Meerut district politics: क्रांति की धरती जहां सुलगती रही है सांप्रदायिकता की आंच, दिलचस्प है मेरठ की सियासी लड़ाई

Uttar pradesh election western UP Meerut: मेरठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा जिला है. यहां कभी कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था लेकिन अब यहां बीजेपी, सपा और बसपा का दबदबा नजर आता है. बसपा फीकी पड़ी है तो सपा ने स्पीड पकड़ ली है. 

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मेरठ का रहा है गौरवशाली इतिहास मेरठ का रहा है गौरवशाली इतिहास

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 जनवरी 2022,
  • अपडेटेड 7:46 PM IST
  • पश्चिमी यूपी का बड़ा जिला है मेरठ
  • जिले में कुल सात विधानसभा सीटें
  • 2017 में भाजपा ने जीती थीं 6 सीटें

मेरठ को क्रांति की धरती कहा जाता है. मेरठ को शौर्य की धरती माना जाता है. मेरठ को खेल और एजुकेशन का हब भी माना जाता है. मेरठ और आसपास के क्षेत्र ने स्वतंत्र भारत को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. राष्ट्रभक्ति की अलख को इस क्षेत्र ने प्रज्जवलित किया है. 

अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई यानी 1857 की क्रांति में मेरठ और आसपास के वासियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. यहीं से आजादी की चिंगारी जली थी.  हालांकि, सांप्रदायिकता की आग में भी मेरठ झुलसता रहा है. 80 के आखिरी दशक में यहां दंगे भड़के थे. हाशिमपुरा नरसंहार हुआ था. 2019 में सीएए विरोधी प्रदर्शन के दौरान भी यहां हिंसा देखने को मिली थी. सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित करने वाली घटनाएं यहां अक्सर सामने आती रही हैं. लड़कियों की सुरक्षा और लव जिहाद जैसे विवादों से भी मेरठ का नाता रहा है.

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नौचंदी के मेले जैसा इतिहास

इस इलाके में शाहपीर साहब का मजार है, औघड़नाथ मंदिर है, सूरज कुंड पार्क है तो चंडी देवी मंदिर और बाले मियां का मजार भी है. मेरठ में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक नौचंदी मेला भी पूरे हिंदुस्तान में मशहूर है जो यहां होली के 2 हफ्ते बाद शुरू होता है. वैसे मेरठ को रावण की ससुराल भी कहा जाता है. बताया जाता है कि रावण की पत्नी मंदोदरी मेरठ की रहने वाली थी और यहां पर मंदोदरी के पिता मय दानव का राज महल हुआ करता था.

मेरठ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा जिला है. मेरठ में कभी कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था लेकिन अब यहां बीजेपी, सपा और बसपा का दबदबा नजर आता है. बसपा फीकी पड़ी है तो सपा ने स्पीड पकड़ ली है. 

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मुस्लिम-दलित केमिस्ट्री से बसपा का फॉर्मूला फिट करने वाला जिला रहा है बिजनौर

मेरठ अपने स्पोर्ट्स उद्योग, कैंची उधोग के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. मेरठ में स्पोर्ट्स के सामान के बड़े कारखाने हैं. यहां के क्रिकेट बैट भी काफी मशहूर हैं. इसके आलावा मेरठ में सोने के गहनों का बड़ा काम है. यहां की कार मार्केट मशहूर के साथ-साथ बदनाम भी है, जहां के बारे में कहा जाता है कि कार आती हुई दिखाती है लेकिन उसके बाद कहां गायब हो जाती है किसी को समझ नहीं आता. 

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से मेरठ की दूरी काफी कम है. दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेव-वे बनकर ये दूरी महज 40 मिनट की रह गई है. रैपिड रेल से भी दिल्ली-मेरठ को जोड़ा जा रहा है.

मेरठ के राजनीतिक समीकरण

मेरठ जिले में 7 विधानसभा क्षेत्र  हैं. कुल मतदाता की संख्या लगभग 34 लाख से ज्यादा है. जिसमें पुरुष मतदाता 18 लाख 26 हजार और महिला मतदाता 16 लाख 18 हजार हैं, मेरठ जिले में 4 लोकसभा सीट लगती हैं. इसकी सरधना विधानसभा मुज़फ्फरनगर लोकसभा सीट में आती है तो हस्तिनापुर विधानसभा बिजनौर लोकसभा सीट में, सिवालखास विधानसभा बागपत लोकसभा क्षेत्र में आती है. मेरठ लोकसभा क्षेत्र में हापुड़ जिले का इलाका भी आता है.

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मेरठ-हापुड़ लोकसभा से बीजेपी सांसद राजेंद्र अग्रवाल हैं जो तीन बार से सांसद हैं. राजेंद्र अग्रवाल की गिनती बीजेपी के सीनियर सांसदों में होती है लेकिन इस बार उनकी जीत का अंतर काफी घटा है. 2019 के चुनाव में राजेंद्र अग्रवाल को 586184 वोट मिले थे जबकि सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार हाजी याकूब को 581455 वोट मिले थे. जीत का अंतर काफी कम रहा था, हाजी याकूब की तरफ से गड़बड़ी के आरोप भी लगाए गए थे. 2014 में राजेंद्र अग्रवाल ने बसपा प्रत्याशी शाहिद अखलाक को हराया था. इस चुनाव में कांग्रेस से अभिनेत्री नगमा ने हाथ आजमाया था, लेकिन उनकी बुरी तरह शिकस्त हुई थी. मेरठ का प्रदेश की राजनीति में भी काफी प्रभाव माना जाता है. मेरठ से ही बीजेपी के विधायक रहे लक्ष्मीकांत वाजपेयी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. बीजेपी का पश्चिम क्षेत्रीय कार्यालय भी मेरठ  में ही है. दूसरी तरफ, सपा सरकार में मंत्री रहे शाहिद मंजूर जैसे बड़े नेता भी यहीं से आते हैं. 

मेरठ का जातीय समीकरण

मेरठ जिले में चुनाव हिंदू-मुस्लिम और जाति के नाम पर होता रहा है. मेरठ जिले में मुस्लिम, दलित, गुर्जर वोटरों की संख्या अच्छी तादाद में है. यहां अपराध का ग्राफ भी काफी हाई रहता है. सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं भी अक्सर होती रहती हैं.  मेरठ में धार्मिक समीकरण की बात करें तो एक अनुमान के मुताबिक यहां हिंदू  63.40 % के आसपास हैं और मुस्लिम 34.43 % के आसपास हैं. जातीय समीकरण की बात करें तो इलाके में वैश्य वोटरों का काफी प्रभाव है. इनके अलावा ठाकुर, ब्राह्मण, जाट, गुर्जर वोटर हैं. मुस्लिम वोटरों की संख्या काफी प्रभावशाली है. जबकि दलित वोटर भी बड़ी तादाद में हैं. 
 
मेरठ की 7 विधानसभा सीटों में 6 पर बीजेपी का कब्ज़ा है और एक पर समजवादी पार्टी का कब्ज़ा है. यहां मुख्य लड़ाई सपा, बसपा और बीजेपी में ही रहती है लेकिन इस बार आरएलडी भी कुछ कुछ नज़र आ रही है. 

2017 में क्या रहा रिजल्ट

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जिले में मेरठ शहर, मेरठ कैंट, मेरठ दक्षिण, किठौर, सरधना, सिवालखास और हस्तिनापुर समेत सात विधानसभा सीटें हैं. 2017 में मेरठ शहर से समाजवादी पार्टी के रफीक अंसारी बड़े अंतर से जीते थे. उन्होंने बीजेपी के दिग्गज लक्ष्मीकांत बाजपेयी को हराया था. जबकि बसपा काफी पीछे रही थी. इस सीट के अलावा बाकी सभी 6 सीटों पर भाजपा जीती थी. 

मेरठ कैंट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के सत्य प्रकाश अग्रवाल जीते थे. दूसरे नंबर पर बसपा के सतेंद्र सोलंकी रहे थे. मेरठ दक्षिण विधानसभा सीट से भाजपा के सोमेंद्र तोमर जीते थे. यहां से बसपा के याकूब कुरैशी दूसरे नंबर पर रहे थे. कांग्रेस ने अच्छी फाइट दी थी और पार्टी तीसरे नंबर पर रही थी. किठौर विधानसभा क्षेत्र हापुड़ जिले से सटा है, यहां भाजपा के सत्यवीर त्यागी जीते थे. त्यागी ने सपा सरकार में मंत्री रहे शाहिद मंजूर को हराया था. बसपा यहां तीसरे नंबर पर रही थी. 

सरधना सीट काफी हाईप्रोफाइल मानी जाती है. क्योंकि यहां से भाजपा के संगीत सोम चुनाव लड़ते हैं. 2017 में भी संगीत सोम जीते थे और सपा के बड़े चेहरे माने जाने वाले अतुल प्रधान को उन्होंने हराया था. बसपा के इमरान याकूब यहां तीसरे नंबर पर रहे थे. सिवालखास विधानसभा से भाजपा के जितेंद्र सतवई जीते थे, उन्होंने सपा के वरिष्ठ नेता गुलाम मोहम्मद को हराया था. यहां आरएलडी अच्छा लड़ी थी और तीसरे नंबर पर रही थी. ऐतिहासिक हस्तिनापुर सीट सुरक्षित है, यहां से भाजपा के दिनेश खटीक जीते थे. खटीक ने बसपा के योगेश वर्मा को हराया था. जबकि सपा कैंडिडेट तीसरे नंबर पर रहे थे. 

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कुल मिलाकर कहा जाए तो मेरठ जिले में 2017 के चुनाव में भले ही भाजपा की लहर चली हो, लेकिन उसे सपा से कड़ी टक्कर मिली थी. और कुछ सीटों पर मुस्लिम-दलितों के गठजोड़ ने भी अच्छी फाइट की थी. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और आरएलडी मिलकर लड़ रहे हैं. यानी जाटलैंड के इलाके में सपा ने जाटों की ही पार्टी से हाथ मिला लिया है. जिसे उसकी मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है. जबकि इलाके के बड़े मुस्लिम चेहरे बसपा का दामन छोड़ चुके हैं. इनमें से ज्यादातर सपा और आरएलडी के साथ मिल चुके हैं. 

 

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