एनटीए यानी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी ने मंगलवार, 12 मई को NEET UG 2026 एग्जाम को रद्द कर दिया. ऐसा तब हुआ, जब प्रश्नपत्रों में भारी समानता के आरोप सामने आए. एग्जाम रद्द की खबर मिलते ही पूरे देश में लाखों छात्र सदमे में आ गए. लेकिन शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई लोगों के लिए, इससे भी बड़ा सवाल कुछ और ही था. पहले दी गई चेतावनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
क्योंकि इस विवाद के भड़कने से महीनों पहले ही, कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली एक संसदीय समिति ने NTA के कामकाज को लेकर गंभीर चिंताएं जताई थीं और ठीक इसी तरह के संकट को रोकने के लिए बड़े सुधारों की सिफारिश की थी.
इस समिति ने NEET, JEE, CUET, UGC-NET और CSIR-NET जैसी राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े बार-बार होने वाले विवादों की समीक्षा की थी. यह समीक्षा तब की गई, जब 2024 में हुए परीक्षा लीक घोटालों ने छात्रों के भरोसे को बुरी तरह से तोड़ दिया था.
लेकिन इसकी कई प्रमुख सिफारिशें या तो पूरी तरह से लागू नहीं हुईं या चर्चा के दायरे में ही रह गईं. अब, निष्पक्षता संबंधी चिंताओं के बीच NEET UG 2026 के आधिकारिक रूप से रद्द होने और सीबीआई जांच के आदेश के बाद कमेटी की रिपोर्ट एक बार फिर चर्चा में आ गई है.
पैनल ने बड़े पैमाने पर होने वाली परीक्षाओं को ज्यादा सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के मकसद से कई सिफारिशें की हैं.
1- इनमें जरूरी सुझावों में निजी विक्रेताओं पर निर्भरता कम करना और परीक्षाओं पर सीधे संस्थागत कंट्रोल को मजबूत करना शामिल था. पैनल ने चेतावनी देते हुए कहा कि परीक्षा की व्यवस्था, कागजी कार्रवाई और तकनीकी कार्यों को अत्यधिक आउटसोर्स करने से सुरक्षा में खामियां पैदा हो सकती हैं.
कमेटी ने मजबूत जवाबदेही प्रणाली, दागी फर्मों को स्थायी रूप से ब्लैकलिस्ट करने, बेहतर आंतरिक गुणवत्ता जांच, मजबूत सुरक्षा ढांचा और बेहतर निगरानी प्रणाली की भी सिफारिश की. इसने खास तौर से बताया कि प्रमुख NTA परीक्षाओं में बार-बार होने वाली बाधाओं से छात्रों का आत्मविश्वास कम हो रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अकेले 2024 में ही कई नेशनल लेवल की परीक्षाओं को स्थगित करना पड़ा, विवाद हुए, डेटा लीक हुआ या तकनीकी समस्याएं आईं.
2. पैनल ने यह सवाल भी उठाया कि एनटीए के पास सैकड़ों करोड़ रुपये का एक्स्ट्रा फंड होने के बावजूद, उसने एग्जाम सिक्योरिटी और आंतरिक सुरक्षा उपायों में ज्यादा जोरदार तरीके से इन्वेस्टमेंट क्यों नहीं किया.
3. समिति ने सुझाव दिया कि अगर कंप्यूटर-बेस्ड एग्जाम होते हैं, तो वे सिर्फ़ सरकारी या सरकार द्वारा नियंत्रित केंद्रों में ही होने चाहिए, न कि निजी केंद्रों में आयोजित किया जाना चाहिए.
4. कमेटी ने NTA से CBSE और UPSC द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सिस्टम की स्टडी करने की गुजारिश की, जिन्हें पैनल ने तुलनात्मक रूप से ज़्यादा भरोसेमंद और विश्वसनीय बताया.
तो, इन सिफारिशों का पालन क्यों नहीं किया गया?
इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि इनमें से कई सिफारिशों के लिए भारत के बड़े एग्जाम सिस्टम में ढांचागत बदलावों की जरूरत थी. सिर्फ NEET में ही 22 लाख से ज्यादा उम्मीदवार, हजारों केंद्र और कई राज्यों के बीच तालमेल की जरूरत होती है. पूरी तरह से सरकार के कंट्रोल वाले इंफ्रास्ट्रक्चर पर जाना या वेंडर सिस्टम में पूरी तरह से बदलाव करना तुरंत मुमकिन नहीं था.
भविष्य के एग्जाम मॉडल को लेकर भी मतभेद थे.
जहां दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली पार्लियामेंट्री कमेटी पारंपरिक पेन-एंड-पेपर सिस्टम को मजबूत करने के पक्ष में थी. वहीं, ISRO के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अगुवाई वाली सरकार द्वारा नियुक्त एक दूसरी समिति ने कथित तौर पर ज्यादा टेक्नोलॉजी-बेस्ड सुधारों जैसे कि बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, डिजिटल परीक्षा सिस्टम और हाइब्रिड टेस्टिंग मॉडल पर जोर दिया.
नतीजतन, कई सुधारों को जल्दी लागू करने के बजाय, उनकी समीक्षा ही चलती रही. इसके साथ ही, अधिकारियों ने बार-बार यह दावा किया था कि NEET UG 2026 को बेहतर सिक्योरिटी प्रोटोकॉल के तहत आयोजित किया जा रहा है, जिसमें बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, GPS ट्रैकिंग और AI-बेस्ड निगरानी शामिल है. लेकिन मौजूदा विवाद ने अब कुछ ऐसे मुश्किल सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या वे सिस्टम वाकई काफी थे.
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एग्जाम रद्द होने से भरोसे का संकट फिर गहरा गया है. NEET UG 2026 को रद्द करने का फैसला तब आया, जब राजस्थान के जांचकर्ताओं ने दावा किया कि एक सर्कुलेट हुए "गेस पेपर" के 100 से ज़्यादा सवाल कथित तौर पर असली परीक्षा के पेपर से मेल खाते थे. अब इस मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियां कर रही हैं.
हालांकि, छात्रों के लिए यह मुद्दा अब सिर्फ़ एक एग्जाम तक सीमित नहीं रह गया है. राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं को लेकर बार-बार उठने वाले विवादों ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जिसे अब कई उम्मीदवार भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रति 'भरोसे की कमी' बता रहे हैं. और आज परीक्षा रद्द होने के बाद, समिति की पुरानी चेतावनी अचानक कुछ महीने पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा गंभीर लगने लगी है. अगर परीक्षा सुधार सिर्फ कागजों पर लिखी सिफारिशें बनकर रह गए, तो छात्रों को असल जिंदगी में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है.
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