मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने मोर्चा खोल दिया है. उनके खिलाफ महाभियोग की तैयारी तेज है. कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत करीब 14 दलों ने एकजुट होकर 193 सांसदों के हस्ताक्षर जुटा लिए हैं. राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि दोनों सदनों से प्राप्त आदेश की प्रति में कई त्रुटियां हैं.
नियमों के मुताबिक, महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं. विपक्ष ने 193 हस्ताक्षर जुटाकर प्राथमिक बाधा तो पार कर ली है, लेकिन असली चुनौती प्रक्रिया के तकनीकी चरणों में छिपी है. विपक्षी खेमे में इस वक्त 300 से अधिक सांसदों का समर्थन होने का दावा किया जा रहा है.
इसमें RJD, AAP, NCP और वामपंथी दल भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज होने पर अभिषेक मनु सिंघवी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने पूरी कार्यवाही को संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ बताया है. उनका तर्क है कि महाभियोग के छह स्पष्ट चरण होते हैं, जिनका पालन नहीं किया गया है.
पहला चरण प्रस्ताव की जांच-परख, दूसरा चरण समिति का गठन, तीसरा आरोपों की तैयारी, चौथा समिति की रिपोर्ट, पांचवां संसद में रिपोर्ट पर चर्चा और छठा राष्ट्रपति का आदेश. सिंघवी ने कहा कि पीठासीन अधिकारी की भूमिका केवल प्रथम दृष्टया राय देने तक सीमित होती है. लेकिन इस बार उन्होंने ऐसा किया जैसे एक 'मिनी ट्रायल' चला दिया हो.
इसका मतलब है कि प्रस्ताव को पहले चरण में ही नकार दिया गया और आगे की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई. उन्होंने कहा, "पीठासीन अधिकारी का काम केवल प्राथमिक आधार देखना है, लेकिन प्रस्ताव को पहले ही चरण में ठप करके बाकी पांच चरणों का गला घोंट दिया गया है." महाभियोग को लेकर उठ रहे सवालों ने विपक्ष की मुश्किलों को बढ़ा दिया है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करते रहे, तो संसद के पटल तक इसे ले जाना असंभव होगा. इसे कानून का 'मनमाना इस्तेमाल' करार देते हुए विपक्ष अब कानूनी और राजनीतिक दोनों मोर्चों पर घेरने की योजना बना रहा है. विपक्षी दल अगले दो दिनों में एक उच्चस्तरीय बैठक करने जा रहे हैं.
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