'मुल्क' और 'थप्पड़' के बाद डायरेक्टर अनुभव सिन्हा और एक्ट्रेस तापसी पन्नू की जोड़ी एक और दमदार फिल्म 'अस्सी' के साथ तैयार है. एक रेप केस के बहाने, रेप कल्चर और इस भयानक अपराध के खिलाफ न्याय में होने वाली ढिलाई की कहानी बताती 'अस्सी' का ट्रेलर ही आपको झिंझोड़ने के लिए काफी है.
अनुभव और तापसी, दोनों ही सोशल मैसेज वाली दमदार फिल्मों को जनता तक पहुंचाने में बहुत आगे रहे हैं. लेकिन हाल ही में 'अस्सी' की एक स्पेशल स्क्रीनिंग में तापसी ने जो कहा, वो सिर्फ उनका डर नहीं था, बल्कि एक कड़वा सच भी है. और अगर जनता ने ये नहीं समझा तो बहुत जल्द फिल्मों का एक पूरा जॉनर गायब हो जाएगा- सोशल मैसेज देने वाली मिड-बजट फिल्में.
तापसी ने ऐसा क्या कहा?
हाल ही में दिल्ली में मेकर्स ने 'अस्सी' की एक स्पेशल स्क्रीनिंग रखी, जिससे एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. इस वीडियो में तापसी कह रही हैं, 'इस तरह का सिनेमा जल्द ही एक दुर्लभ चीज होने वाला है. क्योंकि बहुत लोग ये सोच लेते हैं कि क्यों देखनी है रियलिटी? या फिर ओटीटी पर देख लेंगे. मैं एक छोटा सा रियलिटी चेक आपको ये बताना चाहती हूं कि ओटीटी पर भी ये नहीं देखने को मिलेगा बहुत जल्द. अगर ये फिल्में थिएटर्स में नहीं चलीं, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भी इन्हें नहीं खरीदेंगे. ये हमारी आज की रियलिटी है.'
समाज के खोट छांटने वाली फिल्मों का हाल
लॉकडाउन से पहले बॉलीवुड में फिल्मों का एक पूरा अलग टाइप था— मिड बजट में बनी सोशल मैसेज देने वाली फिल्में. इन फिल्मों का बजट एवरेज मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्म से कम होता था, लेकिन 'लो बजट' फिल्मों से थोड़ा ज्यादा. फिल्म के ट्रीटमेंट में फिल्मी नाटकीयता तो थी मगर सेटिंग, सिचुएशन और इमोशन्स में एकदम रियलिटी वाली सच्चाई. और इनमें समाज से जुड़ा कोई गंभीर मुद्दा होता था- कभी कॉमेडी के साथ, कभी पूरी गंभीरता के साथ.
अनुभव सिन्हा की तापसी के साथ 'मुल्क', 'थप्पड़', आयुष्मान खुराना की 'बाला' या अनुभव सिन्हा के साथ ही 'आर्टिकल 15'. लॉकडाउन से पहले आपको ऐसी कई फिल्मों के नाम याद आएंगे. लेकिन पिछले कुछ वक्त से ऐसी फिल्में बहुत कम बन रही हैं. वजह— लॉकडाउन के बाद, यानी पिछले 6 सालों में ऐसी फिल्में बहुत कम हो गई हैं. जनता और प्लेटफॉर्म्स दोनों ने जैसे इन फिल्मों का साथ छोड़ दिया है.
लॉकडाउन के बाद आई ऐसी फिल्मों की एक लंबी लिस्ट है जिनमें सोशल डिस्कोर्स से जुड़े मुद्दों को अच्छे ट्रीटमेंट के साथ पेश किया गया. इन फिल्मों को अच्छे रिव्यू भी मिले मगर ये बॉक्स ऑफिस पर कामयाब नहीं रहीं— चंडीगढ़ करे आशिकी (2021), झुंड (2022), अनेक (2022), भीड़ (2023), बधाई दो (2023) वगैरह. पिछले साल ही जमकर तारीफ़ें बटोरने वाली यामी गौतम की फिल्म 'हक' बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही. जबकि सीक्वल होने और अक्षय कुमार-अरशद वारसी के एक साथ आने के बावजूद 'जॉली एलएलबी 3' फ्लॉप होने से बाल-बाल बची.
इन फिल्मों का बॉक्स ऑफिस की उम्मीदों पर खरा न उतर पाना, ओटीटी पर भी ऐसी फिल्मों के दरवाजे बंद करने की वजह साबित हुआ. लॉकडाउन के समय जब थिएटर्स बंद थे, तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मेकर्स से मनमाने दामों पर ढीली फिल्में खरीद कर मार्किट बिगाड़ दिया. 2022-23 में जब थिएट्रिकल बिजनेस वापस पटरी पर लौटने लगा तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने एक अनऑफिशियल नियम बना लिया कि उन्हीं फिल्मों को खरीदा जाएगा जो बॉक्स ऑफिस पर अच्छा करेंगी.
इस सिस्टम में सबसे बुरा उन फिल्मों के साथ हुआ है जिनका कंटेंट तो भारी है, मगर शायद थिएटर्स में जाने वाली जनता के लिहाज से थोड़ा ज्यादा ही भारी है. एक तरफ थिएटर्स में ऐसी 'भारी' फिल्मों से डिस्ट्रीब्यूटर्स बचने लगे हैं. दूसरी तरफ ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भी अब बिजनेस के लिहाज से 'सेफ' फिल्में खरीदना चाहते हैं. भारी कंटेंट वाली फिल्मों से लोगों की भावना आहत होने का भी डर आजकल तगड़ा है.
अटकी पड़ी हैं बनकर तैयार सोशल फिल्में
कुछ दिनों पहले ही वैरायटी की एक रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले दो-तीन सालों में बनीं 50 से ज्यादा फिल्में खरीदार न मिलने की वजह से अटकी पड़ी हैं. इन्हें ना सिनेमा डिस्ट्रीब्यूटर खरीदना चाहते हैं, ना ओटीटी प्लेटफॉर्म्स. इसमें ऐसी फिल्में भी हैं जिन्हें फिल्म फेस्टिवल्स में अवॉर्ड मिले हैं और क्रिटिक्स से जमकर तारीफ़ें. कई फिल्मों ने तो अनाउंसमेंट के वक्त ही जनता की एक्साइटमेंट बढ़ा दी थी. मगर जब तक वो बनकर रेडी हुईं, सिनेमा का ईकोसिस्टम बदल गया.
दिग्गज एक्टर्स में नाना पाटेकर की 'द कन्फेशन' और अमिताभ बच्चन की 'सेक्शन 84' भी अटकी हुई हैं. स्टॉकिंग के मुद्दे पर बनी 'पूजा मेरी जान', सोशल मैसेज देने वाली 'सर्वगुण संपन्न' और 'रूमी की शराफत', अवॉर्ड विनिंग 'द रेपिस्ट' और 'द बैटल ऑफ भीम कोरेगांव' जैसी फिल्में खरीदार की आस में अटकी हैं.
ये पूरा गुणा-गणित शायद आपको ये बताने के लिए काफी होगा कि अगर आप एक दर्शक के तौर पर मिड-बजट, सोशल फिल्मों को सपोर्ट नहीं कर रहे हैं, तो आगे क्या होने वाला है. पिछली कुछ सालों में ही 'आर्टिकल 15' और 'पिंक' जैसी फिल्में दिखनी बेहद कम हो गई हैं. सोशल फिल्मों के सहारे ही करियर खड़ा करने वाले आयुष्मान खुराना, तापसी पन्नू और यामी गौतम जैसे दमदार एक्टर्स को फिल्मों के ज्यादा चमचमाते जॉनर ट्राई करने पड़ रहे हैं. कभी जिस वजह से इन एक्टर्स को 'रियल और डिफरेंट' कहा गया, वो वजह ही नहीं बचेगी, तो ये भी मेनस्ट्रीम बॉलीवुड स्टाइल वाली मसालेदार फिल्मों के हीरो-हीरोइन बनकर रह जाएंगे.
अनुभव सिन्हा और तापसी पन्नू की 'अस्सी' एक दमदार मैसेज के साथ आ रही है. फिल्म का ट्रेलर ही आपको एक ऐसे मुद्दे पर झिंझोड़ देगा जो सालों से ही नहीं, दशकों से भारतीय सोसाइटी को परेशान कर रहा है. ये फिल्म उस मुद्दे पर वो कन्वर्सेशन शुरू कर सकती है जो सालों पहले शुरू हो जानी चाहिए थी. मगर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनता रियलिटी का आईना दिखाने वाली एक कड़वी मगर जरूरी फिल्म को मौका देगी? क्या आप ऐसी फिल्म को मौका देंगे?
सुबोध मिश्रा