होर्मुज बंद, तो क्या रूस से फिर तेल खरीदेगा भारत? जानें ईरान संकट का क्या होगा असर

अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने के ऐलान से वैश्विक तेल बाजार में हलचल है. दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल-गैस आपूर्ति और भारत के लगभग 50 प्रतिशत कच्चे तेल आयात इसी रास्ते से होते हैं. हालांकि भारतीय रिफाइनरियों के पास 10-15 दिन का कच्चा तेल और 7-10 दिन का ईंधन स्टॉक मौजूद है, साथ ही रणनीतिक भंडार भी उपलब्ध है, इसलिए फिलहाल तात्कालिक संकट की आशंका नहीं है.

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अमेरिका-इजरायल के साथ सैन्य संघर्ष के बीच ईरान स्ट्रेट आफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही रोक रहा. (Photo: Reuters) अमेरिका-इजरायल के साथ सैन्य संघर्ष के बीच ईरान स्ट्रेट आफ होर्मुज में जहाजों की आवाजाही रोक रहा. (Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:13 PM IST

अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों और बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने का ऐलान किया है. यह दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है, जहां से करीब 20 प्रतिशत वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है. हालांकि भारतीय अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल भारत को तेल आपूर्ति में कोई तात्कालिक संकट नहीं होगा.

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अधिकारियों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियों के पास 10 से 15 दिन का कच्चे तेल का स्टॉक मौजूद है. इसके अलावा पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन का भंडार भी 7 से 10 दिन की जरूरत पूरी कर सकता है. इसलिए अगर होर्मुज जलडमरूमध्य थोड़े समय के लिए बंद रहता है तो भारत पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा.

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होर्मुज के रास्ते आता है 50% तेल

भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल और लगभग आधी प्राकृतिक गैस आयात करता है. Kpler के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के कुल कच्चे तेल आयात का करीब 50 प्रतिशत यानी 25 से 27 लाख बैरल प्रतिदिन होर्मुज के रास्ते आता है. यह तेल मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है.

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भारत के करीब 60 प्रतिशत एलएनजी आयात भी इसी रास्ते से होते हैं, जो मुख्य रूप से कतर और यूएई से आते हैं. वहीं लगभग पूरी एलपीजी आपूर्ति भी इसी मार्ग से होती है. ऐसे में अगर यह मार्ग लंबे समय तक बंद रहता है तो गैस और एलपीजी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है.

रूस से तेल आने में लगता है एक महीना

अधिकारियों का कहना है कि अगर संकट लंबा खिंचता है तो भारत अपने आयात स्रोतों में बदलाव कर सकता है. जरूरत पड़ने पर रूस से फिर से तेल खरीद बढ़ाई जा सकती है. हालांकि रूस से तेल आने में कम से कम एक महीना लगता है, जबकि मध्य पूर्व से सिर्फ पांच दिन में जहाज भारत पहुंच जाते हैं. इसलिए समय रहते ऑर्डर देना जरूरी होगा.

इसके अलावा भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी है, जो लगभग एक हफ्ते की जरूरत पूरी कर सकता है. एक अधिकारी ने कहा कि फिलहाल दुनिया में कच्चे तेल की पर्याप्त आपूर्ति है और भारत वेनेजुएला, ब्राजील या अफ्रीकी देशों से भी खरीद बढ़ा सकता है.

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अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दिख रहा असर

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इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर असर दिखने लगा है. ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 73 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है, जो सात महीने का उच्च स्तर है. साल की शुरुआत से अब तक कीमतों में लगभग 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है. अगर आपूर्ति बाधित होती है तो कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक पूरी तरह नाकाबंदी की संभावना कम है, लेकिन अस्थायी रुकावट से इनकार नहीं किया जा सकता. फिलहाल सबसे बड़ा खतरा आपूर्ति की कमी से ज्यादा कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव और उसके आर्थिक असर का है. सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और वैकल्पिक योजनाओं पर काम कर रही है.

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