MCD: बीजेपी ने क्यों लिया अपने ही पार्षदों के टिकट काटने का पंगा?

दिल्ली में एमसीडी चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया है. यूपी फतह के बाद अब बीजेपी की नजरें दिल्ली नगर निगम चुनाव पर हैं. बीजेपी फिलहाल विजय रथ पर सवार है और केजरीवाल एंड टीम पंजाब की हार के सदमे में है.

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दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी

कपिल शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 15 मार्च 2017,
  • अपडेटेड 5:07 AM IST

दिल्ली में एमसीडी चुनावों की तारीखों का ऐलान हो गया है. यूपी फतह के बाद अब बीजेपी की नजरें दिल्ली नगर निगम चुनाव पर हैं. बीजेपी फिलहाल विजय रथ पर सवार है और केजरीवाल एंड टीम पंजाब की हार के सदमे में है. बीजेपी पिछले विधानसभा चुनाव में मिली हार का बदला लेने के लिए इस मौके को गंवाना नहीं चाहती है. इसीलिए बीजेपी ने एमसीडी चुनाव को नाक का सवाल बना लिया है. मौजूदा पार्षदों के टिकट काटने का बड़ा फैसला भी कर लिया है.

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ने भले ही इस फैसले को नए चेहरों को मौका देने की एक कवायद भर बताया है. लेकिन इस फैसले के पीछे की कहानी कुछ और ही है. दलील भले ही नए चेहरों को मौका देने की हो, लेकिन मौजूदा पार्षदों के टिकट काटकर बीजेपी की कोशिश उस सत्ता विरोधी लहर से पार पाने की है, जो दिल्ली की लड़ाई में केजरीवाल के खिलाफ उसकी कमजोर कड़ी बन सकती थी. क्योंकि केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी बीजेपी की सत्ता वाली तीनों एमसीडी को नाकारा साबित करने में जुटी है.

और नाकारापन को मुद्दा बना रही आम आदमी पार्टी के खिलाफ तो बीजेपी का ये दांव तुरुप का इक्का साबित हो सकता है. लेकिन खुद बीजेपी के भीतर इस फैसले के बाद भूचाल सा आ गया है. क्योंकि मौजूदा पार्षदों के टिकट काटने का मतलब है कई दिग्गज नेताओं को घर बैठा देना. अचानक आए इस फैसले से हैरान मौजूदा पार्षद भले ही खुलकर कुछ नहीं बोल पा रहे हों, लेकिन कहीं कहीं दिल का गुबार आंसुओं की शक्ल में बाहर भी आ गया.

 

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दिल्ली बीजेपी ने फैसले के ऐलान से पहले अपने सभी 155 पार्षदों को पार्टी दफ्तर बुलाया था और यहीं उनके टिकट काटने का फरमान सुनाया. सूत्रों के मुताबिक ज्यादातर पार्षदों ने बैठक में भी चुप्पी साध ली, लेकिन सात ऐसे पार्षदों ने फैसले पर मीटिंग के भीतर खुलकर नाखुशी जाहिर की, जो पिछले तीन तीन बार से एमसीडी में चुनकर आ रहे थे. इनमें नार्थ एमसीडी के मेयर और स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन रह चुके योगेंद्र चंदोलिया और पूर्वी दिल्ली से दबंग पार्षद संध्या वर्मा शामिल हैं. जिन पार्षदों ने चुप्पी साध रखी है, वो फैसले से सहमत हैं या विरोध नहीं करेंगे, ऐसा नहीं है. वजह ये कि दिल्ली में बीजेपी के कई नेता ऐसे हैं, जो सालों से सिर्फ निगम की ही सियासत कर रहे हैं और अपने अपने इलाकों में उनकी अच्छी पैठ भी है.

 

दरअसल दिल्ली में बीजेपी 2007 से एमसीडी की सत्ता पर काबिज है. शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री रहते बीजेपी ने दो बार एमसीडी का चुनाव जीता. यहां तक कि 2012 में एमसीडी के तीन टुकड़े होने के बाद भी तीनों एमसीडी में बीजेपी को ही सत्ता मिली. इस बार बीजेपी का मुकाबला कांग्रेस से कम और आम आदमी पार्टी से ज्यादा है. जिसने 70 सीटों वाली दिल्ली विधानसभा में बीजेपी को महज तीन सीटों पर समेट दिया था. इसीलिए दिल्ली की सत्ता के इस सबसे बड़े संग्राम में बीजेपी कोई चूक नहीं करना चाहती.

 

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अब बीजेपी का फैसला बड़ा भी है और कड़ा भी, इसीलिए तो दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी को टिकट काटने के फैसले का ऐलान करते वक्त दिल्ली के दिग्गज नेताओं की फौज इकठ्ठा करनी पड़ी. जिनमें डॉ. हर्षवर्धन समेत दिल्ली के तमाम सांसद शामिल हैं. क्योंकि जरा सी चूक से अगर अंदरूनी बवाल को हवा मिली, तो यूपी का मजा दिल्ली में किरकिरा हो सकता है.

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