मुस्लिम पक्ष को जमीन की पेशकश, देवी की मूर्ति UK से वापस लाने का निर्देश... भोजशाला पर आए फैसले की 10 बड़ी बातें

मध्य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला परिसर को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है जिसमें परिसर को देवी वाग्देवी का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र माना गया है। अदालत ने मुस्लिम पक्ष की याचिकाएं खारिज करते हुए ASI की रिपोर्ट पर भरोसा जताया.

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धार भोजशाला परिसर को मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट ने मंदिर करार दिया है धार भोजशाला परिसर को मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट ने मंदिर करार दिया है

संजय शर्मा / सृष्टि ओझा / धर्मेंद्र साहू

  • नई दिल्ली,
  • 15 मई 2026,
  • अपडेटेड 4:49 PM IST

मध्य प्रदेश के धार जिले में मौजूद भोजशाला परिसर को लेकर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने शुक्रवार को इस मामले में फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर माना है. कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं को खारिज कर दिया और साथ ही यह फैसला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट के आधार पर लिया गया है, जिस पर अदालत ने भरोसा जताया है.

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भोजशाला मामले में अदालत के फैसले ने परिसर को देवी वाग्देवी के मंदिर के रूप में मान्यता दी है. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हाई अलर्ट पर हैं. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में जो सबसे अहम बात कही है वह मुस्लिम पक्ष को लेकर कही. हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो धार जिले में नमाज जारी रखने के लिए सरकार से अलग जमीन की मांग कर सकता है.

कोर्ट की अहम टिप्पणी

1. हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए जो टिप्पणियां की वो अहम हैं. ASI की सर्वे रिपोर्ट पर भरोसा जताते हुए हाईकोर्ट ने धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा का केंद्र माना है. अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और ASI की वैज्ञानिक जांच से यह साबित होता है कि भोजशाला मूल रूप से राजा भोज के समय का संस्कृत अध्ययन केंद्र था.

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2. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और अदालत वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर सुरक्षित रूप से भरोसा कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि उसने उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री, सर्वे रिपोर्ट और सभी पक्षों की दलीलों पर विचार किया है.

3. अदालत ने कहा कि हर सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि वह प्राचीन स्मारकों, ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं तथा धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित करे.

4. हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारों की जिम्मेदारी केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि तीर्थयात्रियों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है.

5. हाईकोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि विवादित स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई. अदालत ने माना कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह स्थापित होता है कि विवादित क्षेत्र का मूल चरित्र भोजशाला के रूप में था, जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत शिक्षा केंद्र था.

6. हाईकोर्ट ने कहा कि विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर एक संरक्षित स्मारक है, जिसे 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त है.

7. हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस क्षेत्र का धार्मिक चरित्र भोजशाला और देवी वाग्देवी सरस्वती मंदिर के रूप में स्थापित होता है.

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8. हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 में ASI द्वारा जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें हिंदू पक्ष के पूजा अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए थे और मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी गई थी. कोर्ट ने कहा कि 2003 का आदेश हिंदू पक्ष के अधिकारों को सीमित करता था, इसलिए उसे निरस्त किया जाता है.

9. हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और ASI को भोजशाला परिसर के प्रबंधन और व्यवस्था को लेकर निर्णय लेने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि पूरे परिसर का प्रशासन और प्रबंधन ASI ही जारी रखेगा.

10. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुस्लिम पक्ष के लिए भी टिप्पणी की. हाईकोर्ट ने कहा कि मुस्लिम समुदाय चाहे तो धार जिले में नमाज जारी रखने के लिए सरकार से अलग जमीन की मांग कर सकता है. 

यह भी पढ़िए- मध्यप्रदेश में एक नहीं, तीन भोजशालाएं थीं, तीनों का अतीत विध्वंस से भरा

इस फैसले को भोजशाला विवाद में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है. लंबे समय से हिंदू पक्ष यह दावा करता रहा है कि भोजशाला देवी सरस्वती का मंदिर और प्राचीन संस्कृत विश्वविद्यालय था, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है. ASI की हालिया सर्वे रिपोर्ट में भी परिसर के भीतर मंदिरनुमा अवशेष, मूर्तिकला और स्थापत्य संबंधी कई संकेत मिलने की बात कही गई थी.

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि वैज्ञानिक और पुरातात्विक निष्कर्षों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह भी दोहराया कि देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण संविधान की भावना का हिस्सा है और सरकारों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए.
 

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