गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान आलू किसानों की सबसे बड़ी परेशानी को उठाते हुए कहा, पश्चिम बंगाल के किसानों को उनकी उपज का सही दाम नहीं मिल रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अहंकार के कारण बंगाल में उत्पादित आलू को ओडिशा और झारखंड भेजने की अनुमति नहीं दी जाती, जिसकी वजह से किसानों को ₹20 प्रति किलो मिलने के बजाय ₹2 प्रति किलो तक की कीमत मिल रही है.
अमित शाह ने वादा किया कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद पहले ही दिन से बंगाल का आलू पूरे देश में बेचा जाएगा और बेहतर बीज उत्पादन के लिए परियोजना भी शुरू की जाएगी, ताकि किसानों को पंजाब से बीज न मंगवाना पड़े. गृह मंत्री के इस दावे की सच्चाई जानने के लिए मैं सिंगूर के उन इलाकों की ओर निकल पड़ा, जहां आलू की सबसे ज्यादा पैदावार होती है.
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से सिंगूर की दूरी महज एक घंटे की है. सुबह करीब 6 बजे मैं और मेरे सहयोगी जगन्नाथ सिंगूर के लिए निकले और लगभग 7:15 बजे उन क्षेत्रों में पहुंच गए, जहां आलू की पैदावार सबसे ज्यादा होती है. वहां पहुंचते ही देखा कि लगभग सभी गोदाम आलू से भरे पड़े हैं. कहीं बोरी में भरे आलू, तो कहीं जमीन पर ढेर लगे हुए थे.
एक गोदाम के बाहर कुछ किसान खाली बोरियां जमा कर रहे थे. जब मैंने एक किसान से हालचाल पूछा और बिक्री के बारे में जाना चाहा, तो उनकी आंखों में दर्द साफ नजर आया. उन्होंने कहा, "बाजार का दाम पूरी तरह गिर चुका है. कोई कमाई नहीं है, कैसे जिएंगे?” इतना कहकर वह अंदर चले गए और जमीन पर बैठकर बीड़ी सुलगा ली, मानो हर कश के साथ अपना दुख धुएं में उड़ाने की कोशिश कर रहे हों.
आगे बढ़ने पर एक और गोदाम मिला, जहां अंदर सड़े हुए आलू की तीखी बदबू फैली हुई थी. एक किसान उसी ढेर के पास बैठा था. पूछने पर उसने कहा, “अगर ये आलू बिक जाते, तो मैं घर पर पंखे के नीचे बच्चों के साथ आराम करता. लेकिन अब घर जाने का मन ही नहीं करता, क्योंकि हाथ में पैसे नहीं हैं.”
प्रदीप दास, जो बचपन से आलू की खेती कर रहे हैं, वो बताते हैं, “इस बार पैदावार बहुत ज्यादा हुई है, जिससे भारी नुकसान हो रहा है. एक बीघा में करीब ₹32,000 लागत आती है, लेकिन हमें सिर्फ ₹16,000 से ₹18,000 ही मिल रहे हैं. आलू बाहर नहीं जा पा रहा है, इसलिए दाम नहीं बढ़ रहे. इतनी ज्यादा पैदावार है कि कोल्ड स्टोरेज का आलू खत्म होने में डेढ़ साल लग जाएगा.”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बॉर्डर पर गाड़ियों को रोका जाता है और दबाव बनाया जाता है. करीब दो दशक बाद सिंगूर एक बार फिर संकट में है. इस साल लगभग 140 लाख टन आलू का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है, लेकिन यही बंपर फसल अब किसानों के लिए बोझ बन गई है. गोदामों में आलू सड़ रहे हैं. जब मैंने प्रदीप दास से पूछा कि क्या वे बदलाव चाहते हैं, तो उन्होंने कैमरे के सामने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. बाद में बिना कैमरे के बातचीत में उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े. उन्होंने कहा, “अगर मैं कैमरे पर कुछ बोल दूंगा, तो मेरे गोदाम में आग लगा दी जाएगी. मैं क्या खाऊंगा और बच्चों को क्या खिलाऊंगा?”
इस बातचीत ने साफ कर दिया कि डर का माहौल भी किसानों के बीच गहराई से मौजूद है. इसी दौरान एक अन्य किसान हमें अपने गोदाम में ले गए, जहां किसान सड़े हुए आलू अलग कर रहे थे, ताकि बाकी बचाए जा सकें.
किसान जोहर दत्ता ने बताया, “इस बार हालत बहुत खराब है. पैदावार ज्यादा है और दूसरे राज्यों में भी आलू की खेती बढ़ गई है, इसलिए हमारा आलू बाहर नहीं जा पा रहा. कोल्ड स्टोरेज पूरी तरह भर चुके हैं. हर जगह आलू के ढेर लगे हैं. इस साल भारी नुकसान हुआ है.”
बातचीत के बीच मैंने देखा कि एक किसान सिर पर बड़ा स्टील का तसला रखे सड़े हुए आलू फेंकने जा रहा था. वह धीरे-धीरे ढेर तक पहुंचा और अपनी मेहनत की फसल को खुद ही कूड़े में डाल दिया. यह दृश्य किसी भी व्यक्ति को झकझोर देने के लिए काफी था. एक किसान, जिसने महीनों मेहनत की, उसे अपनी ही फसल फेंकनी पड़ रही है क्योंकि उसे सही दाम नहीं मिला. इसी दौरान एक और किसान, विश्वजीत, ने बताया कि लगातार नुकसान के कारण कुछ किसानों ने आत्महत्या तक कर ली है.
उन्होंने कहा, “आलू का सही दाम नहीं मिल रहा. कई किसान टूट चुके हैं. जब माल बाहर जाएगा ही नहीं, तो काम कैसे चलेगा? उत्पादन लागत करीब ₹8 प्रति किलो है, लेकिन बाजार में 3-5 किलो आलू बेहद सस्ते में मिल रहा है. कोल्ड स्टोरेज में जगह नहीं है, कई किसान बर्बाद हो चुके हैं.” इतने किसानों से बातचीत के बाद यह साफ हो जाता है कि बंगाल के आलू किसानों पर इस समय संकट का पहाड़ टूट पड़ा है. बंपर पैदावार, गिरते दाम, भरे हुए कोल्ड स्टोरेज और सरकारी मदद की कमी इन सबने मिलकर किसानों की हालत बेहद खराब कर दी है.
पीयूष मिश्रा