एक समय ऐसा था जब लाल आतंक इस तरीके से फल फूल रहा था, कि लगता था कि ये ख़त्म ही नहीं होगा पर मैंने अपनी आंखों से देखा कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का एक निर्णय कि नक्सलवाद को देश की जमीन से जड़ से उखाड़ फेंकेंगे, इस संकल्प और 31 मार्च 2026 की डेडलाइन तय करना एक तरीके का नक्सलवाद के खात्मे के लिए उसकी ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ. मैंने देखा कि गृह मंत्री के संकल्प को मूर्त रूप करने के लिए सुरक्षा बल राज्यों की सरकारें और खुफिया तंत्र ने किस तरीके से दिन-रात समन्वय स्थापित कर काम किया, जिसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद भारत की जमीन से समाप्ति की पूरी राह तय कर गया.
खुफिया विभाग के एक अधिकारी से मैं रूबरू हो रहा था, उस दौरान मैंने जाना कि किस तरीके से डेडलाइन तय करने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए समन्वय स्थापित करने के लिए सीक्रेट मीटिंग दिल्ली से लेकर रायपुर सहित दूसरे राज्यों में किया. जिसका परिणाम आज सबके सामने है.
यही नहीं IB के अधिकारी ने यह भी बताया कि नक्सलवाद की डेडलाइन तय होने के बाद जब अबूझमाड़ के जंगलों में फोर्सेस एंट्री कर रही थी तो उस दौरान दो महत्वपूर्ण ऑपरेशन ने इस पूरे इलाके में सुरक्षा बलों की दशा और दिशा ही बदल दी. यह महत्वपूर्ण ऑपरेशन थे, छत्तीसगढ़ के धर्मावरम और टेकलगुडियम्म और कुर्राई गुट्टा के ऑपरेशन जिसमें सुरक्षा बलों ने नक्सलियों को धूल चटा दी थी.
उसके बाद सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा था और नक्सली बैकफुट में चले गए जिसका परिणाम यह हुआ कि आगे के जितने भी ऑपरेशन हुए उसमें सुरक्षा बलों ने बड़ी सफलता हासिल हुई, अब तक नक्सलियों की मांद में घुसकर उनको वहीं ढेर करने का बड़ा अभियान सफल रहा और नक्सलवाद खत्म हुआ.
कुर्राई गुट्टा के ऑपरेशन के दौरान मैं खुद उन पहाड़ियों तक पहुंचा जहां पर हमने देखा कि नक्सलियों ने किस तरीके से इस पूरे इलाके को राजधानी के तौर पर बना रखा था. जहां पर नक्सलियों ने सैकड़ो विस्फोटक और हथियारों का डंप छुपा रखा था. यहां की पहाड़ियों में लोग बोलते थे की जाना मुश्किल था पर सुरक्षा बलों के ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट ने यह तय कर दिया कि यहां अब नक्सलियों का नामोनिशान नहीं रहेगा, और वही हुआ 31 से ज्यादा नक्सलियों को एक ही जगह एक ऑपरेशन में ढेर किया गया.
हां से नक्सली भाग खड़े हुए, मैं इस इलाके में हेलीकॉप्टर के जरिए गया क्योंकि यह डर था कि इस इलाके में रास्तों में आईडी बिछा है, नक्सली जिससे कि बड़ा खतरा पैदा कर सकते है पर हमने कुछ इलाका हेलीकॉप्टर से तय किया और उसके बाद मोटरसाइकिल के जरिए कोरी गुट्टा की पहाड़ियों में पहुंचे.
जी हां आपको आंखों देखी बता रहे है कि इस जंगल को पिछले साल सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के कब्जे से कैसे मुक्त कराया. 21 अप्रैल 2025 को शुरू हुए ऑपरेशन के दौरान 21 दिन तक चली कार्रवाई में 31 नक्सली ढेर हुए. सूत्रों के अनुसार सुरक्षाबलों ने 214 बंकरों को ध्वस्त कर दिया और माओवादियों की करीब चार तकनीकी इकाइयों को भी नष्ट कर दिया. यह अभियान अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में गिना जा रहा है.
कर्रेगुट्टा की पहाड़ी रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. लगभग 900 मीटर ऊंची इस दुर्गम पहाड़ी में सैकड़ों गुफाएं हैं, जिन्हें नक्सली लंबे समय से अपने कैंप और हथियार बनाने की इकाइयों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे. यही कारण है कि इसे नक्सलियों की “राजधानी” तक कहा जाता था. इस राजधानी तक पहुंचने के लिए हमने सुरक्षा बलों सीआरपीएफ के कोबरा कमांडो और राज्य पुलिस की डीआरजी के साथ बाइक के जरिए नदियों का रास्ता तय करते हुए कुर्रेगुट्टा की पहाड़ियों तक पहुंचे. जहां देखकर मैं दंग रह गया कि किस तरीके से यहां पर गुफाओं के अंदर हथियारों का डंप छिपा रखा है और कैसे बड़े हथियारों का जखीरा और फैक्ट्रियां यहां पर बना रखी थी, पर यह सुरक्षा बलों की एक बहुत बड़ी कामयाबी थी जिसने इन नक्सलियों की ताबूत में आखिरी कील ठोक दी.
रेड कॉरिडोर क्या था? जिसको भेदपाना था नामुमकिन
नक्सलियों ने तिरुपति से पशुपति तक रेड कॉरिडोर का सपना देखा था. उस रेड कॉरिडोर को पूरी तरीके से ध्वस्त कर दिया गया है. 35 वर्षों तक जिस अबूझमाड़ को नक्सलियों का किला माना जाता था वहां देश के सुरक्षा बलों ने महज़ 35 से 40 महीनों में बड़े -बड़े ऑपरेशन चलाकर नक्सलियों के गढ़ में कब्जा स्थापित कर लिया है. 7 राज्यों में फैले नक्सलियों के "लाल आतंक" को भी सुरक्षा बलों ने समाप्त कर दिया है. दरअसल छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, झारखंड और ओडिशा नक्सल प्रभाव से तकरीबन मुक्त हो चुके हैं. कभी रेड कॉरिडोर में करीब 6500 से ज्यादा हथियारबंद नक्सली सक्रिय थे, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर लगभग जीरो रह हो गई है.
पिछले एक साल में नक्सल संगठन के 22 से ज्यादा सेंट्रल कमेटी सदस्य या तो मारे गए या उन्होंने सरकार के आगे सरेंडर किया. झारखंड में अब केवल एक सेंट्रल कमेटी सदस्य मिसिर बेसरा बचा है, जिसके भी जल्द मुख्य धारा में जुड़ने की संभावना जताई जा रही है. करीब 3 साल पहले तक लाल गलियारा का एरिया लगभग 1200 किलोमीटर तक फैला हुआ था और लगभग 94 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल क्षेत्र में नक्सलियों का कब्जा माना था. इस इलाके में सुरक्षा बलों ने अभियान चलाकर नक्सलियों को तो खत्म किया ही साथ ही यहां पर मौजूद 300 से ज्यादा नक्सलियों के इस मार्को और हजारों की संख्या में हथियार गोला बारूद और नक्सलियों के गोला बारूद के डंप बरामद किए गए.
महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा से लगा अबूझमाड़ का ट्राई जंक्शन नक्सलियों का मुख्य आधार क्षेत्र था, लेकिन एक साल के भीतर यह इलाका भी नक्सलवाद से पूरी तरीके से खत्म हो गया. यहां के नक्सलियों में या तो सरेंडर किया या फिर उनको सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन में ढेर किया. इस पूरी रणनीति में बस्तर और गढ़चिरौली पुलिस की विशेष योजना और संयुक्त ऑपरेशनों, सभी सुरक्षा बलों के समन्वय और खुफिया जानकारी की अहम भूमिका रही.
नक्सलवाद के खात्मे में गृह मंत्री अमित शाह का प्रवेश और नई सोच
नक्सल इलाके के जानकार एक एक्सपर्ट से हमारी बातचीत हो रही थी हमने जब उनसे बात किया तो उन्होंने कहा कि नक्सलवाद को जिस तरीके से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने खत्म करने का दृढ़ संकल्प किया था, वैसे इसके पहले के किसी भी गृहमंत्री के द्वारा ऐसे दृढ़ संकल्प नहीं लिए गए, जिसका परिणाम भी सामने दिख रहा है उन्होंने यह भी बताया कि गृहमंत्री अमित शाह का नक्सलवाद को खत्म करने की डेडलाइन तय करना सुरक्षा बलों को एक तरीके की ताकत और उनका टारगेट तय कर दिया जिसके चलते इतनी तेजी से मात्र 35 महीने में नक्सलवाद खत्म करने में बड़ा कदम बढ़ाया गया.
मैं अपनी अगर बात करूं तो मैं उस वक्त भी मौजूद था जब अमित शाह ने यह ऐलान किया कि नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक खत्म कर देंगे उस दौरान लोग एक दूसरे की तरफ देख रहे थे, और उनको लग रहा था कि इतना कठिन टारगेट कैसे पूरा होगा पर जिस तरीके का दृढ़ संकल्प और समन्वय गृह मंत्री ने स्थापित किया, वैसे में आज का दिन है कि यह बड़ी सफलता कदम चूम रही है, जब से डेडलाइन तय किया गया तब से हमने खुद देखा कि केंद्रीय गृह मंत्री हर महीने या तो छत्तीसगढ़ या दूसरे नक्सल प्रभावित राज्य में गए हैं या फिर दिल्ली में उन्होंने नक्सल मुक्त भारत और इसके खात्मे को लेकर बड़ी बैठक की.
उन तमाम बैठकों में मेरी खुद की मौजूदगी एक जर्नलिस्ट के तौर पर रही है और मैंने देखा कि किस तरीके से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सुरक्षा बलों राज्यों के मुख्यमंत्री और इसके साथ-साथ इंटेलिजेंस के अधिकारियों को निर्देश देते थे. जिसका परिणाम यह रहा कि आज भारत नक्सल मुक्त भारत की बन चुका है.
पिछले 10 साल में नक्सलवाद कैसे हुआ ख़त्म?
मुझे वह समय याद है जब नक्सली इलाकों में जाना दूभर हो जाता था क्योंकि मैं जब भी इन इलाकों में गया तो एक खतरा यह रहता था कि आईईडी ब्लास्ट हो जाएगा क्योंकि नक्सलियों ने सड़कों पर और कई इलाकों में "फॉक्स होल" बना करके IED को लगा रखा था और मौका पढ़ने पर उसको ब्लास्ट कर देते थे कई बार देश के जवानों को भी बड़ी क्षति पहुंची, पर केंद्र सरकार की नक्सलवाद पर निर्णायक रणनीति ने नक्सलवाद के खात्मे पर बड़ा असर डाला. निर्णायक हस्तक्षेपों के ज़रिए नक्सल प्रभावित सबसे अधिक जिलों की संख्या 2014 में 36 से घटकर 2025 में केवल 3 रह गई है और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित कुल जिलों की संख्या 2025 तक 126 से घटकर मात्र 11 रह गई. 10 साल का आंकड़ा ये बताता है कि दस वर्षों में नक्सली हिंसा में उल्लेखनीय कमी आई है. 2004-2014 से 2014-2024 की अवधि में हिंसक घटनाओं में 53% की कमी आई, (16,463 से घटकर 7,744). सुरक्षा बलों की मृत्यु में 73% की कमी आई (1,851 से घटकर 509) नागरिकों की मृत्यु में 70% (4,766 से घटकर 1,495) की कमी आई.
2025 और 2026 का साल रहा निर्णायक
साल 2025 से 2026 अब तक 463 नक्सलियों को मार गिराया गया है, 1600 को गिरफ्तार किया गया है और 2500 ने आत्मसमर्पण किया है,
अकेले 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया. कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया गया है, जिनमें 2024 में 1 केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं. प्रमुख सफलताओं में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कट्टर नक्सलियों का मारा जाना, 23 मई 2025 को बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण और अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ (197) और महाराष्ट्र (61) में 258 का आत्मसमर्पण शामिल है, जिनमें आत्मसमर्पण करने वालों में 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल हैं.
ऑपरेशनल बदलाव,और बड़े बड़े ऑपरेशन
नक्सली इलाके के ऑपरेशन और वहां की रणनीति में विशेष तरीके का बदलाव किया गया. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब डेडलाइन तय कर दी तो उसके बाद यह तय हुआ कि नक्सलियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन किए जाएंगे उसके लिए भारी साजों सामान और सुरक्षा बलों की तैयारी की समीक्षा बैठक की गई. बैठक में यह तय किया गया कि इन तमाम इलाकों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB )बनाए जाएंगे. जिसमें की सुरक्षा बल जंगलों में घुसकर नक्सलियों के खिलाफ ऐसे ऑपरेशन करेंगे जिससे कि उनका पूरा अंत हो जाए.
ऐसे ही एक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस छत्तीसगढ़ के बीजापुर के गुंडम में हमें जाने का मौका मिला. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी नक्सलियों के इस गढ़ में पहुंचे थे उसे दौरान हमने देखा की सुरक्षा बलों को वह तमाम हथियार दिए गए थे, जिनको कि नक्सली भेद नहीं सकते थे एक सबसे बड़े टैंक नुमा आर्म्ड व्हीकल की चर्चा बहुत थी, जिसको कि नक्सली देख करके घबराते थे और नक्सली कहते थे की सुरक्षा बल टैंक लेकर आ गए,जबकि यह टैंक नहीं था यह व्हील आर्मर्ड प्लेटफार्म व्हीकल था जो टैंक की तरीके से दिखता था. इसके साथ ही इस इलाके में ह्यूमन इंटेलिजेंस को बढ़ाया गया, साथ ही ड्रोन से गतिविधि बहुत ही तेज की गई, वैसे ड्रोन लगाए गए जो की 15 किलोमीटर की रेडियस में चारों तरफ निगरानी रख सकता थे और लाइव तस्वीर सुरक्षा बलों को दे सकते थे. इन्हीं तमाम आधुनिक गैजेट्स ने सुरक्षा बलों को इस पूरे इलाके में अपरहैंड दिया जिसके चलते नक्सलियों का पूरा खात्मा हुआ.
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में गुंडम एक ऐसी जगह थी जहां पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उन मासूम जनजाति लोगों से भी मुलाकात किया था जो कि इस इलाके में विकास से अछूते थे. मैंने देखा कि गृह मंत्री अमित शाह इन तमाम जनजाति लोगों से जब मिल रहे थे तो गांव वालों के अंदर एक तरीके का उत्साह दिख रहा था और उनको लग रहा था कि इस लाल आतंक से उनको बड़ी मुक्ति मिल रही है. एक व्यक्ति से मैं वहां पर जब बात किया तो उन्होंने बताया कि यहां पर न तो अब तक अस्पताल पहुंचा है और न ही यहां पर उनका राशन मिलता है. हमने देखा कि गुंडम फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस के बगल में ही अस्पताल और स्कूल और राशन की दुकान को सुरक्षा बलों ने सुरक्षित जगह पर खोला था और बढ़-चढ़कर इन गांव वालों ने शायद पहली बार ही यहां पर इस तरीके का विकास देखा होगा.
हमने गांव के एक व्यक्ति से बात किया तो उसने बताया कि यहां से करीब 8 किलोमीटर दूर नक्सली कमांडर हिड़मा का भी गांव है. पूर्ववर्ती हालांकि हिड़मा को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया है पर हिड़मा का एक खौफ था और आसपास के गांव वाले कभी भी उसके खिलाफ नहीं जाते थे पर अब जबकि हिड़मा को मारा जा चुका है तो अब इस इलाके में भी विकास की बयार बह रही है.
बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा की ज़मीनी सच्चाई, सरेंडर नक्सलियों से बातचीत
बस्तर ,दंतेवाड़ा,सुकमा, बीजापुर के तमाम इलाकों के गांव-गांव तक हमने रिपोर्टिंग के दौरान देखा कि पिछले कुछ सालों में किस तरीके से यहां पर परिवर्तन हुआ है. पहले इन इलाकों में जाना इन सड़कों में मोमेंट करना कठिन था, इसी वजह से यह तमाम इलाके अबूझ पहेली के तौर पर जाने जाते थे पर जब से गृह मंत्री अमित शाह ने तय किया कि यहां से नक्सलवाद तो खत्म कर दिया जाएगा, साथ ही विकास की बयार भी बहेगी. उसी का परिणाम यह रहा कि इन इलाकों को जो अबूझमाड़ कहा जाता था वह अब बूझ (जानने वाली जगह) हो गई. रायपुर से जगदलपुर और जगदलपुर होते हुए नारायणपुर, सुकमा और बीजापुर में तमाम इलाकों का कई बार हमने जंगलों के रास्ते से दौरा किया इसके साथ ही यहां पर सरेंडर नक्सलियों से भी बातचीत की. नक्सलियों ने एक से एक अपनी कहानी सुनाई और कहा कि वह भी 2 दिन की जिंदगी जीना चाहते हैं.
आजतक संवाददाता जितेंद्र बहादुर सिंह से नक्सली ने कहा कि वह दो दिन की जिंदगी जीना चाहता है.
आजतक संवाददाता जितेंद्र बहादुर सिंह ने नक्सल के उस गढ़ में जाकर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार किया है जिस एरिया को हमेशा के लिए अबूझ माना जाता था. अबूझमाड़ के इन जंगलों में सरेंडर किए हुए नक्सलियों से बातचीत किया तो कई चौंकाने वाले खुलासे इसमें निकलकर सामने आए हैं. सबसे पहले आपको बताते हैं नक्सलियों के डॉक्टर जिन्होंने कुछ दिन पहले सरेंडर किया है, नक्सलियों के डॉक्टर सुकलाल झुर्री, इनके ऊपर ₹8 लाख रुपए का इनाम रहा है. यह नक्सलियों का इलाज करता था इसके साथ-साथ नक्सलियों की नसबंदी भी इसके द्वारा किया जाता था. नसबंदी करने के पीछे यह था कि अगर यह नक्सली यहां पर शादी करने के बाद बच्चे पैदा करने लगेंगे तो लड़ाई नहीं कर सकते हैं. इसलिए जो यहां डॉक्टर थे वह लोग उनकी नसबंदी कर देते थे जिससे कि यह लोग बच्चे पैदा ना कर सके. इस वजह से लोकल लोग जो नक्सली बनते थे उनको ट्रेंड करके डॉक्टर बनाया जाता था और यही लोग नक्सलियों के नसबंदी करने का काम करते थे. यह बड़ा कदम इनके द्वारा उठाया जाता था.
सुखलाल झुर्री एक बार 2010 में नक्सली कमांडर हिड़मा से भी मुलाकात कर चुका है उसने बताया कि हिड़मा को इसने दूर से देखा पर उससे बातचीत नहीं हो पाई थी. हिड़मा बहुत दुबला पतला था. शासन की पुनर्वास नीति के तहत नक्सलियों के इस डॉक्टर ने सरेंडर किया है और किसीने कहा कि उसको अब अच्छा लग रहा है. अब हम सुकून भरी जिंदगी जी रहे है. एक आदमी मरना नहीं चाहता है हर एक आदमी दो दिन की जिंदगी जीना चाहता है.
जब मेरी मुलाकात नक्सलियों के बॉडीगार्ड से हुई
हिड़मा अब तो मारा जा चुका है पर उसके बॉडीगार्ड के तौर पर काम करने वाले अरुण कुमरा ने आजतक से नारायणपुर के जंगलों में बताया कि वह अलग जंगलों में काम करता रहा. उसपर 10 लाख का इनाम था. 2022 में अरुण कुमरा हिड़मा से मिला था उसके बॉडिगार्ड के तौर पर काम किया था, पर क्या बातचीत करते थे ये जानकारी नहीं मिलती थी, नक्सलियों ने 16 साल की उम्र में इस नक्सली बॉडीगार्ड को भर्ती किया था, अब जंगलों में पुलिस का दबाव है. सरेंडर करने के बाद अब खुश है कहा अब मारे नहीं जाएंगे.
जंगलों में घूमते हुए मेरी मुलाकात सरेंडर किए हुए नक्सली अरभ से हुई, जो पहले नक्सलियों के लिए खुफिया का काम करता था. अब डीआरजी के साथ मिलकर सुरक्षा बलों के लिए इंटेलिजेंस इकट्ठा करते है. इसने आजतक को जानकारी दी कि मैं बीजापुर जिला का हूं नक्सली संगठन में कमलेश के नाम से मैं जाना जाता हूं. तबादला नारायणपुर में मॉड डिवीजन में जब हुआ तब मेरा नाम बदलकर अरभ नाम रख दिया गया. अब से इसी नाम से जाना जाता हूं.
2004-5 में सलवा जुडूम चालू हुआ था तो हमारे क्षेत्र में हमारे गांव को जला दिया गया था. तब मैं नक्सलवाद को ज्वाइन किया था, इसने यह भी जानकारी दिया कि सीआरपीएफ की 76 जवान जिनके खिलाफ हिड़मा ने ऑपरेशन किया था उस दौरान मैं भी उस ऑपरेशन में मौजूद था, लेकिन अब मैं जो सुरक्षा बल के साथ मिलकर के काम कर रहा हूं. पहले हमारी स्थिति बहुत ज्यादा खराब थी, अब हमारी स्थिति सरेंडर करने के बाद बेहतर है और सरकार की योजनाओं का लाभ मिल रहा है.
इसी क्रम में मंगतू नाम के एक नक्सली से हमारी मुलाकात हुई. मंगतू नाम के सरेंडर किए हुए नक्सली ने अपनी पत्नी के साथ सरेंडर किया है. 14 साल की उम्र में नक्सली के तौर पर ज्वाइन किया था. मंगतू की पत्नी दोनों AK 47 चलाते थे, पर इन्होंने कहा कि मांद में अब ऑरेशन चल रहे है इसलिए हमने जान बचाने के लिए सरेंडर किया है. हमारा भी नसबंदी हो गया इसलिए बच्चे पैदा नहीं कर सकते हैं. मंगतू ने कहा कि 2019 में हिड़मा से एक बार मिले हैं हालांकि हिड़मा अभी मर गया है बड़े ऑपरेशन में नक्सलियों के चेहरे को देखकर नहीं लगता था कि हमको बरगलाकर नक्सली बनाया जाता था.
आदिवासी इलाकों में भरोसे की वापसी बस्तर की नई पहचान: बंदूक से किताब तक की यात्रा
कभी लाल सलाम की गूंज से कांपने वाला बस्तर, अब बच्चों की हंसी, स्कूल की घंटी, और विकास की आवाज़ से गूंज रहा है. जो क्षेत्र एक समय नक्सल हिंसा, अपहरण, बारूदी सुरंगों और बंदूकों के लिए जाना जाता था, वह अब उम्मीदों और उजाले की कहानी बन गया इन इलाकों में कई जगहों पर जब हमने दौरा किया तो हमने देखा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया. यह सरकार की संकल्प शक्ति, जनता के विश्वास और रणनीति की सूझबूझ का परिणाम है.
बीते डेढ़ वर्षों में केंद्र सरकार ने नक्सल उन्मूलन की दिशा में ऐसे ठोस कदम उठाए हैं, सबसे खास बात यह है कि यह सिर्फ गोली और बंदूक की लड़ाई नहीं थी. यह विश्वास और विकास की रणनीति भी थी. इस अभियान की सबसे मार्मिक और प्रेरणादायक तस्वीर वह है जहां महिला नक्सली हथियार छोड़ कर मुख्यधारा में लौटी हैं. जिन हाथों में पहले बंदूकें थीं, अब वे बच्चों के हाथ थामे हुए हैं. आत्मसमर्पण करने वालों में बड़ी संख्या महिला माओवादियों की संख्या रही है. ये महिलाएं कभी ‘कमांडर’ के रूप में कुख्यात थीं. जिनके नाम पर गांवों में डर का माहौल रहता था. लेकिन अब वही महिलाएं पुलिस और प्रशासन की मदद से समाज में नए जीवन की शुरुआत कर रही हैं. आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2023 से दिसंबर 2025 के बीच 1440 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें सैकड़ों महिला नक्सली शामिल थीं.
अबूझमाड़ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में 4G नेटवर्क की पहुंच, सैकड़ों स्कूलों का पुनः संचालन, और 49,000 करोड़ की सिंचाई परियोजनाएं यह साबित करती हैं कि सरकार केवल सुरक्षा नहीं, विश्वास की जीत रही है. सुरक्षा बलों के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी इसमें अहम रही है. ‘बस्तर फाइटर्स’ के रूप में स्थानीय युवाओं को पुलिस बल में शामिल किया गया है. जिससे उन्हें रोज़गार भी मिला और अपने गांव की रक्षा का गर्व भी.
बस्तर ओलंपिक में गृह मंत्री के कार्यक्रम के दौरान मैं भी स्टेडियम में मौजूद था हमने देखा कि अब बस्तर में डर नहीं, उत्सव की गूंज है. बस्तर ओलंपिक में 1.65 लाख युवाओं की भागीदारी और पंडुम उत्सव में 47 हजार से अधिक कलाकारों की प्रस्तुति बताती है कि बस्तर अब जश्न की धरती बन रहा है. पालनार जैसे गांव, जो कभी उजड़ चुके थे, अब वहां फिर से बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं लौट आई हैं. जंगलों की वीरानी अब जीवन की चहचहाहट में बदल चुकी है.
बस्तर की यह यात्रा केवल भौगोलिक परिवर्तन नहीं, मानसिक क्रांति है. यह उदाहरण है कि जब नीतियां संवेदनशीलता से बनाई जाएं और विश्वास पर आधारित हों, तो सबसे कठोर रास्ते भी बदल सकते हैं. महिला नक्सलियों का आत्मसमर्पण, ग्रामीणों की सहभागिता और प्रशासन की प्रतिबद्धता मिलकर वह बस्तर बना रहे हैं जो कल तक कल्पना था और आज सच्चाई है. बस्तर अब बंदूक से नहीं, किताब से पहचाना जाता है. यह वह धरती बन चुकी है जहां डर की जगह भविष्य बसता है. शांत, समृद्ध और स्वाभिमानी भारत का प्रतीक बनकर.
जितेंद्र बहादुर सिंह