दो बार प्रवासी बने, फिर भी नहीं भूले भारत… PM मोदी के नीदरलैंड्स दौरे में छाए सूरीनामी-हिंदुस्तानी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड्स के द हेग में डच नेताओं से मुलाकात कर भारतीय समुदाय को संबोधित करेंगे. सूरीनामी-हिंदुस्तानी प्रवासी दो महाद्वीपों और भाषाओं के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए हैं. नीदरलैंड्स में ये सबसे बड़ा भारतीय मूल का समुदाय हैं. उनकी यात्रा 1873 में 'लाला रुख' जहाज से शुरू हुई, जिसने बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल के मजदूरों को सूरीनाम पहुंचाया.

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पीएम मोदी का सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय ने स्वागत किया. (Photo- X/Narendra Modi) पीएम मोदी का सूरीनामी-हिंदुस्तानी समुदाय ने स्वागत किया. (Photo- X/Narendra Modi)

प्रणय उपाध्याय

  • नई दिल्ली,
  • 16 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:53 PM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पांच देशों के दौरे के दूसरे पड़ाव पर नीदरलैंड्स में हैं. यहां वो डच नेताओं के साथ हाई लेवल मीटिंग कर रहे हैं. शनिवार सुबह द हेग में पीएम मोदी भारतीय समुदाय को संबोधित करने वाले हैं. 

इस बीच, यूरोप में रह रहे भारतीय मूल के एक ऐसे अनूठे समुदाय पर सबका ध्यान गया है, जिसकी कामयाबी की कहानी बेहद अनोखी है. ये समुदाय है 'सूरीनामी-हिंदुस्तानी प्रवासी'.

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इन्हें 'दोहरी प्रवासी' (ट्वाइस-माइग्रेंट्स) कहा जाता है. इन्होंने दो महाद्वीपों, दो भाषाओं और दो मातृभूमियों के सफर के बाद भी पिछले 153 सालों से अपने दिलों में भारत को जिंदा रखा है.

एक जहाज से शुरू हुआ था सफर

इस सफर की शुरुआत 5 जून 1873 को 'लाला रुख' नाम के एक अकेले जहाज से हुई थी. ये जहाज बिहार, उत्तर प्रदेश के भोजपुरी इलाकों और बंगाल के बंधुआ मजदूरों को लेकर सूरीनाम के पारामारिबो पहुंचा था. उस समय भारत के ब्रिटिश वायसराय ने इसे 'गुलामी की एक नई व्यवस्था' कहा था.

(Photo- X/Narendra Modi)

 

लेकिन इन मजदूरों ने तमाम मुश्किलों के बाद भी इतिहास का एक नया और मजबूत अध्याय लिख दिया. आज नीदरलैंड्स के शहर 'द हेग' की गलियों में इस समुदाय की सबसे बड़ी आबादी रहती है. इन मजदूरों के पोते-परपोते आज भी वहां 'सरनामी' भाषा बोलते हैं. ये भाषा सूरीनाम के खेतों में पैदा हुई थी. 

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इसमें भोजपुरी और अवधी के साथ डच भाषा का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है. ये भाषा आज भी वहां के घरों, बाजारों, मंदिरों और सामुदायिक हॉलों में गूंजती है.

सूरीनाम से नीदरलैंड्स तक का दूसरा सफर

साल 1975 में जब सूरीनाम को आजादी मिली, तब हजारों की संख्या में इन लोगों ने नीदरलैंड्स की तरफ अपना दूसरा सफर शुरू किया. वो अपने साथ डच और सरनामी भाषा, भारतीय रीति-रिवाज और कैरेबियाई यादें लेकर आए थे. आज नीदरलैंड में लगभग 2,00,000 सूरीनामी-हिंदुस्तानी रहते हैं. 

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ये महाद्वीपीय यूरोप में भारतीय मूल का सबसे बड़ा और सबसे पुराना समुदाय है, जो भारत से सीधे आए 90,000 नए प्रवासियों से थोड़ा अलग है, लेकिन उनसे गहराई से जुड़ा हुआ है.

संगीत और साहित्य में लहराया परचम

इस समुदाय ने अपनी संस्कृति की लौ को हमेशा जलाकर रखा है. सदियों पुरानी 'बैठक गाना' परंपरा- जो भोजपुरी क्षेत्र का लोक और भक्ति संगीत है, अब नीदरलैंड्स में 'सरनामी-भोजपुरी गीत' के रूप में बदल चुकी है. 

साल 1964 में जन्मे पांचवीं पीढ़ी के कलाकार राज मोहन इसके आधुनिक उस्ताद बन चुके हैं. इस बिहारी-भारतीय-सूरीनामी-डच गायक ने मशहूर भजन सम्राट अनूप जलोटा के साथ एक भजन एल्बम भी तैयार किया है, जिसने द हेग और मुंबई को संगीत के जरिए सीधे जोड़ दिया है.

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साहित्य के क्षेत्र में भी इस समुदाय का दबदबा बढ़ रहा है. लेखिका करिन अमातमोक्रिम ने बौद्धिक दिग्गज अनिल रामदास पर लिखी अपनी किताब के लिए प्रतिष्ठित '2024 डच बायोग्राफी प्राइज' जीता है. ये इस बात का सबूत है कि सूरीनामी-हिंदुस्तानी आवाजें अब डच संस्कृति की मेन स्ट्रीम को प्रभावित कर रही हैं.

(Photo- X/Narendra Modi)

भारत सरकार ने दिया सर्वोच्च सम्मान

भारत ने भी इस अटूट रिश्ते का हमेशा सम्मान किया है. इस समुदाय के चार प्रमुख लोगों को प्रवासी भारतीयों के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान 'प्रवासी भारतीय सम्मान' से नवाजा जा चुका है.

  • राम लखिना (2009)- भारतीय परंपराओं को बचाने और मातृभूमि से रिश्ते मजबूत करने के लिए.
  • सालेह वाहिद (2011)- सामाजिक सेवा और नीदरलैंड में भारत के हितों को बढ़ावा देने के लिए.
  • सतनारायणसिंह रबीन बलदेव सिंह (2014)- द हेग के पूर्व डिप्टी मेयर, जिन्होंने राजनीतिक स्तर पर भारत-डच संबंधों को आगे बढ़ाया.
  • महामहिम यूजीन रुगेनाथ (2021)- कुराकाओ के पूर्व प्रधानमंत्री, जो सूरीनामी-हिंदुस्तानी विरासत से आते हैं और डच साम्राज्य में सर्वोच्च पद तक पहुंचे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में नीदरलैंड्स में भारतीय प्रवासियों ने कथक, गरबा और भोजपुरी गानों की शानदार परफॉर्मेंस दीं. साल 1873 में 'लाला रुख' जहाज के डेक से शुरू हुई ये कहानी 2026 में द हेग के मंच तक पहुंच चुकी है. ये कहानी साबित करती है कि प्रवासी होने का मतलब सिर्फ घर छोड़ना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को कभी न छोड़ना है.

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