दूसरा कार्यकाल शुरू होने के बाद से डोनाल्ड ट्रंप का इकलौता मिशन नोबेल शांति पुरस्कार था. उन्होंने कथित तौर पर कई युद्ध रुकवाए. नोबेल तब भी नहीं मिला. अब ट्रंप प्रशासन मास्क हटाकर अपना विस्तारवादी चेहरा दिखा रहा है. उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को नशे की तस्करी के आरोप में पकड़कर जेल में डाल दिया. बात यहीं खत्म नहीं हुई. वेनेजुएला में मौजूद तेल भंडार की बिक्री अब से अमेरिका ही करेगा. इससे जो पैसे आएंगे, उनसे अपनी जरूरत का सामान भी यह देश यूएस से ही खरीदेगा.
हिंदी में ऐसी स्थिति के लिए कहा जाता है, हाथ-पैर बांधकर पानी में फेंक देना और फिर डोंगी लेकर मसीहा बन जाना. वेनेजुएला के साथ अभी जो हो रहा है, उसमें उसकी आर्थिक आजादी पूरी तरह से खत्म हो जाएगी. अगर वेनेजुएला अपने तेल भंडार खुद नहीं बेच सकता और उसकी बिक्री किसे और किस कीमत पर होगी, ये अमेरिका देखेगा, तो देश यह तय करने की ताकत खो देगा कि वह किससे व्यापार करेगा और अपनी कमाई कहां खर्च करेगा. ऐसे में सरकार सिर्फ नाम की रह जाती है और असली कंट्रोल बाहर चला जाता है.
बात यहीं खत्म नहीं होती. तेल की बिक्री से जो पैसे आएंगे, वे पैसे अमेरिका वापस वेनेजुएला को देगा, और उन्हीं रुपयों से वेनेजुएला की सरकार अपनी जरूरत का सामान लेगी. इसमें दवा से लेकर अनाज और इलेक्ट्रॉनिक्स तक सबकुछ शामिल है. यानी यह देश अपनी मर्जी से इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का अधिकार खोते हुए एब्सॉल्यूट इकनॉमिक कंट्रोल में जा चुका.
इसे आर्थिक साम्राज्यवाद भी कह सकते हैं. देश दिखने में स्वतंत्र होगा लेकिन अपने सबसे जरूरी फैसले खुद नहीं ले सकेगा.
इसका सबसे पहला असर राजनीति पर होगा. देश आजाद होगा लेकिन कहने-भर को. चूंकि उसके सारे रिसोर्स वॉशिंगटन के हाथ में होंगे तो सरकार कौन सी आएगी, ये भी वाइट हाउस ही पक्का करेगा. ऊपर-ऊपर से चुनी हुई सरकार असल में यूएस फ्रेंडली सरकार होगी जो यस बॉस के अलावा कुछ कह नहीं सकेगी.
अभी की स्थिति लें तो मादुरो के अमेरिकी कब्जे में जाने के बाद उपराष्ट्रपति डेल्सी एलोइना रोड्रिग्ज को वहां का कार्य़वाहक राष्ट्रपति बनाया गया. ट्रंप उनपर भी आक्रामक हैं. वे लगातार कह रहे हैं कि अगर रोड्रिग्ज उनकी बात से अलग गईं तो अंजाम मादुरो से भी बुरा होगा. यानी काराकास अब वॉशिंगटन से पूछे बगैर काम नहीं कर सकता.
विदेश नीति भी बुरी तरह से प्रभावित होगी. जिस देश की इकनॉमिक डोर दूसरे हाथों में हो, वह उसके खिलाफ खुलकर बोल नहीं सकता. हर मुद्दे पर वेनेजुएला भी वही कहेगा, जो अमेरिका की लाइन हो. ग्लोबल मंच पर भी वो कठपुतली या छाया से अलग कुछ नहीं रह जाएगा.
एक बड़ा असर रणनीतिक फैसलों पर दिखता है. ऐसे देश यह तय नहीं कर पाते कि वे किस देश से रक्षा सौदे करें, किसे बंदरगाह दें या किसे सैन्य अभ्यास की इजाज़त दें. कई बार विदेशी अड्डे, लॉजिस्टिक समझौते या खनिज सौदे आर्थिक दबाव के तहत मानने पड़ते हैं.
वेनेजुएला अब तक मॉस्को और हवाना के करीब दिखता रहा. इनकी विचारधारा साम्यवादी है, यानी अमेरिका से उलट. अब पूंजीवादी देश के कंट्रोल से उसकी आइडियोलॉजी पीछे हो जाएगी और पारंपरिक दोस्त छूटने लगेंगे.
घरेलू उदाहरण से समझें तो वेनेजुएला अब वो पत्नी हो चुका, जिसकी अपनी कोई कमाई नहीं. ऐसे में पति के गलत फैसले भी वो अक्सर मान लेती है क्योंकि सर्वाइवल के दूसरे विकल्प नहीं. अमेरिका ने वेनेजुएला पर सैन्य अटैक नहीं करते हुए उसकी सेना को खत्म नहीं किया. बस, उसके लीडर को हटा दिया और संसाधनों पर कब्जा कर लिया. अब उसकी जमीन से लेकर फैसले तक अमेरिका से ही तय होंगे.
यह एक नई तरह का कॉलोनिलिज्म है, जिसे नव-उपनिवेशवाद भी कह सकते हैं. फर्क बस इतना है कि पहले सीधे शासन होता था, अब संसाधनों पर कंट्रोल के जरिए शासन होगा. इससे फॉरेन कंट्री खुद को उदार और मददगार भी दिखाती रहेगी, साथ ही रूल भी करती रहेगी.
यह आजमाया हुआ नुस्खा है. विश्व युद्धों के बाद जब देशों में खुद को लोकतांत्रिक दिखाने की होड़ लगी तो जंग और फतह पीछे रह गया. हालांकि इच्छा अब भी वही थी. ऐसे में यह तरीका खोजा गया. एब्सॉल्यूट इकनॉमिक कंट्रोल! चीन इसमें उस्ताद है. वहां की शी जिनपिंग सरकार ने एक के बाद एक देशों को निशाने पर लिया.
मसलन, श्रीलंका की ही बात करें तो पहले तो उसने विकास के नाम पर उन्हें भारी कर्ज दिया. मियाद खत्म होने पर कर्ज वापसी की बात आई. राजनीतिक अस्थिरता से जूझते श्रीलंका को इतनी मोहलत नहीं मिल सकी कि इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के बाद वो उससे पैसे बना सके. यानी कर्ज वापसी का कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में चीन ने उसके हंबनटोटा बंदरगाह को ही लीज पर ले लिया. अब भी वहां की नीतियों पर चीनी असर है. यहां तक कि चीन के प्रभाव में आने के बाद श्रीलंका अपने पारंपरिक मित्र जैसे भारत से भी कुछ दूरी रखने लगा.
aajtak.in