आंखों देखी: लाल लकीर के पार, 'नक्सलियों के गढ़' बस्तर से ग्राउंड रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ में नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा, सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाओं से हालात बदल चुके हैं. हिंसा की जगह विकास और नॉर्मल लाइफ पटरी पर लौट रही है.

Advertisement
छत्तीसगढ़ के जंगलों में लौटा सुकून (Photo: ITG) छत्तीसगढ़ के जंगलों में लौटा सुकून (Photo: ITG)

सुमी राजाप्पन

  • बस्तर,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:59 PM IST

साल 2022 में मैंने दिल्ली के आलीशान दफ़्तरों को छोड़कर सीरिया जैसे दुनिया के सबसे ज्यादा तनाव वाले इलाकों में से एक की रिपोर्टिंग करने का सपना देखा था. मैं विदेशों में चल रहे संघर्षों में एडवेंचर की तलाश में थी, लेकिन मेरे होम स्टेट छत्तीसगढ़ ने मेरे लिए कुछ और ही तय कर रखा था. रेगिस्तान के बजाय मैं 'भारत के अमेज़न' यानी अबूझमाड़ के घने जंगलों की तरफ खिंचती चली गई. 

Advertisement

31 मार्च की सुबह जब मेरी कार रायपुर के बाहरी इलाकों से गुज़र रही थी, तो 2023 की एक याद मेरे ज़हन में ताज़ा हो गई.

मैं कोरबा में ज़मीन पर रहकर स्टेट इलेक्शन्स की रिपोर्टिंग कर रही थी, तभी मैंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक स्पीच देते हुए सुना.

नक्सलवाद खत्म करने का दावा और उम्मीद

अमित शाह की स्पीच उस वक्त मुझे महज़ एक सियासी नाटक जैसी लगी थी. उन्होंने पूरे यकीन के साथ यह ऐलान किया था कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो नक्सलवाद का 'पूरी तरह से खात्मा' हो जाएगा.

मेरे अंदर का पत्रकार जहां उस विद्रोह की गहरी जड़ों को देख रहा था, जिसने 1975 से इस ज़मीन को जकड़ रखा था, वहीं मेरे मन का एक शांत कोना उम्मीद से भर उठा. मैं दिल से चाहती थी कि यह 'दांव' कामयाब हो. मैं चाहती थी कि मेरा गृह-राज्य अब खून-खराबे का पर्याय न रहे, बल्कि अपनी सच्ची और बेदाग पहचान के लिए जाना जाए.

Advertisement

आज के मेरे इस सफर का विरोधाभास बेहद चौंकाने वाला है. अंतागढ़ से होते हुए एक मुश्किल सफ़र और भानुप्रतापपुर से एक शॉर्टकट लेने के बाद, मैं आखिरकार 'अज्ञात पहाड़ी' में प्रवेश कर रही हूं. यह बड़ा जंगल, जो कभी सबसे खूंखार नक्सल कमांडो के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह हुआ करता था, अब शांत पेड़ों के एक आश्रय स्थल में बदल गया है. पेड़ों की वह घनी छांव, जो कभी गोलियों की गड़गड़ाहट से गूंजती थी, अब सिर्फ़ चिड़ियों की चहचहाहट से आबाद है.

यह भी पढ़ें: बस्तर में 1.61 करोड़ के इनामी 51 नक्सलियों का सरेंडर, हथियारों का बड़ा जखीरा बरामद

जंगल का बदलता चेहरा और 'जुगनू' की कहानी

आज इससे पहले, भानुप्रतापपुर पुनर्वास केंद्र में मैं कुंवर सिंह से मिली, वे इंसान जिसे लोग कभी 'जुगनू' कहकर पुकारते थे. बीस सालों तक वे बिना किसी डिग्री के एक 'जंगल के सर्जन' बने रहे, पेड़ों की उस घनी छांव के नीचे, जो उन्हें किसी पिंजरे जैसी लगती थी, वे लोगों के शरीर से गोलियां निकालते और ज़ख्मों की मरहम-पट्टी करते थे.

मुझे उन्होंने बताया, "मैंने अंधेरे में रहकर जितनी सर्जरी की हैं, उनकी गिनती तो मैं कब की भूल चुका हूं." उन्होंने मुझे बताया कि उनके जो हाथ कभी इंसानी जिस्म को चीरते थे, अब लकड़ी तराशते हुए पूरी तरह स्थिर हैं. उन्होंने बताया, "ज़ख्म जितना गहरा होता था, मेरा चाकू भी उतना ही बड़ा होता था लेकिन, हिंसा कभी भी किसी समस्या का हल नहीं थी."

Advertisement

अब उनका ख्वाब सीधा-सादा है- मेडिकल की एक औपचारिक डिग्री हासिल करना और अपने गांव की सेवा रोशनी में करना. अब 'माध' के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों को देखते हुए मुझे एहसास होता है कि कुंवर सिंह की कहानी असल में इस पूरे जंगल की कहानी है- एक धीमी, लगातार होती रिकवरी की कहानी.

सड़क पर बने एक ब्रेकर से लगे अचानक झटके ने मुझे वापस आज के लम्हे में ला दिया. यहां सूरज ही हमारी जीवनरेखा है. उसके बिना, कहानी अंधेरे में ही दबी रह जाती है. पिछली रात नारायणपुर में हम रोशनी से चूक गए थे, हमारे पहुंचते ही सूरज क्षितिज के नीचे डूब गया था, जिससे हमें सुबह होने का इंतज़ार करना पड़ा. लेकिन सुबह 6:00 बजे की वह शुरुआत, इंतज़ार में बिताए हर पल के लायक थी. मुख्य शहर से 30 किलोमीटर दूर जाने पर, नज़ारा खुल गया और सामने आ गए अविश्वसनीय, विशाल घास के मैदान- एक ऐसी कच्ची, अछूती सुंदरता जो कभी न खत्म होने वाली लगती है, भले ही इस ज़मीन का इतिहास एक बिल्कुल अलग ही सच्चाई के ज़ख्मों से भरा हो. अबुझमाड़- यानी 'अज्ञात पहाड़ी', जिसके दिल में पच्चीस किलोमीटर अंदर पहुंचकर, हम इराकभट्टी पहुंचे.

यह भी पढ़ें: लोकसभा में अमित शाह का 90 मिनट का भाषण, नक्सलवाद पर बोले- हथियार उठाए तो फोर्स चलेगी...

Advertisement

गांवों में लौटती जिंदगी और विकास की आहट

कुछ वक्त पहले तक, यह नाम डर और नक्सलवाद के साये का पर्याय था लेकिन जब हमने एक निर्माणाधीन मिट्टी के घर के पास अपनी गाड़ी रोकी, तो वहां का माहौल बिल्कुल ही अलग लगा. गांव वालों के काम में एक लय थी और उनके चेहरों पर एक सच्ची बेफिक्री झलक रही थी. एक बुज़ुर्ग शख्स रुके, पीछे मुड़कर उन बीते सालों को देखा जिन्हें वे आखिरकार पीछे छोड़ आए थे और उन्होंने बताया कि उन मुश्किलों से मुंह मोड़ना उनके लिए कभी कोई विकल्प ही नहीं था. उन्होंने बताया कि कैसे गांव वालों को रस्सियों से बांधकर पीटा जाता था, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे नक्सलियों को खाना, राशन या अपने लोगों को उनके दल में भर्ती करने से मना कर देते थे. बुजुर्ग ने हमें अनुभव से लबरेज लहजे में बताया, "एक साल पहले जब से यहां पुलिस कैंप बना है, तब से यहां सिर्फ सुरक्षा और विकास है. यह ऐसी चीज़ें हैं, जिनका हमने कभी सिर्फ सपना ही देखा था.

पास में ही, मेरी मुलाक़ात गंगा से हुई, जो एक टीचर की पत्नी थीं और उनके चेहरे पर एक बड़ी-सी मुस्कान थी. उन्होंने बताया कि पहले वे हंसते तो थे, लेकिन उस हंसी में हमेशा एक गहरा, छिपा हुआ डर मिला होता था. अब, वे कहती हैं, वे बेफ़िक्र होकर मुस्कुरा सकते हैं और उस बोझ से फ्री होकर ज़िंदगी गुजार सकते हैं. गांव में आया बाहरी बदलाव, इस अंदरूनी बदलाव को ही दिखाता है. पुरानी पगडंडियों या कच्चे रास्तों की जगह अब पक्की सड़कें बन गई हैं, जिससे बसें जंगल के अंदर तक जा पाती हैं. शायद इस जुड़ाव का सबसे आधुनिक संकेत गंगा की बाहरी दुनिया के बारे में जानकारी है. जब उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने उनकी 'सफेद दाढ़ी' का ज़िक्र किया और बताया कि उन्होंने उन्हें सोशल मीडिया पर देखा है. यह इस बात का एक जीता-जागता सबूत है कि इन दूर-दराज के इलाकों तक आखिरकार सही मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंच गई है.

Advertisement

सड़क पर थोड़ा और आगे चलने पर, जंगल की खामोशी एक ऐसी आवाज़ से टूटी जो इस इलाके में किसी चमत्कार जैसी लगी- बच्चों का एक समूह एक साथ 'A for Apple, B for Ball' दोहरा रहा था. यहां का प्राइमरी स्कूल, जो पिछले साल ही शुरू हुआ था, अभी छह या सात रेगुलर बच्चों को पढ़ा रहा है, लेकिन इसका असर बहुत बड़ा है. टीचर ने बताया कि जहां पहले नक्सली पढ़ाई-लिखाई में रुकावट डालते थे, वहीं अब वे सीखने और सेहत, दोनों पर ध्यान दे पा रहे हैं. वे दोपहर के खाने के लिए एक तय मेन्यू फॉलो करते हैं- मूंगफली वाला पोहा या दलिया, जिससे बच्चों को ज़रूरी पोषण मिल सके. एक ऐसी जगह पर बच्चों की यह आवाज़ सुनना, जहां कभी सिर्फ़ खामोशी और लड़ाई-झगड़े का राज था, बहुत ही भावुक कर देने वाला अनुभव था. सिर्फ़ एक साल में, यहां के बचपन की पूरी तस्वीर ही एक ऐसे तरीके से बदल गई है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

यह भी पढ़ें: 'नक्सलवाद की जड़ें विकास नहीं, विचारधारा में है', लोकसभा में बोले अमित शाह

आखिरकार, हम एक शख्स के पीछे-पीछे एक साफ़-सुथरी, नई इमारत की तरफ़ गए- एक प्राइमरी हेल्थ सेंटर (PHC), जिसे पिछले साल 28 लाख रुपये की लागत से बनाया गया था. वे अपना ब्लड प्रेशर चेक करवाने जा रहे थे. यह खुद की देखभाल का एक ऐसा आसान सा काम था, जो कभी यहां नामुमकिन हुआ करता था. अंदर, कम्युनिटी हेल्थ ऑफ़िसर, डॉ. नमिता नेताम ने बताया कि अब वे लगातार OPD इलाज कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि जहां इन समुदायों के लोग पीढ़ियों से इलाज के लिए प्रकृति पर निर्भर रहे हैं, वहीं अब धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ रही है. गांव वाले अब आधुनिक चिकित्सा पर भरोसा करने लगे हैं और उन्हें यह एहसास हो रहा है कि सुरक्षा, शिक्षा और सेहत सभी चीज़ें अब आखिरकार उनकी पहुंच में हैं.

Advertisement

हमारा सफर BSF की 124वीं बटालियन के कैंप पर खत्म हुआ, जिसे संयोग से 31 मार्च को स्थापित हुए पूरे दो साल हो गए थे. अब तक हुई प्रगति को देखते हुए, यह खुशी की बात है कि अब यह एक असली सवाल बन गया है कि क्या इस कैंप को अगले एक साल तक भी जारी रखने की ज़रूरत पड़ेगी. मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन भी आएगा, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इतनी तेज़ी से काम होते देखना और वह भी सिर्फ़ कागज़ों पर नहीं, सचमुच अविश्वसनीय है. 

सरकार ने मुख्य मुद्दे पर काम किया. इन कैंपों की स्थापना ही वह निर्णायक मोड़ साबित हुई, जिसने पूरी तरह विजय और लोगों की सोच में बदलाव लाना मुमकिन कर दिखाया. यह अनुभव इतना भावुक कर देने वाला था कि मैं सरकार का तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उन्होंने नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंका और इस ज़मीन को वापस हासिल कर लिया. अब छत्तीसगढ़ के बारे में होने वाली बातचीत में संघर्ष का बोलबाला नहीं रहेगा. अब मुझे उन शर्मिंदा कर देने वाले सवालों का सामना नहीं करना पड़ेगा, जैसे, 'क्या रायपुर में भी नक्सली हैं?' वह साया अब छंट रहा है और 'अज्ञात पहाड़ी' आखिरकार एक नई रोशनी में नजर आ रही है.
 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement