नोएडा उत्तर प्रदेश के सबसे अहम शहरी केंद्रों में से एक है. यह एक नियोजित शहर है जिसे दिल्ली में भीड़ कम करने के मकसद से बसाया गया था और तब से यह राज्य के लिए सबसे ज्यादा रेवेन्यू देने वाले शहरों में से एक बन गया है. नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) के विस्तार के तहत बसाया गया यह शहर भारत के सबसे अच्छे नियोजित शहरों में से एक है. आज यह शहर अपने शुरुआती
औद्योगिक मकसद से कहीं आगे निकल चुका है. ऊंची-ऊंची रिहायशी इमारतें, ऑफिस कॉम्प्लेक्स, IT पार्क और एक्सप्रेसवे से जुड़ा शहरी विकास इसकी पहचान बन गए हैं.
नोएडा विधानसभा क्षेत्र, गौतम बुद्ध नगर लोकसभा क्षेत्र के पांच हिस्सों में से एक है. यह गौतम बुद्ध नगर जिले की एक सामान्य सीट है. 2008 में बनने के बाद से यहां चार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 2014 का उपचुनाव भी शामिल है. यहां पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव और फिर 2012 के विधानसभा चुनाव में वोटिंग हुई थी.
2012 में, डॉ. महेश शर्मा ने BJP के लिए पहला चुनाव जीता. उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के ओमदत्त शर्मा को 27,676 वोटों से हराया. 2014 में उनके लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद उसी साल उपचुनाव हुआ, जिसमें BJP ने विमला बाथम को अपना उम्मीदवार बनाया और सीट अपने पास बनाए रखी. उन्होंने समाजवादी पार्टी की काजल शर्मा को 58,952 वोटों के बड़े अंतर से हराया. इसके बाद BJP ने केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को मैदान में उतारा. उन्होंने 2017 में समाजवादी पार्टी के सुनील चौधरी को 104,016 वोटों से हराकर यह सीट जीती और 2022 में 181,513 वोटों के और भी बड़े अंतर से इसे बरकरार रखा. पंकज सिंह को 244,319 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के सुनील चौधरी को 62,806 वोट मिले.
नोएडा क्षेत्र में BJP का दबदबा लोकसभा चुनावों में भी दिखता है. इसने 2009 में कांग्रेस से 34,818 वोट, 2014 में समाजवादी पार्टी से 149,476 वोट, 2019 में बीएसपी से 198,060 वोट और 2024 में फिर से समाजवादी पार्टी से 214,493 वोटों की बढ़त बनाई. 2024 के लोकसभा चुनाव में, बीजेपी के डॉ. महेश शर्मा को 277,999 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के डॉ. महेंद्र सिंह नागर को 63,506 वोट मिले.
नोएडा में रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या में पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जिसका मुख्य कारण सर्विस क्लास और वर्कफोर्स का यहां आकर बसना है. 2012 में यह संख्या 428,259 थी, जो 2017 में बढ़कर 523,865, 2019 में 668,095, 2022 में 714,072 और 2024 में 782,872 हो गई.
हालांकि, उत्तर प्रदेश के मानकों के हिसाब से वोटिंग प्रतिशत कम रहा है, जो शहरी वोटरों की आम उदासीनता और इस बात को दिखाता है कि कई निवासी राज्य की राजनीतिक गतिविधियों से गहराई से जुड़ाव महसूस नहीं करते हैं. 2012 में यह 48.98 प्रतिशत, 2017 में 48.57 प्रतिशत, 2019 में 52.34 प्रतिशत, 2022 में 48.80 प्रतिशत और 2024 में 46.96 प्रतिशत था.
नोएडा मुख्य रूप से एक शहरी निर्वाचन क्षेत्र है, जहां 94.88 प्रतिशत शहरी वोटर और केवल 5.12 प्रतिशत ग्रामीण वोटर हैं. यह हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है, और अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी इसके कुल वोटरों में लगभग 9.15 प्रतिशत है.
सामाजिक नजरिए से, नोएडा एक हिंदू-बहुसंख्यक निर्वाचन क्षेत्र है. नोएडा के वोटर्स में ऊंची जातियों, व्यापारी समुदायों, मिडिल-क्लास प्रोफेशनल्स और दूसरे इलाकों से आकर बसे लोगों की बड़ी संख्या है. वहीं, ग्रामीण इलाकों में जाट, गुर्जर और खेती-बाड़ी से जुड़े दूसरे समुदाय शामिल हैं. यहां मुस्लिम आबादी भी कुछ इलाकों में है, लेकिन पश्चिमी यूपी की दूसरी सीटों के मुकाबले उनकी संख्या उतनी ज्यादा नहीं है.
नोएडा के वोटर्स उत्तर प्रदेश की ज्यादातर सीटों से अलग हैं. यहां सैलरी पाने वाले प्रोफेशनल्स, एंटरप्रेन्योर्स, रियल एस्टेट से जुड़े परिवारों, इंडस्ट्रियल वर्कर्स, सर्विस सेक्टर के कर्मचारियों और शहर भर के अपार्टमेंट, कॉलोनियों और नए सेक्टरों में बसे बाहरी लोगों का दबदबा है. पुराने गांवों का महत्व अब भी है, लेकिन अब वे शहर की बहुत बड़ी आबादी के साथ रहते हैं, जिनकी चिंताएं पारंपरिक ग्रामीण जातिगत समीकरणों के बजाय घर, आने-जाने की सुविधा, प्रदूषण, बिल्डरों से जुड़ी समस्याएं, नागरिक सुविधाएं और रोजगार जैसी चीजें हैं.
इस शहरी स्वरूप ने बीजेपी को पिछले कुछ सालों में नोएडा में मजबूत आधार बनाने में मदद की है. मिडिल-क्लास वोटर्स के बीच पार्टी की लोकप्रियता, उसकी संगठनात्मक ताकत और दिल्ली के राजनीतिक और मीडिया माहौल से नजदीकी ने इस सीट को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे भरोसेमंद सीटों में से एक बना दिया है. हाल के चुनावों में समाजवादी पार्टी मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी रही है, लेकिन उसका समर्थन ज्यादातर विपक्षी वोटर्स, कुछ पुराने ग्रामीणों और वर्किंग क्लास के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रहा है. इस सीट पर बीएसपी की भूमिका काफी कम हो गई है.
नोएडा के राजनीतिक व्यवहार पर इस बात का भी असर पड़ता है कि भले ही यह उत्तर प्रदेश में है, लेकिन यहां के कई निवासी दिल्ली-NCR की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं. लोग दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में काम करते हैं, दिल्ली के अखबार पढ़ते हैं, दिल्ली के टीवी चैनल देखते हैं और अक्सर लखनऊ में राज्य की राजधानी की राजनीतिक बहसों के बजाय NCR की शहरी चिंताओं से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं. इस वजह से यह सीट राज्य की राजनीति से भावनात्मक रूप से कम जुड़ी है और कामकाज, कनेक्टिविटी और शहरी प्रशासन की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान देती है.
इस इलाके को राज्य के सबसे अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर का भी फायदा मिलता है. यह DND फ्लाईवे और दूसरी मुख्य सड़कों के जरिए दिल्ली से जुड़ा है, जबकि नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे और यमुना एक्सप्रेसवे ने इस इलाके में आने-जाने और रियल एस्टेट डेवलपमेंट को पूरी तरह बदल दिया है. मेट्रो कनेक्टिविटी ने नोएडा को दिल्ली और बड़े NCR के साथ और भी मजबूती से जोड़ा है. नोएडा अभी तक इंडियन रेलवे के मैप पर नहीं है और लंबी दूरी की यात्रा के लिए दिल्ली के कई रेलवे स्टेशनों पर निर्भर है. अब इस इलाके को दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट और हाल ही में शुरू हुए नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दोनों से सेवा मिलती है, जिससे इसे NCR कॉरिडोर के दोनों सिरों पर सीधी हवाई कनेक्टिविटी मिलती है. आस-पास की जगहों और खास जगहों में कनॉट प्लेस (लगभग 25 km दूर), साउथ दिल्ली (लगभग 20 km दूर), गाजियाबाद (लगभग 20 km दूर), हापुड़ (लगभग 45 km दूर), मेरठ (लगभग 70 km दूर) और आगरा (लगभग 200 km दूर) शामिल हैं.
नोएडा यमुना और हिंडन नदियों के किनारे बसा है, और इसी भौगोलिक स्थिति ने इसके शहरी विकास और पर्यावरण की स्थिति को तय किया है. शहर की नदी के किनारे वाली लोकेशन और इसके सुनियोजित सेक्टर लेआउट ने इसे NCR में एक अलग पहचान दी है.
नोएडा का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा हरा-भरा है, जो इसे भारत के सबसे हरे-भरे शहरों में से एक बनाता है. इसका बड़ा ग्रीन कवर, पार्क, इंस्टीट्यूशनल एरिया और सुनियोजित खुली जगहें लंबे समय से इसकी खासियत रही हैं, भले ही तेजी से हो रहे रियल एस्टेट विकास ने शहर का स्वरूप बदलना जारी रखा है.
आर्थिक रूप से, नोएडा अपने शुरुआती औद्योगिक मकसद से कहीं आगे निकल चुका है. दिल्ली में भीड़ कम करने और इंडस्ट्री व घरों के लिए सुनियोजित जगह देने के मकसद से बसाया गया यह शहर अब अपने आप में एक बड़ी शहरी अर्थव्यवस्था बन गया है, जिसमें रियल एस्टेट, मैन्युफैक्चरिंग, IT, इलेक्ट्रॉनिक्स, सर्विस और रिटेल सभी अहम भूमिका निभाते हैं. शहर की रेवेन्यू क्षमता, सुनियोजित लेआउट और लगातार चल रहे निर्माण कार्यों ने इसे उत्तर प्रदेश के शहरी बदलाव के सबसे प्रमुख प्रतीकों में से एक बना दिया है.
आज नोएडा सुनियोजित औद्योगिक क्षेत्र से एक पूर्ण शहरी टाउनशिप में और मुख्य रूप से फैक्टरियों के लिए डिजाइन की गई जगह से एक ऐसी जगह में बदलने की प्रक्रिया को दिखाता है जहां अब बड़ी संख्या में मध्यम वर्ग के लोग रहते हैं. इस बदलाव ने राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के स्वरूप को भी बदल दिया है. यहां पुराने ग्रामीण इलाकों की राजनीति पर हावी रहने वाले सामाजिक मुद्दों के बजाय, अथॉरिटी का कामकाज, इलाके का रखरखाव, जल-जमाव, सीवरेज, ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, प्रॉपर्टी से जुड़े विवाद और शहरी जीवन का खर्च जैसे मुद्दे कहीं ज्यादा मायने रखते हैं.
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, ऐसा लगता है कि नोएडा मजबूती से BJP के पाले में ही रहेगा, बशर्ते मौजूदा सरकार के खिलाफ कोई जबरदस्त लहर न चले या शहरी प्रशासन को लेकर लोगों में भारी नाराजगी न हो. पार्टी को शुरुआत से ही मजबूत बढ़त हासिल है, जिसकी वजह है लगातार बड़ी जीत का अंतर, शहरी मतदाताओं का समर्थन और NCR के महत्वाकांक्षी मिडिल क्लास की पसंदीदा पार्टी के तौर पर इसकी छवि. अगर विपक्ष इस मुकाबले को कड़ा बनाना चाहता है, तो उसे मुख्य रूप से नागरिक समस्याओं, जीवन-यापन के बढ़ते खर्च के दबाव और किराएदारों, मजदूरों व मूल ग्रामीणों की नाराजगी जैसे मुद्दों पर निर्भर रहना होगा.
(अजय झा)