Al Nino Impact on Monsoon 2026: एक तरफ कमजोर मॉनसून तो दूसरी तरफ बारिश का लंबा इंतजार... अल नीनो के खतरे के बीच इस बार दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की चाल कछुआ जैसी धीमी हो गई है. आसमान से बादल नदारद हैं. सैटेलाइट तस्वीरों में भारत का मॉनसून लगभग नजर ही नहीं आ रहा है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 4 जून से 15 जून तक पूरे देश में बहुत कम बारिश हुई है. इस दौरान सामान्य 53.7 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 19.2 मिलीमीटर ही हुई. यानी 64 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है.
मुंबई का और बढ़ा मॉनसून का इंतजार
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में मॉनसून पहुंचने में देरी हो रही है. जून के दो हफ्ते बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक मॉनसून मुंबई तक नहीं पहुंचा है. आमतौर पर 9 से 11 जून के बीच मॉनसून मुंबई के तट को छू लेता है, लेकिन इस बार एक हफ्ते से ज्यादा की देरी हो चुकी है. मौसम विभाग के अनुसार, मॉनसून को मध्य अरब सागर, महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाकी हिस्सों में आगे बढ़ने में अभी भी 4 से 5 दिन लग सकते हैं.
वहीं, दिल्ली समेत उत्तर पश्चिम भारत में बेमौसम बरसात के चलते गर्मी से राहत मिली है. बिना मॉनसून के पश्चिमी विक्षोभ के चलते सामान्य से अधिक बारिश हुई है तो पश्चिम भारत में मॉनसून की रफ़्तार कछुआ की चाल से रेंग रही है. मौसम विभाग के मुताबिक़, महाराष्ट्र और गुजरात में मॉनसून में कमी हो रही है. 20 जून के बाद मॉनसून की स्थिति में प्रगति देखी जा सकती है. 25 जून के बाद अच्छी बारिश की संभावना भी जताई गई है.
इसके अलावा दक्षिण और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में मॉनसून पहुंचने के कुछ दिन बाद ही बारिश की गतिविधियां अचानक कम हो गई हैं. बादल छंट गए और सूखा-सा माहौल बन गया है. इससे पहले साल 2023 में भी मॉनसून ने 22 दिनों की देरी के बाद 25 जून को मुंबई में दस्तक दी थी. 2019 में भी मॉनसून 25 जून को मुंबई के तट से टकराया था.
अभी तक बारिश सामान्य से काफी कम बनी हुई है और अगर मौजूदा पूर्वानुमान जारी रहता है, तो मुंबई लगभग दो दशकों में अपने सबसे शुष्क जून महीनों में से एक का अनुभव कर सकता है. वहीं, गुजरात में भी मॉनसून की प्रगति धीमी पड़ गई है. कई शहरों में तापमान अब भी 40°C के आसपास बना हुआ है, जबकि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में मजबूत मौसम प्रणालियों की कमी मॉनसून के आगे बढ़ने की रफ्तार को प्रभावित कर रही है.
महाराष्ट्र और गुजरात के बांधों में जलस्तर घटा
अब व्यापक मॉनसूनी गतिविधियां जून के अंतिम सप्ताह तक फैलने की संभावना है. कम बरसात का असर महाराष्ट्र की सिंचाई व्यवस्था पर पड़ सकता है, जिससे बांधों में पानी कम होने लगा है. महाराष्ट्र के वाटर रिसोर्स विभाग के डाटा के मुताबिक़, 15 जून, 2026 तक महाराष्ट्र के बांधों में कुल जल भंडारण स्तर 40,847.9 मिलियन घन मीटर है, जबकि 10,021.62 एमसीएम वर्तमान भंडारण ही मौजूद है. यह आंकड़ा दर्शाता है कि बांधों में पानी का स्तर कुल जल भंडारण क्षमता का लगभग 24.53% ही बचा है. इसी तरह गुजरात के बांधों में भी कमज़ोर मॉनसून और गर्मी के चलते आज की तारीख़ में 48 प्रतिशत पानी कम है.
गुजरात के मशहूर सरदार सरोवर बांध में भी 6234 MCM पानी की कमी है. मौसम के बारे में जानकारी देने वाली संस्था स्काईमेट वेदर का कहना है कि मौजूदा रुझान अगर जारी रहा तो मुंबई लगभग दो दशकों में अपने सबसे शुष्क जून महीनों में से एक का अनुभव कर सकता है.
बता दें कि 4 जून को केरल में प्रवेश के बाद मॉनसून पश्चिमी तट के साथ अच्छी गति से आगे बढ़ रहा था. 8 जून को यह दक्षिण कोंकण क्षेत्र के हरनई तक पहुंच गया, लेकिन उसके बाद रफ़्तार रुक गई. पिछले एक सप्ताह से पश्चिमी घाटों के साथ मॉनसून की उत्तरी सीमा में कोई आगे बढ़त नहीं हुई है. संभावना है कि यह स्थिति कुछ और दिनों तक बनी रह सकती है.
स्काईमेट के मुताबिक़, बंगाल की खाड़ी में कोई भी मौसम प्रणाली विकसित होने की संभावना नहीं है, जो आमतौर पर तटीय क्षेत्रों में मॉनसून को आगे बढ़ाने का मुख्य कारक होती है. कोंकण-गोवा तट के निचले स्तरों पर उत्तर-उत्तर-पश्चिमी हवाएं चल रही हैं, जो मॉनसून के आगमन के लिए अनुकूल संकेत नहीं मानी जाती हैं. इसलिए मुंबई शहर और उसके उपनगरों में उमस भरा मौसम जारी रहने की संभावना है.
आंकड़ों के मुताबिक, मुंबई के सांताक्रूज़ ने इस महीने अब तक केवल 13.1 मिमी वर्षा दर्ज की है. वहीं, कोलाबा में इससे भी कम, मात्र 5 मिमी बारिश हुई है. जून महीने में सामान्य वर्षा 526.3 मिमी होती है. ऐसे में शहर पिछले लगभग दो दशकों के सबसे कम वर्षा वाले जून महीने की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है. इससे पहले जून 2014 में केवल 87.3 मिमी वर्षा दर्ज की गई थी, जो सबसे कम थी. जून 2014 और जून 2023 ऐसे अपवाद रहे जब मॉनसून के महीने में भी शहर ने असामान्य रूप से हीटवेव जैसी परिस्थितियों का सामना किया था. पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण तापमान में भी वृद्धि होने की संभावना है.
दुनिया भर की एजेंसियों ने अल नीनो के सक्रिय होने की घोषणा की है जो आगे चलकर खतरनाक होगा. अल नीनो का नकारात्मक असर भारत के मॉनसून और वर्षा प्रणाली पर पड़ेगा. हालांकि, भारतीय मौसम विभाग ने इस बार कमजोर मॉनसून की संभावना जताई थी. मौसम विभाग के मुताबिक़, अल नीनो का असर भारत के मौसम और मॉनसून पर भी पड़ेगी. सितंबर के महीने से ये बेहद मज़बूत हो जाएगा. मौसम विभाग के एक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन कहता है कि अभूतपूर्व तीन-वर्षीय ला नीना (Triple-Dip La Niña) घटना ने भारत में सामान्य से लेकर सामान्य से अधिक ग्रीष्मकालीन मॉनसूनी वर्षा (ISMR) में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
मॉनसून मिशन कपल्ड फोरकास्टिंग सिस्टम (MMCFS) ने ला नीना के विकास और उससे संबंधित मानसूनी वर्षा का कई महीने पहले ही सफलतापूर्वक पूर्वानुमान लगा लिया था. अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा (ISMR) की वर्ष-दर-वर्ष होने वाली परिवर्तनशीलता को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक है. हाल के वर्षों में लगातार तीन ला नीना वर्ष (2020–2022) दर्ज किए गए, जिन्हें व्यापक रूप से “ट्रिपल-डिप ला नीना” के नाम से जाना जाता है.
यह अध्ययन इन ट्रिपल-डिप ला नीना अवधियों के दौरान समुद्र सतह तापमान (SST) और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा (ISMR) में देखे गए परिवर्तनों पर चर्चा करता है. प्रेक्षणीय अभिलेखों से पता चला कि ट्रिपल-डिप ला नीना की चार घटनाएं (1954–1956, 1973–1975, 1998–2000 और 2020–2022) हुई हैं, जिनके दौरान अधिकांश वर्षों में ISMR सामान्य से अधिक रहा है.
आंकड़ों के मुताबिक, 1950 से अबतक 16 बार अल नीनो की स्थिति देखने को मिली है. 7 बार एल नीनो मध्यम रहा है. जबकि 6 बार से मज़बूत और 3 बार बहुत मज़बूत रहा है.इस वजह से साल 1982 में 15% बारिश की कमी हुई और सूखा पड़ा. साल 2015- में 14% बारिश की कमी हुई और सूखा पड़ा. साल 1957 में 14% बारिश की कमी से सूखा पड़ा तो साल 1965 में भी 14 से 16% बारिश की कमी के चलते सूखा पड़ा.
जबकि साल 1972 में 26% बारिश की कमी हुई और सूखा पड़ा. 1987 में 19% बारिश की कमी हुई और सूखा पड़ा वहीं, साल 1991 में 10% बारिश की कमी के चलते सूखा पड़ा. इसके अलावा साल 2023 में 6 प्रतिशत की कमी हुई इसके चलते सूखा पड़ा. यानी कमजोर मॉनसून जहां भारत की चिंता बढ़ा रहा है वहीं, अल नीनो का खतरा भी लगातार बना हुआ है. आसमान से ग़ायब होते मॉनसून के बादल फ़िलहाल अच्छा संकेत नहीं दे रहे हैं.
आशुतोष मिश्रा