क्या लेफ्ट भूल गया ज्योति बाबू की इजरायल यात्रा? PM मोदी के दौरे को बता रहा शर्म की बात

इजरायल का विरोध भारत की कम्युनिस्ट पार्टी आज भी करती है. लेकिन मौजूदा सीपीएम महासचिव एम ए बेबी अपने पूर्ववर्ती नेता ज्योति बसु को लेकर क्या कहेंगे, जिन्होंने एक रेडिकल फैसला लेते हुए इजरायल का दौरा किया था और इस यहूदी स्टेट की खुलकर तारीफ की थी. खास बात यह भी है कि फिलिस्तीन के नेता यासिर अराफात उनके पक्के दोस्त थे.

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पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु भी इजरायल दौरे पर गए थे. (Photo: ITG) पश्चिम बंगाल के सीएम ज्योति बसु भी इजरायल दौरे पर गए थे. (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 25 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:10 PM IST

“वो पुराने दिन थे जब हम साउथ अफ्रीका और इज़रायल की सरकारों का विरोध करते थे. लेकिन अब हमारी पॉलिसी बदल गई है. यहां तक ​​कि इंडियन फॉरेन पॉलिसी भी बदल गई है और इन दोनों देशों के साथ पूरे डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं." 25 साल पहले जब पश्चिम बंगाल के सीएम और भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा के स्तंभ रहे कॉमरेड ज्योति बसु जब इजरायल की यात्रा पर गए थे तो उन्हें कई तर्क गढ़ने पड़े थे. उनकी पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया इजरायल और इजरायल को गढ़ने वाली विचारधारा की कट्टर विरोधी थी. 

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लेकिन देश-दुनिया की हवा पहचानने वाले और 23 वर्षों तक बंगाल के सीएम रहने वाले ज्योति बसु समझ गए थे इजरायल विज्ञान और आविष्कार की दुनिया आने वाले दिनों में क्या करने वाला है. 

राजनीतिक टैबू तोड़ने का साहसिक फैसला

इसलिए उन्होंने उस राजनीतिक टैबू को तोड़ने का निर्णय किया, जिसकी हिम्मत कम ही नेता कर पाते हैं. जून 2000 में सीएम ज्योति बसु एक बड़े बिजनेस प्रतिनिधिमंडल के साथ इजरायल दौरे पर पहुंचे थे. 

लेकिन ज्योति बसु कोई हठात इजरायल नहीं पहुंच गए थे. अपने दौरे से 2 साल पहले 1998 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (CPI) के नेता और उस समय वेस्ट बंगाल इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन के चेयरमैन सोमनाथ चटर्जी को इज़रायल भेजा था. 

बसु के इजरायल जाने और उस देश के साथ व्यापार करने के फैसले से कई सवाल उठे थे. पार्टी के अंदरुनी खेमे में दबी जुबान उनकी आलोचना भी हुई थी. लेकिन उस समय की कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे व्यावहारिक और बिजनेस डील बताया. 

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पार्टी ने कहा कि वेस्ट बंगाल की बहुत सी कंपनियों ने IT और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे हाई-टेक एरिया के साथ-साथ एग्रीकल्चर सेक्टर में इज़रायल के साथ कोलेबोरेशन में दिलचस्पी दिखाई थी, क्योंकि इजरायल कटिंग एज टेक्नोलॉजी और नए नए खोज में कई देशों से आगे था. 

बसु के फैसले पर क्या कहेंगे महासचिव बेबी

वर्ष 2000 में सीपीएम ने ज्योति बसु के इजरायल दौरे पर चाहे जो भी तर्क दिया हो लेकिन 25 गुजर जाने के बाद भी कम्युनिस्ट पार्टी का इजरायल विरोध खत्म नहीं हुआ है. 

कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एम ए बेबी ने पीएम मोदी के इजरायल दौरे का विरोध किया है. उन्होंने एक्स पर लिखा है, "फ़िलिस्तीन पर लगातार नरसंहार करने वाले हमलों के बीच ज़ायोनिस्ट इज़रायल को मोदी का गले लगाना, भारत की एंटी-कॉलोनियल विरासत और फ़िलिस्तीनी लोगों के सेल्फ़-डिटरमिनेशन के अधिकार के सपोर्ट में हमारी लंबे समय से चली आ रही सोच के साथ धोखा है, जिसे UN के उन प्रस्तावों से पक्का किया गया है जिन्हें भारत ने को-स्पॉन्सर किया है और वोट दिया है."

एम ए बेबी ने इजरायल के पीएम को वॉर क्रिमिनल कहा है. उन्होंने लिखा है कि, "नेतन्याहू ने अब ऐलान किया है कि भारत सिक्योरिटी मामलों में सहयोग करेगा, और मोदी उनके इशारों पर "नाचने-गाने" के लिए इजरायल जा रहे हैं. यह नापाक गठबंधन हमारे देश की आत्मा पर एक कभी न मिटने वाला धब्बा होगा. शर्म की बात है!"

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पीएम नरेंद्र मोदी बुधवार से दो दिनों के इजरायल दौरे पर हैं. इस दौरान दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार और आर्थिक सहयोग पर समझौते होंगे.

भारत का लेफ्ट इजरायल के खिलाफ रहा है

भारत का कथित इंटेलिजेंशिया और लेफ्ट बुद्धिजीवी अक्सर इजरायल एक कब्जा करने वाले ताकत के रुप में देखते हैं और इस देश डिप्लोमैटिक, एकेडमिक और सोशल/कल्चरल बॉयकॉट की वकालत करते रहे हैं. कथित प्रोग्रेसिव ग्रुप मानते हैं कि वेस्ट एशिया में शांति की कमी के लिए इजरायल ज़्यादा जिम्मेदार है, इसके अलावा इजराइलियों ने इजरायल-फ़िलिस्तीन झगड़े को सुलझाने के लिए कुछ नहीं किया है.

जनवरी 1992 में भारत-इजरायल संबंध सामान्य हुए

भारत ने 17 सितंबर 1950 को इजरायल को मान्यता दी थी. लेकिन कूटनीतिक संबंध बहाल नहीं हुए. इस दिशा में पीएम नरसिम्हा राव ने अहम फैसला लिया और उन्होंने जनवरी 1992 में इजरायल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित किए. 

इसके मात्र 6 साल बाद ही ज्योति बसु ने आलोचनाओं को दरकिनार कर सोमनाथ चटर्जी को इजरायल दौरे पर भेजा. 

हालांकि जून 2000 में जब उन्होंने इजरायल के साथ संबंध स्थापित किया तो कुछ ही दिन बाद उन्होंने बंगाल की सत्ता अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी बुद्धदेब भट्टाचार्य को सौंप दी. 

यासिर अराफात से बसु की गहरी दोस्ती थी

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ज्योति बसु इजरायल दौरे से जुड़ी मुश्किलों को समझते थे. फिलीस्तीन के नेता यासिर अराफात से उनकी गहरी दोस्ती थी. 

अंग्रेजी वेबसाइट 'द प्रिंट' अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है. ज्योति बसु ने इस दौरे पर मीडिया से कहा, "वो पुराने दिन थे जब हम साउथ अफ्रीका और इज़राइल की सरकारों का विरोध करते थे. लेकिन अब हमारी पॉलिसी बदल गई है. यहां तक कि भारत की फॉरेन पॉलिसी भी बदल गई है और इन दोनों देशों के साथ पूरे डिप्लोमैटिक रिलेशन हैं."

उन्होंने यह भी कहा, “मैं हमेशा इज़राइल से बहुत प्रभावित रहा हूँ। आखिर तीनों बड़े धर्म (यहूदी, ईसाई और इस्लाम) यहीं से निकले हैं.”

इजरायल कम्युनिज़्म के वर्किंग मॉडल का अकेला उदाहरण: बसु

इस विजिट पर सीएम बसु ने प्रेसिडेंट एज़र वीज़मैन, प्राइम मिनिस्टर एहुद बराक और लेबर पार्टी के सीनियर लीडर शिमोन पेरेज़ जैसे टॉप लीडर्स से मुलाकात की. बसु ने शिमोन पेरेज की बहुत तारीफ की और माना कि 'वह एक ऐसे आदमी थे जो शांति के लिए कमिटेड थे'.

भारत में इजरायल के एम्बेसडर योहयादा हैम ने बंगाल के मुख्यमंत्री को मेटज़ार नाम के किबुत्ज़ जाने के लिए मनाया, जो येरुशलम से सिर्फ़ एक घंटे की ड्राइव पर था, ताकि उन्हें इजरायल में असली कम्युनिज़्म कैसे काम करता है, इसका सीधा अनुभव हो सके. 

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किबुत्ज़ सोशलिस्ट विचारों से प्रेरित कलेक्टिविज़्म और कम्युनिटेरियनिज़्म पर आधारित कम्युनिटीज़ का एक पुराना कॉन्सेप्ट है.  बसु इसे देखकर प्रभावित और कहा, "इजरायल कम्युनिज़्म के वर्किंग मॉडल का अकेला उदाहरण है."
 

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