क्या पवार परिवार के इजरायल से रिश्ते रहे हैं? सोशल मीड‍िया पर छ‍िड़ी चर्चा, जान‍िए- पूरा बैकग्राउंड

सोशल मीडिया पर पवार परिवार और इजरायल की दोस्ती को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वे प्रतीकात्मक हैं, न कि कूटनीतिक. 1992 से पहले भारत-इजरायल के बीच कोई औपचारिक राजनीतिक संबंध नहीं थे. जानिए- उस दौर में ही पवार पर‍िवार से इजरायल के संबंध इतने प्रगाढ़ कैसे हुए.

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पवार परिवार और इजरायल: राजनीति नहीं, खेती से जुड़ा पुराना रिश्ता(Photos: PTI (l) | YouTube (r)) पवार परिवार और इजरायल: राजनीति नहीं, खेती से जुड़ा पुराना रिश्ता(Photos: PTI (l) | YouTube (r))

रौशनी चक्रवर्ती

  • नई दिल्ली ,
  • 30 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 7:54 PM IST

एक वायरल ट्वीट ने पवार परिवार और इजरायल के बीच पुराने रिश्तों को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा छेड़ दी है. दावा किया गया कि यह रिश्ता कोई कूटनीतिक नहीं, बल्कि खेती से जुड़ा हुआ है और इसकी जड़ें 1970 के दशक तक जाती हैं, जब सूखा-प्रभावित बारामती में इजरायल से प्रेरित जल-संरक्षण और आधुनिक खेती के प्रयोग शुरू हुए थे. इस पहल के पीछे थे पद्मश्री डॉ डी.जी. ‘अप्पासाहेब’ पवार.

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बारामती और इजरायल: खेती के जरिये जुड़ा रिश्ता

वकील और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर संजय लाज़र के एक ट्वीट के बाद यह बहस तेज हुई. ट्वीट में बताया गया कि अजित पवार के निधन पर इजरायल के मुंबई स्थित वाणिज्य दूतावास ने शोक जताया था और दावा किया गया कि पवार परिवार और इजरायल के बीच लगभग 50 साल पुरानी दोस्ती है, जिसकी शुरुआत 1976 में हुई थी.

इस दावे ने इसलिए भी ध्यान खींचा क्योंकि बारामती का खेती के क्षेत्र में बदलाव एक हकीकत है. लेकिन इसकी कहानी किसी सरकारी या राजनीतिक रिश्ते की नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर खेती से जुड़े सीखने-समझने की है और यह सब भारत-इजरायल के औपचारिक रिश्तों से भी पहले शुरू हुआ था.

बदलाव से पहले की बारामती

पुणे जि‍ले की बारामती कभी कम बारिश, सूखे और पानी की भारी किल्लत के लिए जानी जाती थी. 1960 और 70 के दशक में यहां खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी. सिंचाई की सुविधाएं बेहद सीमित थीं और फसल खराब होना आम बात थी. पलायन भी एक बड़ी समस्या थी.

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इसी हालात में 1970 के दशक की शुरुआत में शरद पवार और उनके परिवार के वरिष्ठ सदस्य, खासकर उनके बड़े भाई पद्मश्री डॉ डी.जी. 'अप्पासाहेब' पवार ने मिलकर एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ट्रस्ट (ADT), बारामती की स्थापना की. मकसद साफ था, सूखे से जूझ रहे इलाके में खेती को टिकाऊ बनाना.

अप्पासाहेब पवार और इजरायल से सीख

ADT के संस्थागत इतिहास के मुताबिक, अप्पासाहेब पवार ने 1970 के दशक में विदेश यात्राएं की थीं, जिनमें इजरायल भी शामिल था. उस समय इजरायल सूखे इलाकों में खेती और ड्रिप इरिगेशन के लिए दुनिया भर में जाना जाता था.

उस दौर में भारत और इजरायल के बीच औपचारिक कूटनीतिक संबंध नहीं थे. इसलिए यह यात्रा किसी सरकारी स्तर की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत या संस्थागत अध्ययन से जुड़ी थी.

इजरायल में अप्पासाहेब पवार ने देखा कि कैसे कम पानी में भी माइक्रो इरिगेशन, पानी की बचत और सूखे इलाकों के हिसाब से फसल पैटर्न के जरिये खेती संभव है. यही बातें बारामती की जरूरतों से मेल खाती थीं.

इसके बाद ADT ने बारामती के मालेगांव इलाके में डेमॉन्स्ट्रेशन फार्म बनाए, जहां बेहतर सिंचाई, जल संरक्षण, मिट्टी सुधार, परकोलेशन टैंक, कुएं और आधुनिक खेती के तरीके अपनाए गए. ये खेत आसपास के किसानों के लिए सीखने के केंद्र बने.

इजरायल से आए आइडिया महाराष्ट्र में कैसे जमे

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ड्रिप इरिगेशन जैसी तकनीकें बाद में कंपनियों और सरकारी योजनाओं के ज़रिये भारत में आईं, लेकिन बारामती उन शुरुआती इलाकों में था जहां इन विचारों को जमीन पर आजमाया गया. ADT मॉडल के तहत किसानों को कम पानी में ज्यादा उत्पादन, उच्च मूल्य वाली फसलों और जल-मिट्टी प्रबंधन को साथ लेकर चलने के लिए प्रेरित किया गया.

धीरे-धीरे बारामती सहकारी मॉडल पर आधारित खेती का उदाहरण बन गया और पश्चिमी महाराष्ट्र के कई इलाकों में इसकी छाप दिखी.

शरद पवार और इस मॉडल का जारी रहना 

जैसे-जैसे शरद पवार राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़े, बारामती उनकी पहचान का हिस्सा बनी रही. हालांकि 1992 से पहले इजरायल को लेकर किसी राजनीतिक या कूटनीतिक लॉबिंग के कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन खेती से जुड़ा यह सोच आगे भी जारी रही.

केंद्रीय कृषि मंत्री के रूप में शरद पवार ने सिंचाई, सहकारिता और किसान शिक्षा पर जोर दिया जो बारामती में पहले से अपनाए गए वैश्विक कृषि मॉडल से मेल खाता था.

अजित पवार ने आगे बढ़ाया विकास मॉडल 

बारामती के विधायक और बाद में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री के तौर पर अजित पवार ने भी दशकों से बने इस विकास मॉडल को आगे बढ़ाया. उनका फोकस मुख्य रूप से स्थानीय सिंचाई परियोजनाओं, सहकारी संस्थाओं और क्षेत्रीय विकास पर रहा न कि किसी अंतरराष्ट्रीय कृषि साझेदारी पर. फिर भी बारामती की पहचान आज भी पानी की समझदारी से खेती करने वाले इलाके के तौर पर बनी रही.

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‘दोस्ती’ के दावे को सही संदर्भ में समझें

सोशल मीडिया पर पवार परिवार और इजरायल की दोस्ती को लेकर जो बातें कही जा रही हैं, वे प्रतीकात्मक हैं, न कि कूटनीतिक. 1992 से पहले भारत-इजरायल के बीच कोई औपचारिक राजनीतिक संबंध नहीं थे. यह रिश्ता मूल रूप से खेती से जुड़ा ज्ञान और अनुभव साझा करने तक सीमित था.

अजित पवार के निधन पर इजरायल के मुंबई वाणिज्य दूतावास का शोक संदेश भी एक स्थानीय राजनयिक शिष्टाचार था, न कि किसी ऐतिहासिक राजनीतिक गठजोड़ का संकेत.

यह कहानी आज भी क्यों मायने रखती है

आज जब ‘एग्रीटेक’ और ‘स्टार्टअप खेती’ जैसे शब्द चलन में हैं, तब बारामती दशकों पहले दुनिया के सबसे पानी-कमी वाले देश से सीख लेकर प्रयोग कर रहा था. पवार परिवार और इजरायल का रिश्ता दरअसल राजनीति नहीं, बल्कि स्थानीय जरूरतों के हिसाब से वैश्विक सीख को अपनाने की कहानी है. यह याद दिलाता है कि भारत की कई बड़ी विकास गाथाएं मंत्रालयों या दूतावासों से नहीं, बल्कि खेतों और जमीन पर हुए प्रयोगों से शुरू हुई थीं.

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