पिछले दिनों देश की राष्ट्रीय राजधानी और आर्थिक राजधानी की गोद में तीन अलग-अलग इलाक़ों में तीन बड़े हादसे हुए. मुंबई-पुणे एक्स्प्रेस-वे पर हादसे के बाद 32 घंटे का जाम, दिल्ली के जनकपुरी में रोड पर खोदे गए गड्ढे में गिरकर युवक की मौत और हरियाणा के फ़रीदाबाद ज़िले में सूरजकुंड मेले में लगा झूला टूटने से हुआ हादसा. इन सभी घटनाओं में आम लोगों की ज़िंदगी दांव पर लगी. इन तीनों घटनाओं की वजह से कितने घरों के दीपक बुझ गए होंगे और कितने घरों के दीपक देर से जले होंगे, इसका वास्तविक आंकड़ा शायद ही मिल पाए.
सवाल हादसे होने का नहीं है, हादसे होते हैं. सवाल हादसे के पीछे की वजहों और उसके बाद लिए गए एक्शन पर है. किसी घटना के होने के बाद शोर-शराबे, सियासी बयानबाज़ी और हल्लाबोल जैसे हालात के बीच असली गुनहगार की तलाश अपने रास्ते से शायद भटक जाती है. और आख़िरकार, एक 'बलि का बकरा' सामने आता है और कहानी का रुख़ पूरी तरह से मोड़ दिया जाता है.
पिछले दिनों हुए तीन हादसों में भी यही रवैया देखने को मिला है. अभी इन्हीं तीन मामलों की बात की जा रही है लेकिन इससे पहले भी तमाम घटनाओं पर सिस्टम का इसी तरह का रवैया देखने को मिलता है. तमाम तरह के सवालों के बीच एक बड़ा सवाल यह है कि आख़िर सिस्टम कब सुधरेगा और अगर सिस्टम में सुधार नहीं होता है, तो इस तरह की घटनाओं की ज़िम्मेदारी 'बलि के बकरे' के हवाले करने के बजाय सिस्टम के लोग कब लेंगे. असली ज़िम्मेदारों पर कब जवाबदेही तय की जाएगी?
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे 13.3 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेसवे बाईपास है, जिसे भारत के दो सबसे बड़े शहरी केंद्रों को जोड़ने वाले इस अहम कॉरिडोर पर भीड़ कम करने और सुरक्षा बेहतर बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इस हाइवे पर खंडाला घाट सेक्शन में एक गैस टैंकर पलट गया, जिसके बाद 32 घंटे का जाम लग गया. कई यात्रियों को अपनी गाड़ियों में ही सोना पड़ा और लोगों को रात भर गाड़ी रोड पर ही पार्क करके इंतज़ार करना पड़ा. इस दौरान फ़ंसे हुए लोगों को खाना, पानी और वॉशरुम से जुड़ी दिक़्क़तें झेलती पड़ीं. इसमें एम्बुलेंस, ट्रक और प्राइवेट कारों सहित हज़ारों गाड़ियां फंसी रहीं.
तीस घंटे से ज़्यादा वक़्त तक जाम की घटना किसी हादसे से कम नहीं थी, क्योंकि यह सिस्टम का फेल्योर था. घंटों तक लंबी रोड पर गाड़ियां फंसी रहीं और कोई निकालने वाला नहीं था. जब कई घंटों बाद प्रशासन जगा, तो उस टैंकर ड्राइवर पर कार्रवाई हुई, जो खंडाला घाट में पलट गया था. ड्राइवर पर आरोप लगाया गया कि टैंकर तय सीमा से ज़्यादा स्पीड में था, इसलिए पलट गया. यहां सवाल उठता है कि एक हादसे के बाद ट्रैफ़िक का पूरा सिस्टम चरमरा गया और तीस घंटे से ज़्यादा वक़्त तक जाम लगा रहा. क्या यह सिस्टम का फेल्योर नहीं था?
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दिल्ली के जनकपुरी में कैलाशपुरी के रहने वाले कमल ध्यानी (25) रात में दफ़्तर से निकले और घर नहीं पहुंचे. बाद में उन्हें दिल्ली जल बोर्ड (DJB) के काम के लिए खोदे गए 15 फुट गहरे गड्ढे में मृत अवस्था में पाया गया. जांच से पता चलता है कि खुले गड्ढे में गिरने से उनकी मौत हुई.
क़रीब आठ घंटे तक, कमल ध्यानी बिना घेरे वाले 20 फुट गहरे गड्ढे में पड़े रहे, उन्हें कोई मदद नहीं मिली और आख़िरकार मौत हो गई. कुछ लोगों ने बाइकर को खुले गड्ढे में गिरते देखा, ठेकेदार को बताया गया और वह मौक़े पर पहुंचा, फिर भी उसने कुछ नहीं किया. कोई इमरजेंसी कॉल नहीं की गई. बचाव की कोई कोशिश नहीं की गई. जब अगले दिन सुबह उसके परिवार वालों ने उसे ढूंढा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. मामले में जांच हुई. पुलिस उपायुक्त (पश्चिम) शरद भास्कर ने बताया कि गिरफ्तार मज़दूर की पहचान 23 साल के योगेश के रूप में हुई है, जो यूपी के फ़िरोज़ाबाद का रहने वाला है. उस पर आरोप है कि वो हादसे के वक़्त मौक़े पर मौजूद था. वह उन शुरुआती लोगों में शामिल था, जिन्हें पता चला था कि बाइकर गड्ढे में गिरा है. योगेश के अलावा भी गिरफ्तारी हुई है.
आख़िरकार, हादसे पीछे के असली ज़िम्मेदारों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय, मज़दूर को आरोपी बना दिया गया. क्या इस मामले में सिस्टम की कोई ख़ामी नहीं नजर आती है? बीच रोड पर गड्ढा खोदा गया था, आस-पास कोई बैरियर या घेरा नहीं बनाया गया था, जो दूर नजर आए. हाल ही में, ऐसा ही कुछ नोएडा में भी हुआ था, जिसमें एक युवक की जान चली गई थी. आख़िर, सिस्टम में बैठे लोग इस तरह के हादसों की ज़िम्मेदारी कब लेंगे?
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हरियाणा के फ़रीदाबाद में सूरजकुंड मेला में 7 फरवरी ख़तरनाक हादसा हो गया. इस दौरान, एक झूला चलती हालत में अचानक टूट गया, जिसमें एक की मौत और कई लोग घायल हुए. पुलिस के मुताबिक़, झूला लगाने वाली कंपनी 'हिमाचल केयर फन केयर' के मालिक मोहम्मद शाकिर को गिरफ़्तार किया गया है. वह हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर के गांव टोका नंगला का रहने वाले हैं. पुलिस ने एक अन्य आरोपी नितेश, निवासी धर्मपुरी सदर मेरठ कैंट, उत्तर प्रदेश को भी गिरफ़्तार किया है.
क्या इस हादसे में मेले के ज़िम्मेदारान को भी कटघरे में नहीं खड़ा किया जाना चाहिए था? क्या मेले में झूला लगाने की परमिशन ग्रांट करने वालों की यह ज़िम्मेदारी नहीं है कि वे झूले के फिजिकल स्टेटस की जांच करें, उसके बाद लगाने की छूट दें. इस मामले में सिस्टम ने लोगों की जान के साथ खिलवाड़ किया. मेले में जाने वाले लोग कितने प्राइड और यक़ीन के साथ झूले पर बैठे होंगे. उन्हें यह नहीं पता था कि हम जिस सिस्टम पर भरोसा करके यहां आए हुए हैं, उसमें ख़ामियां ही खामियां हैं. और आख़िरकार, लोगों ने मुश्किल से अपनी जान बचाई.
इन तमाम हादसों ने सिस्टम की गंभीर लापरवाही और असंवेदनशीलता को सामने रखा है. सवाल यह है कि आख़िर कब ज़िम्मेदारी तय होगी और कब असली दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा. क्या हर बार किसी मज़दूर या ड्राइवर को ही 'बलि का बकरा' बनाकर सिस्टम अपनी नाकामी से बचता रहेगा, या कभी सुधार की ठोस पहल भी होगी?
मोहम्मद साक़िब मज़ीद