'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे टर्म में अलग ढंग से आकार ले रहा है. अमेरिकी फोर्स ने हाल में सैन्य ऑपरेशन चलाते हुए वेनेजुएला की लीडरशिप को कब्जे में ले लिया ताकि वहां के संसाधनों को हथिया सके. अब वॉशिंगटन की नजर ग्रीनलैंड पर है. ट्रंप प्रशासन पहले तो मीठी-मीठी बातें कर रहा था, लेकिन अब साफ हो चुका कि ग्रीनलैंड को या तो खरीदा जाएगा, या फिर आर्कटिक इलाके में अपने दुश्मनों को रोकने के लिए सैन्य ताकत का इस्तेमाल किया जाएगा.
कैसी है ग्रीनलैंड की स्थिति
यह दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप देश है, जिसका ज्यादातर हिस्सा बर्फ की मोटी परत से ढंका हुआ है. यहां आबादी भी साठ हजार से कुछ कम ही है. घरेलू मामलों पर सारे फैसले ये देश खुद लेता है लेकिन फिलहाल ये देश डेनमार्क के अधीन है. ट्रंप काफी समय से जोर लगा रहे थे कि डेनमार्क उनकी बात मानते हुए ग्रीनलैंड उन्हें सौंप दे. यहां कई दिक्कतें हैं. न तो डेनिश सरकार और खुद ग्रीनलैंडर्स ही यूएस के पास जाना चाहते हैं. ऐसे में ट्रंप कई वादे कर रहे हैं, जो एक कमजोर देश को लुभाने के लिए काफी हैं.
ग्रीनलैंड के पास अपनी सेना नहीं, न ही डेनमार्क के पास ऐसी सेना है, जो यूएस के सामने टिक सके. पहली नजर में देखें तो ग्रीनलैंड असहाय है. लेकिन नहीं. अमेरिका अगर इस बर्फीले देश पर आक्रामक हो तो काफी मुमकिन है कि नाटो देश ही उसके खिलाफ आ जाएं. यानी वे तमाम देश, जो अब तक यूएस के साथ मिलकर नाटो बनाए हुए थे, वे टूटकर आपस में लड़ने-भिड़ने लगेंगे.
ग्रीनलैंड में पहले से ही पिटुफिक स्पेस बेस मौजूद है, जिसे अमेरिका डेनमार्क की सरकार के साथ मिलकर चलाता है. अमेरिका और डेनमार्क दोनों ही नाटो के संस्थापक सदस्य हैं, जो दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन माना जाता है.
यूरोप और कनाडा के नेता डेनमार्क और ग्रीनलैंड के समर्थन में आ चुके. ऐसे में अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो यह नाटो के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा कदम होगा. इससे नाटो का टूटना तय है. साथ ही आर्टिकल 5 पर भी सवाल खड़ा होगा, जिसे किसी बाहरी हमलावर से बचाव के लिए बनाया गया था.
क्या है वो आर्टिकल जो नाटो की ढाल बना रहा
नाटो का आर्टिकल 5 इस अंब्रेला की सबसे अहम शर्त है. इसके तहत अगर नाटो के किसी भी सदस्य पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा. ऐसे में सारे एकजुट होकर लड़ेंगे. हर देश अपनी सैन्य क्षमता के हिसाब से सेना और हथियार भेजेगा.
नाटो के इतिहास में आर्टिकल 5 सिर्फ एक बार लागू हुआ था, साल 2001 में, जब अमेरिका पर 9/11 आतंकी हमला हुआ और सभी सदस्य देशों ने उसके समर्थन का ऐलान किया. तब हालांकि युद्ध की नौबत नहीं आई और अमेरिका ने ज्यादातर काम खुद ही संभाल लिया था और आतंकी खोज निकाले थे.
अब यही आर्टिकल क्यों लगा सकता है अड़ंगा
हाल के सालों में आर्टिकल 5 को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं. बाहरी हमलावरों को लेकर तो ये आर्टिकल साफ बात करता है, लेकिन क्या हो अगर एक सदस्य देश ही दूसरे सदस्य देश के खिलाफ आ जाए. तब भी क्या ये आर्टिकल लागू होगा? इसे मूल रूप से बाहरी हमलों से बचाव के लिए बनाया गया था लेकिन अमेरिका अगर ग्रीनलैंड समेत डेनमार्क पर अटैक करे, तब बाकी सदस्य देश क्या करेंगे, ये बात उठ रही है.
चूंकि आर्टिकल 5 को लागू करने के लिए नाटो के सभी सदस्य देशों की मंजूरी जरूरी है, ऐसे में दो सदस्य देशों के बीच ही टकराव हो जाए, तो गठबंधन फंस जाएगा. ऐसी स्थिति में नाटो अपने ही किसी सदस्य के खिलाफ युद्ध का फैसला नहीं कर सकता, क्योंकि गठबंधन खुद अपने खिलाफ वोट नहीं कर सकता. लेकिन चूंकि यूरोप फिलहाल अमेरिका से खासा नाराज है, इसलिए ये भी हो सकता है कि वो ऐसा कोई एक्शन ले.
साल 1949 में बना नाटो दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन है, जिसमें 32 सदस्य देश हैं. लेकिन पहले भी कई सदस्यों की आपस में ठनी रही.
- पचास के दशक से लगभग बीस सालों तक यूके और आइसलैंड फिशिंग मामले पर उलझते रहे.
- अमेरिका और वियतनाम के बीच युद्ध पर नाटो के यूरोपीय सदस्य खुश नहीं थे.
- साल 1974 में ग्रीस और तुर्की साइप्रस को लेकर एक-दूसरे से नाराज रहने लगे.
- साल 2003 में इराक पर कब्जे को लेकर यूरोप के कई देश एकमत नहीं थे.
इनमें से कोई भी मामला फुल-स्केल युद्ध तक नहीं पहुंचा लेकिन तनातनी काफी हुई. खासकर ग्रीस और तुर्की के बीच. साल 1974 में जब तुर्की ने साइप्रस पर कब्जा किया तो ग्रीस ने साइप्रस में अलगाववादियों को सपोर्ट करना शुरू कर दिया. बदले में तुर्की ने भी सैन्य हमला कर दिया. इससे दोनों नाटो देशों के बीच युद्ध लगभग होने को था. हालांकि तुर्की को रोकने में असफल नाटो से नाराज ग्रीस ने सैन्य गठबंधन से दूरी बना ली और लगभग छह सालों तक वो इससे दूर ही रहा.
अमेरिका और वियतनाम युद्ध के दौरान भी यही हुआ. नाटो नहीं चाहता था कि यूएस युद्ध में उलझे लेकिन वो रुका नहीं. ऐसे में फ्रांस ने नाटो की मिलिट्री कमांड छोड़ दी. उसे डर था कि अमेरिका उसे अनचाहे ही युद्ध में न घसीट ले. पूरे 43 साल बाद साल 2009 में फ्रांस दोबारा इस स्ट्रक्चर में लौटा.
अब क्या हो सकता है
ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भी नाटो से अलग होने की धमकियां दे चुके. अब वे खुलकर कह रहे हैं कि नाटो की ज्यादातर फंडिंग और सैन्य मदद अमेरिका ही करता रहा और बाकी सदस्यों को सुरक्षा चाहिए, तो उन्हें अपना डिफेंस बजट बढ़ाना होगा. अब ग्रीनलैंड का मुद्दा आ चुका. अमेरिका को ये देश हर कीमत पर चाहिए. अगर डेनमार्क इस पर राजी न हो तो सैन्य हमला हो सकता है. तब ये भी हो सकता है कि आलोचना छोड़कर बाकी देश उसकी सुरक्षा में आ जाएं. जो भी हो, छुटपुट विवादों के बाद भी अब तक बने हुए नाटो के लिए ये परीक्षा का वक्त रहेगा.
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