आजाद हिंद फौज के नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को जापान से भारत लाने का मामला एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस पर सुनवाई करने से साफ मना कर दिया है. कोर्ट ने याचिका की टाइमिंग और वारिस के हक को लेकर ऐसी बातें कहीं, जिससे यह पूरा रहस्य एक बार फिर चर्चा में आ गया है.
कितनी बार आएगा यह मुद्दा?
नेताजी के प्रपौत्र की तरफ से दाखिल इस याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ सुनवाई कर रही थी. सुनवाई शुरू होते ही चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि आखिर यह मुद्दा कितनी बार अदालत के सामने आएगा? उन्होंने कहा कि नेताजी देश के सबसे महान नेताओं में से एक थे और हम सब उनके बलिदान को नमन करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि उनके परिवार के आखिर कितने सदस्य ऐसी मांग लेकर आएंगे?
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अदालत ने एक बहुत बड़ी बात यह भी कही कि इन अस्थियों की विश्वसनीयता पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं. चूंकि अब तक यह आधिकारिक तौर पर साबित नहीं हो पाया है कि नेताजी की मौत कब और कहां हुई थी, इसलिए उन अवशेषों को बिना किसी ठोस आधार के स्वीकार करना मुश्किल है.
इस पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि भारत के कई प्रधानमंत्रियों ने खुद जापान के रैंकोजी मंदिर जाकर इन अवशेषों को श्रद्धांजलि दी है. उन्होंने यह भी बताया कि नेताजी की इकलौती वारिस और उनकी बेटी अनीता बोस खुद इस सुनवाई में ऑनलाइन मौजूद हैं.
'वारिस खुद आएं, तो करेंगे सुनवाई'
जस्टिस बागची ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि हम परिवार की भावनाओं का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन बेहतर होगा कि नेताजी की असली वारिस खुद अदालत का दरवाजा खटखटाएं. कोर्ट ने भरोसा दिलाया कि अगर उनकी बेटी खुद मांग करती हैं, तो उनकी भावनाओं पर कानूनी रूप से विचार किया जाएगा. कोर्ट ने साफ कहा कि बिना वारिस के कोर्ट आए, इस मामले पर कोई फैसला नहीं लिया जाएगा.
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याचिका की टाइमिंग पर तीखी टिप्पणी
सबसे ज्यादा चर्चा चीफ जस्टिस सूर्यकांत की उस टिप्पणी की हो रही है, जिसमें उन्होंने याचिका दाखिल करने के समय पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, 'हमें पता है कि यह याचिका इसी समय क्यों दाखिल की गई है. हम इसकी टाइमिंग और इसके पीछे के कारणों को अच्छी तरह समझते हैं'. कोर्ट के इस कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी वापस ले ली है.
दरअसल, याचिका में आरोप लगाया गया था कि भारत सरकार टोक्यो के रैंकोजी मंदिर से सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां वापस लाने में नाकाम रही है, जिसकी वजह से उनकी बेटी अनीता बोस उनका अंतिम संस्कार नहीं कर पा रही हैं.
संजय शर्मा