गुजरात परिवर्तन के नाम पर जब बीजेपी से बागी हुए थे केशुभाई पटेल

एक वक्‍त ऐसा भी आया जब उनकी पार्टी की प्रति न‍िष्‍ठा डगमगा गई और वह भाजपा के विरोध में खड़े हुए थे. यहां तक की विधानसभा का चुनाव भी भाजपा के खिलाफ लड़ा लेकिन किस्‍मत ने यहां भी उनका साथ नहीं दिया.

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गुजरात के पूर्व सीएम केशुभाई पटेल (फाइल फोटो) गुजरात के पूर्व सीएम केशुभाई पटेल (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 10:26 PM IST
  • गुजरात के पूर्व सीएम केशुभाई पटेल का निधन
  • गुरुवार को 92 की उम्र में ली अंतिम सांस

गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल का निधन हो गया है. गुरुवार सुबह सांस लेने में तकलीफ होने के बाद 92 वर्षीय केशुभाई पटेल को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली. गुजरात की राजनीति में केशुभाई पटेल वो चेहरा हैं, जिन्‍होंने अपनी पार्टी के प्रति समय समय पर न‍िष्‍ठा तो दिखाई लेकिन बार-बार किस्‍मत उन्‍हें हाशिये पर ले आती थी. एक वक्‍त ऐसा भी आया जब उनकी पार्टी की प्रति न‍िष्‍ठा डगमगा गई और वह भाजपा के विरोध में खड़े हुए थे. यहां तक कि विधानसभा का चुनाव भी भाजपा के खिलाफ लड़ा लेकिन किस्‍मत ने यहां भी उनका साथ नहीं दिया. ये कहानी है उस वक्‍त की जब दूसरी बार गुजरात का मुख्‍यमंत्री बनने के बावजूद केशुभाई पटेल को हाईकमान के दबाव में इस्‍तीफा देना पड़ा था, लेकिन ये इस्‍तीफा भी यूं ही नहीं हुआ, इसके पीछे भी एक कहानी थी. 

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नहीं किया था मंत्रिमंडल में बदलाव 
गुजरात भाजपा के पुराने नेताओं की मानें तो केशुभाई पटेल, नरेन्‍द्र मोदी और शंकर सिंह वाघेला का राजनीति में लगभग एक साथ ही उदय हुआ था. तीनों ही आरएसएस से जुड़े जमीनी नेता थे. इन्‍होंने लगभग साथ ही साथ राजनीति ककहरा सीखा. ये बात अलग थी कि बदलते हुए वक्‍त के साथ हालात कुछ ऐसे बने के 2012 के विधानसभा चुनाव में ये तीनों चेहरे आमने-सामने लड़ रहे थे. वो भी अपने-अपने वर्चस्‍व के लिए. इसकी शुरूआत 2001 में हुई जब केशुभाई दूसरी बार गुजरात के मुख्‍यमंत्री थे और उन पर असफलता के आरोप लग रहे थे. वह आरएसएस के न‍िशाने पर भी आ गए थे क्‍योंक‍ि उन्‍होंने संघ के सुझाव पर अपने मंत्रीमंडल में जरूरी फेरबदल नहीं किए थे. 

दी थी पार्टी छोड़ने की धमकी 
पुराने नेता ये भी बताते हैं कि केशुभाई से इस्‍तीफा लेने से पहले ही मुख्‍यमंत्री के रूप में नये चेहरे की तलाश शुरू हो गई थी. इसमें नरेन्‍द्र मोदी के नाम पर सहमति बनी और फ‍िर केशुभाई पर इस्‍तीफे का दबाव बढ़ने लगा. हालांकि केशुभाई इस्‍तीफा देने को तैयार नहीं थे. भाजपा भी नहीं चाहती थी कि वह नाराज होकर पार्टी छोड़ें क्‍योंकि पटेल वोटबैंक के लिए केशुभाई का पार्टी से जुड़े रहना जरूरी था. उन्‍हें मनाने की जिम्‍मेदारी जना कृष्‍णमूर्ति, मदनलाल खुराना और कुशाभाऊ को सौंपी गई. दबाव बढ़ा तो केशुभाई ने राजनीति से संन्‍यास लेने की धमकी दी. हालांकि मदन लाल खुराना ने उन्‍हें भरोसा दिलाया कि नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व में भी उनका सम्‍मान बना रहेगा तो उन्‍होंने बुझे मन के साथ इस्‍तीफा दे दिया. 

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नई पार्टी बनाकर कूदे थे चुनाव में 
केशुभाई की कुर्सी तो चली गई लेकिन उनका मन अशांत ही रहा. 2007 के विधानसभा चुनाव में उनके मन की अशांति नरेन्‍द्र मोदी की खिलाफत के रूप में सामने आई. उन्‍होंने पटेल बिरादरी से परिवर्तन के लिए वोट करने की अपील कर दी. तब तक वो पार्टी में लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उन्‍होंने भाजपा की सदस्‍यता से इस्‍तीफा देकर सबको चौंका दिया. इसके साथ ही गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में कूद गए. 2012 का चुनाव इसलिए खास था कि नरेन्‍द्र मोदी, केशुभाई और शंकर सिंह वाघेला आमने-सामने थे. वाघेला कांग्रेस से तो केशुभाई अपनी नई पार्टी से. लेकिन किस्‍मत यहां भी केशुभाई के साथ नहीं थी. उनकी पार्टी को मात्र दो सीटें मिलीं. बाद में गिले-शिकवे भुलाकर 2014 में केशुभाई ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करा दिया और अपनी विधानसभा सदस्‍यता से इस्‍तीफा देकर मानो राजनीति को ही अलविदा कह दिया. 

तकलीफों से नहीं टूटा नाता 
केशुभाई के लिए जिंदगी के उत्तरार्द्ध का सफर तकलीफों से भरा था. 2006 में एक अग्‍न‍िकांड में उन्‍होंने अपनी पत्‍नी को खो दिया. इसके बाद 2014 में जब उन्‍होंने अपनी विधानसभा सीट छोड़ी तो भाजपा ने उप चुनाव में उनके बेटे भरत पटेल को टिकट दिया. लेकिन भरत ये सीट नहीं जीत सके और उन्‍हें पराजय का सामना करना पड़ा. 2016 में सितंबर के महीने में केशुभाई के बेटे प्रवीण का हार्ट अटैक से न‍िधन हो गया था. इन सभी घटनाओं ने केशुभाई को कमजोर कर दिया.

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