अमेरिका फर्स्ट का नारा देते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई पुराने साथियों को दूर कर दिया. यहां तक कि यूरोपियन यूनियन (ईयू) भी उससे बिदकता हुआ दिख रहा है. इसी बीच एक बदलाव दिखा. भारत और ईयू ने फ्री ट्रेड डील कर ली, जिसे मदर ऑफ ऑल डील्स कहा जा रहा है. व्यापार ही नहीं, यूरोप और भारत कई जगहों पर एक पेज पर दिख रहे हैं. लेकिन चीन कहां हैं? आमतौर पर अमेरिका की वजह से खाली हुई जगह भरने में वो सबसे आगे रहता आया. फिर अब नजर क्यों नहीं आ रहा?
क्या हो रहा दो पुराने साथियों के बीच
अमेरिका और यूरोप के रिश्ते पहले जैसे सहज नहीं दिखते. इसकी कई वजहें हैं, जिसमें ग्रीनलैंड भी शामिल है. यह द्वीपीय देश भले ही डेनमार्क के साथ जुड़ा इलाका है, लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए बहुत अहम है. आर्कटिक इलाके में बर्फ पिघल रही है, नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं और नेचुरल रिसोर्सेज की चर्चा तेज है. ऐसे में अमेरिका उसे क्लेम कर रहा है. वो चाहता है कि वहां उसकी मौजूदगी मजबूत करे. वहीं ईयू इसका विरोध कर रहा है.
ट्रंप की राजनीति ने ईयू से अमेरिका की दूरी को और बढ़ाया. वे खुलकर कहते हैं कि अमेरिका पहले है और सहयोग तभी होगा जब सीधा फायदा दिखे. नाटो में खर्च को लेकर ट्रंप लगातार यूरोपीय देशों पर दबाव डालते रहे. उनका साफ संदेश है कि सुरक्षा का बोझ अमेरिका अकेले नहीं उठाएगा. इससे यूरोप में नाराजगी बढ़ती गई.
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की मनमानी, यूरोप की मंजूरी के बिना फैसले लेने की आदत और व्यापारिक टकराव ने भरोसा कमजोर किया. यूरोप अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता. वह डिफेंस से लेकर फॉरेन पॉलिसी और व्यापार में भी अमेरिका से अलग पक्ष देख रहा है. भारत भी ट्रंप प्रशासन के इसी रवैये को झेल रहा है. ऐसे में दोनों ट्रेड डील कर चुके.
भारत के साथ कहां-कहां दिखने लगा ईयू
यूएस से बढ़ती नाराजगी के बीच यूरोप सिर्फ ट्रेड डील तक सीमित नहीं, बल्कि भारत को एक रणनीतिक साझेदार के तौर पर देख रहा है. हाल में दोनों के रिश्तों में कई नए पहलू जुड़े. सबसे अहम है डिफेंस और सुरक्षा सहयोग. फ्रांस, जर्मनी जैसे यूरोपीय देश भारत के साथ सैन्य अभ्यास, हथियारों की खरीद और इंडो-पैसिफिक सुरक्षा पर मिलकर काम कर रहे हैं. दूसरा बड़ा क्षेत्र टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन है. सेमीकंडक्टर और डिजिटल ढांचे में यूरोप, दिल्ली को भरोसेमंद विकल्प मान रहा है.
चीन को लेकर यूरोप का कैसा रवैया
अमेरिका से बढ़ते तनाव के बीच ईयू भारत के करीब आ रहा है, लेकिन चीन के मामले में वह उतना खुला और सहज नहीं. इसकी वजह सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि कई पुराने तजुर्बे हैं.
असल में यूरोप और चीन के रिश्ते ऊपर से ठीक दिखते हैं, लेकिन अंदर कई दरारें हैं. एक बड़ी वजह है चीन की आर्थिक नीतियां. यूरोपीय देशों को लगता है कि चीन अपने बाजार को पूरी तरह नहीं खोलता, जबकि यूरोपीय कंपनियों से बराबरी की उम्मीद करता है.
दूसरा बड़ा कारण है सुरक्षा और रणनीति. चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, ताइवान पर रुख और दक्षिण चीन सागर में आक्रामक रवैया यूरोप को असहज करता है. भले ही यूरोप का इन क्षेत्रों से सीधा लेनादेना नहीं, लेकिन उसे डर है कि बीजिंग का दबदबा वैश्विक संतुलन बिगाड़ सकता है.
यूरोप और चीन के बीच एक बड़ी दिक्कत मानवाधिकार को लेकर है. यूरोप का मानना है कि लोगों को बोलने, लिखने और अपनी राय रखने की आजादी मिलनी चाहिए. जबकि चीन में सरकार इस पर सख्त नियंत्रण रखती है.
मिसाल के तौर पर शिनजियांग को लें. यूरोप का आरोप है कि वहां उइगर मुसलमानों को जबरन निगरानी में रखा जाता है और उनकी धार्मिक आजादी सीमित है. इसी मुद्दे पर यूरोप ने कुछ चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाए. जवाब में चीन ने भी यूरोपीय नेताओं पर कार्रवाई की.
दोनों एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते. यूरोप को लगता है कि चीन अपनी बात छिपाता है, वहीं चीन को लगता है कि यूरोप उसके अंदरूनी मामलों में दखल दे रहा है. दोनों में कई व्यापारिक डील्स हो रही हैं, लेकिन वैसा भरोसा नहीं दिखता जैसा दिल्ली के साथ है.
एक कारण और है.
ईयू आखिर तक चाहेगा कि यूएस से उसके संबंध ठीक हो जाएं. अमेरिका आज भी यूरोप का सबसे बड़ा साथी है, खासकर सुरक्षा और कारोबार में. इसलिए ईयू उसे नजरअंदाज नहीं कर सकता. इसके उलट, चीन और रूस साथी हैं, जबकि रूस ही वो देश रहा, यूरोप जिससे बचने के लिए सारे तामझाम करता है. ऐसे में पुराने दोस्त मिलकर कब नई मित्र के साथ खेल कर जाएं, ये कहा नहीं जा सकता. शायद इसलिए भी यूरोप, बीजिंग के साथ उस तरह खुला नहीं.
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