कहते हैं कि जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं. यानी ऐसे लोगों से डरने की कोई वजह नहीं, जो बात-बेबात धमकियां देते रहते हैं. हालांकि राजनीति में गजरने वालों से देश डरते भी हैं. यह मैडमैन थ्योरी है, जिसे सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने आजमाया था. वियतनाम युद्ध के दौरान उन्होंने खुद को इतना सख्त और अप्रत्याशित दिखाने की कोशिश की कि दुश्मन यह माने कि वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, और वो दबाव में आकर समझौता कर ले. अब ट्रंप के एक्शन्स को भी इसी से जोड़ा जा रहा है.
टैरिफ युद्ध चल रहा है. ट्रंप ग्रीनलैंड के लिए किसी से भी दुश्मनी लेने को तैयार हैं. अलग-अलग देशों पर अमेरिकी प्रशासन सख्त हो चुका. कहीं-कहीं खुले युद्ध के भी आसार हैं. वाइट हाउस इन दिनों बेहद अनप्रेडिक्टेबल बन चुका. आज वहां से जो बयान जारी हो रहे हैं, कल उनका क्या होगा, यह तक तय नहीं. दोस्त-दुश्मन के बीच लकीर हल्की हो चुकी.
कोल्ड वॉर के दौर के रणनीतिकार डैनियल एल्सबर्ग और थॉमस शेलिंग का कहना था कि अगर कोई नेता यह दिखाए कि वह बहुत सख्त कदम भी उठा सकता है, तो सामने वाला डर जाता है और अपने फैसले बदल लेता है. मैडमैन थ्योरी पहले सिर्फ समझाने के लिए इस्तेमाल होती थी, यानी किसी नेता के अजीब या बेवजह सख्त लगने वाले तौर-तरीकों की वजह बताने के लिए. लेकिन बाद में कुछ नेताओं ने इसे एक रणनीति की तरह भी अपनाया.
यूएस के राष्ट्रपति इस मनोविज्ञान के खिलाड़ी थे. इसकी शुरुआत रिचर्ड निक्सन से हुई. बात साठ के दशक की है, जब अमेरिका- वियतनाम युद्ध कर रहे थे. लड़ाई लंबी खिंचने से खुद उनके देश के भीतर भी विरोध बढ़ रहा था.
निक्सन चाहते थे कि दुश्मन देश डर जाए और बिना ज्यादा उलझे समझौता कर ले. इसके लिए उन्होंने एक खास तरीका अपनाया, जिसे बाद में मैडमैन थ्योरी कहा गया. इसका मतलब था, दुश्मन को भरोसा दिलाना कि राष्ट्रपति इतना सख्त और अनप्रेडिक्टेबल है कि वह कुछ भी कर सकता है, यहां तक कि परमाणु हमला भी.
निक्सन ने जानबूझकर ऐसे संकेत दिए कि वे बहुत गुस्से में हैं और हालात हाथ से निकल सकते हैं. उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा वे इस तरह की अफवाह फैलाएं कि यूएस न्यूक्लियर तक जाने को तैयार है अगर उसे ज्यादा उकसाया जाए. यह सब एक सोची-समझी रणनीति थी. लेकिन इसमें खतरा भी था. अगर दुश्मन डरने की बजाय चुनौती दे देता, तो हालात और बिगड़ सकते थे.
वियतनाम भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था. वो इस ब्लफ को समझ गया. वो जानता था कि यूएस के भीतर ही काफी असंतोष है. एक परमाणु बम के लिए वो ऑलेरेडी कटघरे में रहा. ऐसे में दूसरा हमला कतई नहीं करेगा. नतीजा यह हुआ कि युद्ध चलता रहा. वियतनाम पीछे नहीं हटा, और आखिर में अमेरिका को ही धीरे-धीरे अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी.
मैडमैन थ्योरी डर का खेल है. इसमें लीडर खुद को खतरनाक दिखाकर बिना गोली चलाए जीतने की कोशिश करते हैं. लेकिन अब इस थ्योरी को आजमाने में कई पेंच हैं. आज की दुनिया निक्सन के दौर से अलग है. तब जानकारी सीमित थी. फैसले कुछ नेताओं तक सिमटे रहते थे. अब सैटेलाइट, सोशल मीडिया, इंटेलिजेंस एजेंसियां और मीडिया हर चाल को तुरंत पढ़ लेती हैं. ऐसे में कोई लीडर लंबे समय तक अपने अनप्रेडिक्टेबल होने को ढाल नहीं बना सकता.
फिर भी, कुछ हालात में यह थ्योरी असर दिखा सकती है, खासकर तब, जब सामने वाला देश कमजोर हो या उसे लगे कि नेता सच में अपना काबू खो सकता है. यही वजह है कि किम जोंग या ट्रंप जैसे नेताओं के बयान अक्सर मैडमैन थ्योरी से जोड़े जाते हैं.
ट्रंप कई बार काफी आक्रामक बयान देते हैं, फिर खुद ही पलट जाते हैं. भाषा तो सख्त होती है, लेकिन कोई ठोस फायदा नहीं मिलता. जब ऐसा बार-बार होता है, तो बाकी देशों को समझ आ जाता है कि उनका यह अप्रत्याशित व्यवहार भी दरअसल प्रत्याशित ही है. ऐसे में जाहिर तौर पर डर खत्म हो जाएगा. यह बात ईरान और ग्रीनलैंड, दोनों के मामलों में दिखी.
ईरान पर कभी इजरायल को लेकर तो कभी परमाणु तैयारियों को लेकर दबाव डाला गया, यहां तक कि सैन्य हमले भी हुए, लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि टकराव की सीमा कहां तक है. कुछ वक्त बाद अमेरिका खुद रुक गया.
ग्रीनलैंड के मामले में ट्रंप अपने पुराने साथी यूरोप से ही भिड़ गए. नतीजा ये हुआ कि नाटो में दरार दिखने लगी. रूस और चीन तो तैयार बैठे हैं कि नाटो कमजोर हो, और वे अमेरिका की गद्दी ले सकें. ट्रंप को दोबारा शांति होना पड़ा.
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