए था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया गया. यानी पिछले कई दशकों से भारत में लोकसभा सीटों की कुल संख्या स्थिर बनी हुई है, भले ही जनसंख्या में भारी इजाफा हुआ हो.

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परिसीमन हुआ, लेकिन सीटें नहीं बढ़ीं
हालांकि 1971 की जनगणना के बाद संसदीय क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव (परिसीमन) जरूर हुआ, लेकिन कुल सीटों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई. इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश हुई कि राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बना रहे.

अब जब 2026 के बाद सीटों की संख्या बढ़ाने की संभावना पर चर्चा हो रही है, तो यह सवाल उठ रहा है कि क्या संसद का आकार फिर बढ़ेगा? अगर ऐसा होता है, तो यह छठी बार होगा जब लोकसभा सीटों की संख्या बदलेगी. यह सिर्फ संख्या का मामला नहीं है, बल्कि प्रतिनिधित्व, राज्यों के बीच शक्ति संतुलन और लोकतंत्र की गुणवत्ता से जुड़ा मुद्दा है. 

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