मध्यप्रदेश में एक नहीं, तीन भोजशालाएं थीं, तीनों का अतीत विध्वंस से भरा

परमार राजाओं ने धार में जिस भोजशाल और सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया, वह सुल्तान शासनकाल में विध्वंस का शिकार हुई. उसे न सिर्फ तोड़ा गया, बल्कि, उसी भोजशाला पर एक मस्जिद तामीर करवा दी गई- कमाल मौला मस्जिद. जब जब जुमा यानी शुक्रवार को वसंत पंचमी होती है, धार की भोजशाला को लेकर माहौल गर्म होने लगता है. जबकि ये सिर्फ धार का नहीं, दो और भोजशालाओं का भी कड़वा अतीत है.

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धार भोजशाला में कोई नेत्र हीन भी पत्थर टटोलकर बता देगा कि वह किसी मंदिर में है. (Photo Credit: India Today Archive) धार भोजशाला में कोई नेत्र हीन भी पत्थर टटोलकर बता देगा कि वह किसी मंदिर में है. (Photo Credit: India Today Archive)

व‍िजय मनोहर त‍िवारी

  • नई दिल्ली,
  • 23 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:17 AM IST

परमार राजवंश में राजा भोज ने अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था. ऐसी दो और भोजशालाएं थीं, जिन्हें ध्वस्त कर दिया गया था. पहली भोजशाला थी- उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में. राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे. ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण.

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ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद तीन सौ वर्षों तक ये केंद्र सक्रिय रहे. परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया. उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए. धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय 'मंडपदुर्ग' के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था.

साल 2000-2001 में मुझे परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के साथ इन तीनों भोजशालाओं को निकट से देखने का अवसर मिला था. वह वाकई रोमांचकारी अनुभव था, जिनके प्रमाण दस्तावेजों में भी बिखरे हुए हैं.

उज्जैन में कहां थी भोजशाला

महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है. डॉ. भट्‌ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहाँ कई बार आए थे. उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया. मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था.

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इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक 'भोजराज' में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं. उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर 'बिना नींव की मस्जिद' कहलाता है. इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया. यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी.

उज्जैन के अनंत पेठ क्षेत्र में बिना नींव की मस्जिद. एक ऐसा स्मारक, जिसके लिए नींव नहीं भरनी पड़ी. अर्थात् पहले से ही कुछ था, जिसे ध्वस्त करके ऊपर यह कारनामा किया गया. (फोटोः विजय मनोहर तिवारी)

मांडू में कहां थी भोजशाला

शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खाँ का मकबरा है. 'विक्रम स्मृति ग्रंथ' में एक अध्याय है-मांडव के प्राचीन अवशेष. इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था. किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे. सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी. उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट 'परमारों की तीन भोजशालाएं' विषय पर शोध पत्र भी पढ़ा था. किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य आ नहीं पाए. 

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इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक है-'धार एंड मांडू.' 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है. वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था.

मांडू के शाही परिसर में यह मकबरा कहीं का ईंट कहीं का रोढ़ा स्पष्ट दिखेगा. प्राचीन मंदिर के मलबे पर निर्माण है. (फोटोः विजय मनोहर तिवारी)

कौन था दिलावर खां

दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खाँ गौरी को मालवा के नियंत्रण के लिए भेजा गया था. अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव की पराजय के बाद वे मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे. तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खाँ ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया. संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान् स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई. मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है. मांडू म्युजियम में इस्लामी दौर के विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं.
राजा भोज का रचना विश्व: 

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संग्रहालय की लाइब्रेरी में 417 पेज का यह शोध ग्रंथ भी भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है. इसके विभिन्न अध्यायों में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है. वे कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे. उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी. उनकी विद्वानों की परिषद में पाँच सौ से अधिक सृजनशील लोग थे. इनके लिए ही धार में सरस्वती कंठाभरण या शारदासदम् नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था. इसके पेज 309 पर शारदासदम को भारती भवन भी कहा गया है. यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है. यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भग्रह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था.

गुजरात के राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन

राजपुरोहित के अनुसार राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में यहाँ आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे. यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे. एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का. पेज 315 पर उल्लेख है कि मंडपदुर्ग के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्‌ट के पुत्र धनपति भट्‌ट को भोज ने भूमिदान की थी. एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी.

(इस लेख को लिखा है विजय मनोहर तिवारी ने, वे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं)

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