'विजय की जीत ने छीनी मेरी दिवाली की रौशनी, मगर खुश हूं वो CM की कुर्सी पर बैठेगा'

थलपति विजय के राजनीति में कदम रखने के साथ ही एक फैन के लिए एक पूरा एहसास बदल रहा है. दिल्ली में रहने वाले एक दक्षिण भारतीय के लिए दिवाली सेलिब्रेशन का मतलब था— विजय की फिल्में. जब स्क्रीन पर विजय नहीं होंगे, तो क्या दिवाली पहले जैसी बचेगी?

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विजय के साथ मेरी दिवाली (Photo: r/tollywood) विजय के साथ मेरी दिवाली (Photo: r/tollywood)

समाख्या ईडामरुकु

  • नई दिल्ली ,
  • 05 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:00 PM IST

दिवाली के साथ मेरा रिश्ता हमेशा थोड़ा अलग रहा है. मैं दक्षिण भारतीय हूं, इसलिए गर्मजोशी और अपनापन होने के बावजूद ये त्यौहार हमारे घर में कभी साल का सबसे बड़ा उत्सव नहीं रहा. ये दिन हमारे यहां कभी बहुत रीति-रिवाज़ या धूमधाम भरा नहीं होता था. दीवाली होती जरूर थी. लेकिन वो हमारी पहचान नहीं थी. हमारी पहचान सिनेमा था. और खासकर दिवाली की रात रिलीज़ होने वाली थलपति विजय की फिल्म. इसके लिए मेरा अपना एक छोटा सा रिवाज था.

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मैं चुपचाप मुरुक्कू और रिबन पकोड़ा के पैकेट दबाए थिएटर में घुस जाता था. जैसे चोरी से थिएटर में अपने घर का एक हिस्सा स्मगल कर रहा होऊं, ताकि फीलिंग अधूरी न लगे. मोस्टली देर रात वाले आखिरी शो, मेरे लिए दिवाली होते थे. बाहर दुनिया रंगों में डूबी होती थी, पटाखों की रोशनी से आसमान भर जाता था. मिठाई के डब्बों की अदला-बदली चल रही होती थी, मोहल्लों में खूब चहल पहल होती थी. और मेरी दिवाली कहीं और मन रही होती थी. एक थिएटर के अंदर. और इन सारी चीजों में केंद्र में होते थे विजय. सिर्फ एक एक्टर या स्टार की सूरत में नहीं. एक एहसास बनकर.

वक्त के साथ समझ आया कि ये सब रैंडम नहीं था. विजय की फिल्में धीरे-धीरे मेरी यादों में उत्सव का हिस्सा बन चुकी थीं. 2012 में थुप्पक्की (गन) ने दिवाली को तेज, धारदार और झन्नाटेदार बना दिया. फिर 2014 में कथ्थी (छुरी), जहां जश्न के साथ अंतरात्मा को छूने वाली एक आवाज भी थी— किसानों के लिए, अनसुनी कर दी गई गुहारों के लिए. 2017 की मर्सल (तबाह) सिर्फ एंटरटेन नहीं करती थी, सिस्टम से सवाल करने के लिए आपको झिंझोड़ती थी.

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सरकार (2018) उससे भी आगे निकल गई. वो सिर्फ स्क्रीन तक सीमित नहीं रही, थिएटर के बाहर भी साथ चली आई. आपका वोट. आपकी आवाज़. सिस्टम में आपकी जगह. और फिर आई 2019 की बिगिल (सीटी). वो दिवाली… अलग थी. पहली बार मैं विजय को सिर्फ हमेशा जीतने वाले हीरो की तरह नहीं देख रहा था. मैं एक ऐसे इंसान को देख रहा था जो दूसरों को आगे बढ़ाता है, उनमें विश्वास भरता है. उसमें एक गर्माहट थी. बिना शोर-शराबे वाली एक ताकत.

पता नहीं कैसे, लेकिन थिएटर में बैठे हुए, वो सब बहुत पर्सनल लग रहा था. क्योंकि अब विजय ही पर्सनल लगने लगे थे. थिएटर में होने वाला अनुभव बस उसे और गहरा कर देता था. ठसाठस भरे हॉल. हवा में बिजली सा दौड़ता उत्साह. ऐसा शोर जो शोर नहीं होता… इमोशन होता है. मैं दिल्ली के थिएटर्स में था, साउथ से बहुत दूर. लेकिन उन लोगों के बीच जो ठीक मेरी ही तरह फ़ील कर रहे थे.

सीटियां, चिल्लाना, तालियां— हर रिएक्शन पिछले से तगड़ा. ये सबकुछ अद्भुत था. एक ऐसा शहर, जहां तमिल मुख्य भाषा भी नहीं है, वहां पूरा थिएटर थलपति विजय के लिए फट पड़ता था… ये बहुत कुछ कह रहा था. ये सिर्फ फैनडम नहीं था. ये कनेक्शन था. जैसे ही वो स्क्रीन पर आते, थिएटर बदल जाता. और इन सारी चीजों के बीच मुझे समझ आया कि विजय मेरे लिए क्या बन चुके हैं. वो सिर्फ दिवाली का हिस्सा नहीं थे. वो मेरी दिवाली थे.

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उनकी फिल्में आपको सिर्फ उत्साह के मोमेंट नहीं देती थीं— एक भरोसा देती थीं. आपको पता होता था कि आप क्या महसूस करने वाले हैं. आपको पता होता था कि जब आप थिएटर से बाहर निकलेंगे तो चार्ज होंगे, संतुष्ट और पूर्ण. और शायद यही चीज उन बाकी सब लोगों से अलग करती है जिन्होंने हाल ही में विजय की तरह एक्टिंग से राजनीति में छलांग लगाने की कोशिश की. ये सब हम तमिलनाडु में पहले भी देख चुके हैं.

रजनीकांत ने कभी सच में पूरी तरह शुरुआत की ही नहीं— उनका संकोच अनुपस्थिति में बदल गया. कमल हासन ने कदम रखा तो सही, लेकिन उनका कनेक्ट कभी पूरी तरह चुनावी सफलता में नहीं बदल पाया. भीड़ से जुड़ने में उन्हें संघर्ष करना पड़ा, क्रिटिक्स उनकी विचारधारा को इस काम में बड़ी रुकावट मानते हैं.

विजय के साथ कनेक्शन अलग लगता है क्योंकि ये रातोरात नहीं बना. इसे सालोंसाल जिया गया है. महसूस किया गया है. सालों में. फिल्म दर फिल्म. उन पलों में जो आज भी ठहरे हुए हैं.

और अब, जब थलपति विजय पूरी तरह राजनीति में कदम रख रहे हैं, उस रास्ते पर जो सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी तक जाता है, तो लग रहा है जैसे कुछ खत्म होने को है. अचानक नहीं. नाटकीय तरीके से नहीं. बस… चुपचाप.

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क्योंकि मुझे पता है, एक दिवाली ऐसी आएगी जब मैं थिएटर में जाऊंगा… और वो स्क्रीन पर नहीं होंगे.

न कोई एंट्री शॉट. न सीटियां बटोरने वाला सीन. न वो गरजती हुई भीड़. बस जहां पहले जश्न हुआ करता था, वहां एक खामोशी होगी.

और शायद यही सबसे ज्यादा चुभ रहा है. बात सिर्फ उनकी फिल्मों को मिस करने की बात नहीं है. एक एहसास को मिस करने की है. इसलिए मेरे जैसे फैंस के लिए, ये जीत मीठी भी है-कड़वी भी. मैं खुश हूं. मुझे गर्व भी है, कि वो अब कुछ बड़ा बनने जा रहे हैं. एक ऐसी भूमिका में उतरने जा रहे हैं जिसमें असली ताकत और जिम्मेदारी है. लेकिन साथ ही एक सवाल भी है, जो मैंने कभी सोचा नहीं था कि पूछूंगा.

अब मैं शुक्रवार को क्या करूंगा? इस खाली जगह को हम कैसे भरेंगे? और सबसे बड़ी बात— इसकी भरपाई करने कौन पाएगा? क्योंकि इसका एक हिस्सा, इसमें मेरा हिस्सा हमेशा एक ऐसे थिएटर, ऐसी स्क्रीन और एक ऐसे स्क्रीन के नाम रहेगा जो अनजाने में मेरी दिवाली बन चुके थे. सिर्फ एक एक्टर के रूप में नहीं. एक इमोशन बनकर. ये मेरा सेलिब्रेशन था. ये मेरी विजय वाइब थी!

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