मालेगांव विस्फोट: पीड़ित का सवाल, विरोधी गवाहों के खिलाफ झूठी गवाही का मामला क्यों नहीं हुआ दर्ज

बता दें कि जो मुकदमा चल रहा है उसमें 35 से अधिक गवाह मुकर गए हैं, जिनमें से कुछ ने महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) के खिलाफ आरोप लगाए हैं, जो जांच एजेंसी थी और एनआईए के कार्यभार संभालने से पहले मामले की जांच कर रही थी.

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विद्या

  • मुंबई,
  • 29 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 10:59 PM IST

मालेगांव 2008 बम विस्फोट मामले के एक पीड़ित का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वकील ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को एक ईमेल भेजकर अनुरोध किया है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत गवाहों के बयान दर्ज करने वाले मजिस्ट्रेटों को मामले में गवाह के रूप में बुलाया जाए.

संहिता की धारा 164 में कहा गया है कि कोई भी मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या न्यायिक मजिस्ट्रेट, चाहे उसके पास मामले में अधिकार क्षेत्र हो या नहीं, कोई भी स्वीकारोक्ति या बयान दर्ज कर सकता है. यह कथन किसी भी न्यायालय में स्वीकार्य है.

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मामले में विस्फोट पीड़ित की ओर से पेश वकील शाहिद नदीम ने मालेगांव मुकदमे में गवाहों के मुकरने की ओर इशारा किया था. एनआईए के पुलिस अधीक्षक को भेजे गए ईमेल में कहा गया है कि, 'NIA के पास मजिस्ट्रेट को गवाह के रूप में बुलाकर द्वितीयक साक्ष्य का नेतृत्व करने का अवसर है. हम समझते हैं, साक्ष्य के लिए मजिस्ट्रेट को बुलाना असामान्य है, लेकिन प्राथमिक साक्ष्य के अभाव में शत्रुतापूर्ण गवाहों के साक्ष्य और साक्ष्य, मजिस्ट्रेट की गवाही सच्चाई को रिकॉर्ड पर लाने के लिए जरूरी हो जाता है.'

बता दें कि जो मुकदमा चल रहा है उसमें 35 से अधिक गवाह मुकर गए हैं, जिनमें से कुछ ने महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (ATS) के खिलाफ आरोप लगाए हैं, जो जांच एजेंसी थी और एनआईए के कार्यभार संभालने से पहले मामले की जांच कर रही थी. मामले में 13 से अधिक गवाह थे जिनके बयान मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किए गए थे. हालांकि, एनआईए ने केवल सात गवाहों को बुलाया था.

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नदीम के ईमेल में कहा गया है कि एनआईए के लिए मजिस्ट्रेट के साक्ष्य को रिकॉर्ड पर लाना महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, 'यह मजिस्ट्रेट/अदालतों पर भी एक धब्बा है. एनआईए ने इन गवाहों के खिलाफ आईपीसी की धारा 191 के तहत झूठी गवाही का मामला भी दर्ज नहीं किया है, इसका कारण सबसे अच्छी तरह से जाना जाता है.'

दो विशेष गवाहों की ओर इशारा करते हुए कहा गया कि उनका बयान एटीएस और एनआईए दोनों ने दर्ज किया था, लेकिन जब वे ट्रायल कोर्ट के सामने गवाह के रूप में आए, तो वे अपने दोनों बयानों से मुकर गए और इसके बावजूद एनआईए द्वारा उनके खिलाफ झूठी गवाही का मामला शुरू नहीं किया गया.

2008 में मालेगांव के भीकू चौक पर भोपाल से भाजपा सांसद साधवी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटरसाइकिल में बम बंधा हुआ था, जिसमें कुछ लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए. अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि ठाकुर ने सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और अन्य के साथ मिलकर साजिश रची थी. और इस धमाके को अंजाम दिया.

 

 

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