रिलायंस के खिलाफ FIR की मांग पर CBI ने बॉम्बे हाईकोर्ट से कहा- याचिका खारिज करें

यह मामला गैस माइग्रेशन विवाद से जुड़ा है, जिसमें आरआईएल पर सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने का आरोप है. सीबीआई ने कहा कि याचिकाकर्ता मारू की याचिका टिकाऊ नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए. मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

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(File Photo: PTI) (File Photo: PTI)

विद्या

  • मुंबई,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:36 PM IST

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कहा है कि अगर ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) या केंद्र सरकार रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (RIL) के खिलाफ जांच की मांग करती है तो एजेंसी कार्रवाई करेगी. लेकिन किसी तीसरे पक्ष की याचिका पर एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती.

ये हलफनामा सीबीआई ने अधिवक्ता कुलदीप पाटिल के जरिए मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस गौतम ए. अंखड़ की खंडपीठ के समक्ष दाखिल किया. अदालत दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव के निवासी सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र मारू की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. मारू ने आरोप लगाया है कि गैस माइग्रेशन मामले में आरआईएल ने सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया इसलिए उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए.

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क्या है ये पूरा मामला 

मामला करीब ढाई दशक पुराना है. 12 अप्रैल 2000 को केंद्र सरकार ने आरआईएल और निको लिमिटेड के साथ प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) किया था. इसके तहत आंध्र प्रदेश तट के पास कृष्णा-गोदावरी बेसिन में पेट्रोलियम अन्वेषण का लाइसेंस दिया गया. वहीं ओएनजीसी और केर्न एनर्जी इंडिया लिमिटेड को सटे हुए ब्लॉक आवंटित किए गए.

2013 में ओएनजीसी ने केंद्र को लिखा कि दोनों ब्लॉकों के बीच गैस भंडार में 'लैटरल कंटिन्यूटी' यानी आपसी जुड़ाव के सबूत हैं और गैस एक ब्लॉक से दूसरे में माइग्रेट हुई है. इसके बाद ओएनजीसी ने 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट में आरआईएल और केंद्र के खिलाफ याचिका दायर की.

सुनवाई के दौरान ओएनजीसी और आरआईएल ने तीसरे पक्ष से स्वतंत्र अध्ययन कराने पर सहमति दी. 19 नवंबर 2015 को आई रिपोर्ट में दोनों ब्लॉकों के रिजर्वॉयर के बीच कनेक्टिविटी की बात कही गई. इसके आधार पर केंद्र ने अगस्त 2016 के बाद आरआईएल को करीब 15.52 करोड़ डॉलर और ब्याज के रूप में 17.49 करोड़ डॉलर की मांग का नोटिस जारी किया.

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आरआईएल ने इस पर मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का रास्ता अपनाया, जहां फैसला उसके पक्ष में आया. केंद्र ने इसे सार्वजनिक नीति के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी. मामला दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ से होते हुए खंडपीठ तक गया, जहां अंततः केंद्र के पक्ष में फैसला आया. यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

सीबीआई के एसपी बी.बी. चक्रवर्ती ने हलफनामे में कहा कि एजेंसी को पहले भी शिकायतें मिली थीं, लेकिन यह विवाद सिविल प्रकृति का है और इसमें कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता. दिल्ली हाईकोर्ट ने भी कभी एफआईआर दर्ज करने का निर्देश नहीं दिया.

सीबीआई ने कहा कि याचिकाकर्ता मारू इस मामले में तीसरे पक्ष हैं. अब तक न तो केंद्र सरकार और न ही ओएनजीसी ने सीबीआई से एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया है. अगर वे ऐसा करते हैं तो एजेंसी कानून के मुताबिक कार्रवाई करेगी. एजेंसी ने साफ कहा कि मारू की याचिका कानून और तथ्यों के आधार पर टिकाऊ नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए.

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