गुरु खट्टर की परछाई से निकले सैनी, अब हरियाणा में बीजेपी के बने नए 'नायब'

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के राजनीतिक गुरु मनोहर लाल खट्टर रहे हैं. खट्टर की जगह पर ही 2024 में सैनी हरियाणा के सीएम बने थे, लेकिन दो साल में खट्टर परस्त वाली छवि को तोड़कर अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई है. बीजेपी के एक नए ओबीसी चेहरा बनकर उभरे हैं.

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हरियाणा की सियासत के बेताज बादशाह बनते नायब सिंह सैनी (Photo-ITG) हरियाणा की सियासत के बेताज बादशाह बनते नायब सिंह सैनी (Photo-ITG)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 15 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:56 PM IST

हरियाणा के शहरी निकायों के चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस सहित विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया है. सात शहरी निकाय चुनाव में बीजेपी को जिस तरह से प्रचंड बहुमत मिला, उसके आधार पर मतदाताओं ने न केवल बीजेपी के डबल इंजन की सरकार पर अपनी सहमति की मुहर लगाई है बल्कि सीएम नायब सिंह सैनी की सियासत को नई दिशा दे दी है. 

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दो साल पहले तक नायब सिंह सैनी को पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का 'विश्वस्त सिपाही' माना जाता था. वे कुरुक्षेत्र से बीजेपी के सांसद थे. 2024 लोकसभा चुनाव से पहले मनोहर लाल खट्टर की जगह उन्हें सीएम बनाया गया.

नायब सैनी ने अपने दो साल के कार्यकाल में हरियाणा में बीजेपी की तीसरी बार सत्ता में की वापसी कराई और अब निकाय चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज करने में कामयाब रहे. इस न केवल मनोहर खट्टर की परछाई से खुद को मुक्त किया है, बल्कि वे बीजेपी के लिए'नायब' (अनोखे) रत्न बनकर उभरे हैं. 

परछाई से पहचान तक का सफर

मार्च 2024 में जब बीजेपी ने अचानक मनोहर लाल खट्टर को हटाकर नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी, तब राजनीतिक पंडितों ने इसे एक 'डमी अरेंजमेंट' करार दिया था. विपक्ष का आरोप था कि हरियाणा सरकार का रिमोट कंट्रोल अभी भी मनोहर लाल खट्टर के हाथ में है. सैनी के सामने चुनौतियों का पहाड़ था. एक तरफ किसान आंदोलन की सुलगती आग थी, दूसरी तरफ 10 साल की सत्ता विरोधी लहर और तीसरी तरफ अपनी खुद की स्वीकार्यता बनाने की चुनौती. 

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नायब सैनी ने अपनी सबसे बड़ी ताकत 'विनम्रता' को सियासी हथियार बनाया है. खट्टर की छवि एक सख्त और कभी-कभी 'अड़ियल' प्रशासक की थी तो सैनी ने खुद को एक सहज, सरल और हर समय सुलभ रहने वाले 'जनता के मुख्यमंत्री' के रूप में पेश किया. उन्होंने अपने मुख्यमंत्री आवास के दरवाजे हरियाणा की आम जनता के लिए खोल दिए और छोटे-से-छोटे कार्यकर्ता से सीधे संवाद करना शुरू किया. यहीं से  अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू की. 

हरियाणाण के चक्रव्यूह के विजेता बने

2024 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद के उपचुनावों ने सैनी के कद को निर्णायक रूप से बड़ा कर दिया, जब बड़े-बड़े दिग्गज मान रहे थे कि हरियाणा में कांग्रेस की वापसी तय है, तब सैनी की संगठनात्मक क्षमता और उनके शांत स्वभाव ने बाजी पलट दी. सीएम रहते हुए खट्टर की नीतियों का बचाव तो किया, लेकिन अपनी सियासी शैली में. 

नायब सैनी ने अपनी घोषणाओं को फाइलों से निकालकर धरातल पर उतारा. प्रदेश के किसानों के साथ सीधे संवाद कर और मंडियों में खुद जाकर उस गुस्से को ठंडा किया, जो विपक्ष के लिए सबसे बड़ा हथियार था. उन्होंने यह साबित किया कि वे केवल एक उत्तराधिकारी नहीं हैं बल्कि एक विजेता भी हैं. रणनीतिक कौशल और सामंजस्य के साथ 2024 का विधानसभा चुनाव लड़ते हुए अपनी पार्टी को जीत दिलाई. बीजेपी ने सत्ता की हैट्रिक लगाने में कामयाब रही, जिसके जीत का श्रेय उनके खाते में गया. मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को राजनीतिक रूप से ताकत दी है.

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बीजेपी की हैट्रिक लगने के बाद पार्टी के भीतर भी, जो वरिष्ठ नेता शुरुआत में उन्हें हल्के में ले रहे थे, वे उनकी कार्यशैली और हाईकमान (मोदी-शाह) के साथ उनके सीधे तालमेल को देखकर उनके पीछे खड़े होने पर मजबूर हो गए. 

ओबीसी कार्ड और समावेशी राजनीति

हरियाणा की राजनीति दशकों से 'जाट बनाम गैर-जाट' के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है. सैनी ने इस समीकरण को बहुत बारीकी से समझा. पिछड़ा वर्ग (OBC) से आने वाले सैनी ने न केवल अपने आधार वोट बैंक को एकजुट किया, बल्कि '36 बिरादरी' के नारे को जमीन पर उतारा. उन्होंने खट्टर सरकार की उन योजनाओं को आगे बढ़ाया जो पारदर्शी थीं (जैसे बिना खर्ची-पर्ची के नौकरी), लेकिन उनमें अपनी 'सॉफ्ट टच' राजनीति का तड़का लगाया.

नायब सैनी की सफलता का राज उनके निर्णयों की गति में छिपा है. पिछले दो सालों में उन्होंने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति को खट्टर से भी ज्यादा प्रभावी ढंग से लागू किया. साथ ही, उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को यह संदेश दिया कि जनता की सुनवाई में देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. धीरे-धीरे हरियाणा में बीजेपी में नायब सैनी की स्थिति वही बनती जा रही है, जो कभी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की या असम में हिमंत बिस्वा सरमा की है. 

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निकाय चुनाव में प्रचंड जीत के हीरो बने

किसी भी चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के नेताओं का सामान्य दावा होता है कि चुनाव के नतीजे सरकार के कामकाज का आकलन करने के साथ ही राजनीतिक दलों की दिशा तय करेंगे. मुख्यमंत्री नायब सैनी ने इन शहरी निकाय चुनाव को पूरी गंभीरता और मनस्यता से लड़ा. हर नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका के साथ-साथ नायब सैनी छोटे से छोटे वार्ड में प्रचार करने गए.

कांग्रेस समेत उनके समस्त विरोधी दलों ने मुख्यमंत्री की इस क्रियाशीलता और चुनाव जीतने की लगन पर सवाल भी उठाए, लेकिन नायब सैनी न तो थके, न रुके और न ही उन्होंने किसी के बोलने की कोई परवाह की. उन्हें जिस भी वार्ड से यह रिपोर्ट मिली कि भाजपा उम्मीदवार का चुनाव फंसा हुआ है, तुरंत पहुंच गए और मामले का निपटारा कर ही वापस लौटे. निकाय चुनाव जीतने की इस लगन और मेहतन का ही नतीजा है कि उनकी पूरी टीम समर्पण भाव से चुनाव में लगी रही.  

हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष राव नरेंद्र सिंह और विपक्ष के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का भी नई सरकार में यह पहला चुनाव था, लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकार वोट चोरी करने के आरोप लगाने तक सिमटे रहे और मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी शहरी निकायों को जीतकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की थपकी भी हासिल कर चुके हैं. ये रणनीतिक कौशल और सामंजस्य के साथ लड़े गए चुनाव का नतीजा था. इस तरह शहरी निकाय चुनाव ने जहां मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को राजनीतिक रूप से ताकत दी है और एक सियासी कद भी बना दिया है. 

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बीजेपी के नए नायब बनकर उभरे सैनी

पश्चिम बंगाल चुनाव में जीत का खुमार उनके दिल और दिमाग पर पूरी तरह से चढ़ा हुआ था. नायब सैनी ने अक्टूबर 2024 में राज्य की सत्ता संभाली थी. तब से अब तक दो साल हो चुका है. इऩ दो सालों में नायब सैनी ने जनता के बीच जाकर पहला प्रत्यक्ष चुनाव लड़ा, जो कामयाबी हासिल की. हरियाणा विधानसभा चुनाव में बीजेपी की तीसरी बार जीत रही हो या फिर अब निकाय चुनाव में प्रचंड बहुमत. 

बीजेपी ने नायब सैनी को बिहार चुनाव में भी लगाया, जिसका नतीजा है कि पहली बार राज्य में बीजेपी का मुख्यमंत्री है. बीजेपी ने उन्हें असम का पर्यवेक्षक बनाकर भेजा और पंजाब की सियासत भी लगातार सक्रिय हैं. इस तरह बीजेपी में अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बना रहे हैं और नए ओबीसी चेहरे के तौर पर उभरे हैं. 

मनोहर लाल खट्टर निश्चित रूप से नायब सैनी के राजनीतिक गुरु रहे हैं और नायम सैनी आज भी उनका सम्मान करते हैं, लेकिन अब वो उनकी परछाई नहीं हैं. नायब सैनी ने अपनी एक अलग 'पॉलिटिकल ब्रांडिंग' कर ली है.  इस तरह 2026 तक आते-आते, नायब सैनी ने यह सिद्ध कर दिया है कि राजनीति में 'सरलता' सबसे बड़ी ताकत है. 

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हरियाणा के सियासी रेगिस्तान में कमल खिलाए रखने के लिए बीजेपी को जिस 'नायब' नायक की तलाश थी, वह उन्हें सैनी के रूप में मिल चुका है. खट्टर युग की ठोस नींव पर नायह सैनी ने जो आधुनिक हरियाणा की इमारत खड़ी की है, उसने उन्हें राज्य के सबसे प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों की श्रेणी में ला खड़ा किया है. इस तरह नायब सैनी बीजेपी के लिए एक ट्रंप कार्ड बन रहे हैं. 
 

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