उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के माघ मेले के दौरान ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिष्यों और नाबालिग वेदपाठी बटुकों के साथ कथित पुलिस दुर्व्यवहार का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है. अधिवक्ता उज्ज्वल गौर ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं और धार्मिक पदाधिकारियों के लिए SOP बनाने की मांग की है.
माघ मेले के सबसे पवित्र स्नान दिवस मौनी अमावस्या (18 जनवरी 2026) को प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पालकी में स्नान के लिए जा रहे थे. इस दौरान उनके साथ मौजूद नाबालिग ब्रह्मचारी, वेदपाठी बटुक (11 से 14 साल) और संतों के साथ पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर घसीटना, मारपीट और दुर्व्यवहार किया गया. सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो इस घटना के आधार बने, जो कानून व्यवस्था, मानवीय गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा हमला दर्शाते हैं.
याचिका में इसे क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक करार दिया गया है, जो पुलिस के अनियंत्रित विवेकाधिकार और धार्मिक व्यक्तियों से निपटने के लिए SOP के अभाव को उजागर करता है.
याचिका की प्रमुख मांगें
SOP का निर्माण: माघ मेला या अन्य धार्मिक आयोजनों में शंकराचार्यों, संतों और धर्माचार्यों के साथ पुलिस व्यवहार के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तय की जाए, ताकि भविष्य में मनमानी रोकी जा सके.
दिशा-निर्देश जारी: धार्मिक व्यक्तियों से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश दिए जाएं.
यह भी पढ़ें: अविमुक्तेश्वरानंद ने CM योगी को दिया 40 दिन का अल्टीमेटम, बोले- 'अब आपको देना होगा हिंदू होने का प्रमाण'
शिकायत निवारण तंत्र: सरकारी ज्यादतियों के खिलाफ धार्मिक पदाधिकारियों के लिए प्रभावी शिकायत व्यवस्था स्थापित की जाए, क्योंकि वर्तमान में पीड़ितों को समय पर राहत नहीं मिलती.
संवैधानिक उल्लंघन के आरोप
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के घोर उल्लंघन का हवाला दिया गया है. कथित अत्याचार को मानवीय गरिमा पर हमला बताया गया, जो राज्य के अनियंत्रित अधिकारों को चुनौती देता है.
संजय शर्मा