पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'हवा' का रुख कब मुड़ जाए, इसे भांपना बड़े-बड़े दिग्गजों के बस की बात नहीं होती. लेकिन चुनाव के आखिरी हफ्ते में बंगाल की गलियों से लेकर चौपालों तक जो सुगबुगाहट शुरू हुई, उसने एक बड़े मूड स्विंग की ओर इशारा कर दिया है.
इंडियाटुडे/आजतक के 30 रिपोर्टर्स और ग्राउंड स्ट्रिंगर्स से मिले इनपुट ये बताते हैं कि चुनाव के आखिरी दौर में पश्चिम बंगाल का वोटर सिर्फ 'बदलाव' के लिए नहीं, बल्कि कई बड़े और बुनियादी मुद्दों पर अपना मन बदल रहा था. इसे सिर्फ 'एंटी-इन्कम्बेंसी' कहना अधूरा होगा.
ये असल में कई बड़े फैक्टर्स का ऐसा 'संगम' है, जिसने बीजेपी के पक्ष में आखिरी मिनट में लहर पैदा कर दी. ये बदलाव कई परतों से मिलकर बना, मसलन महिलाओं की नाराजगी, सरकरी कर्मचारियों की उम्मीदें, विकास, सुरक्षा का सवाल और वोटर लिस्ट की नई राजनीति.
आइए इसे विस्तार से समझते हैं...
1. केंद्रीय सुरक्षा बलों की मौजूदगी और 'डर की दीवार' का टूटना
बंगाल में चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास है. कई इलाकों में लोग मानकर चलने लगे थे कि जिसका झंडा मजबूत, वोट उसी के नाम जाएगा. इस बार केंद्रीय बलों की अभूतपूर्व मौजूदगी, फ्लैग मार्च और संवेदनशील बूथों पर कड़ी तैनाती ने चुनाव का पूरा माहौल ही बदल दिया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और संबद्ध संगठन घर-घर जाकर लोगों को मतदान के लिए प्रेरित कर रहे थे. यह संदेश दे रहे थे कि अब डरने की जरूरत नहीं, खुलकर वोट डालिये. महिलाओं और पहली बार वोट करने वाले युवाओं में यह भरोसा मजबूत हुआ कि उनका वोट बेकार नहीं जाएगा.
2. हिचकते मतदाताओं को BJP ने अपनी ओर ऐसे खींच लिया
15 साल के शासन के बाद स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार, ठेकेदारी, गुटबाजी और शिकायतों की अनसुनी जैसी बातें आम शिकायत बन चुकी थीं. TMC की योजनाओं से लाभ पाने वाले लोग भी यह कहते दिखे कि योजनाएं तो किसी भी सरकार को चलानी ही पड़ेंगी, लेकिन व्यवहार बदलना जरूरी है.
बीजेपी अब एक सशक्त प्रतिद्वंद्वी के रूप में दिखने लगी थी, जिससे एंटी इन्कम्बेंसी वोट पहली बार किसी एक विकल्प के पीछे संगठित हुआ. नतीजा यह कि आखिरी हफ्ते में परिवर्तन सिर्फ नारा नहीं, एक व्यावहारिक विकल्प बनकर सामने आया. उसने हिचकते मतदाताओं को भी अपनी ओर खींच लिया.
3. कल्याणकारी योजनाओं से राहत, लेकिन सुरक्षा की टीस
पिछले दशक में लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, रूपश्री जैसी योजनाओं ने करोड़ों महिलाओं को सीधी आर्थिक राहत दी. उन्हें घर के अंदर ताकत मिली. लेकिन संदेशखाली, आरजी कर रेप-मर्डर जैसे मामलों ने यह भरोसा तोड़ा कि दुख तकलीफ में सरकार हमारी ढाल बनेगी, सुरक्षा की टीस कल्याणकारी योजनाओं से ऊपर उठने लगी.
बहुत सारी महिलाएं दोहरी सोच में जी रही थीं. वो चाहती थी कि कल्याणकारी योजनाएं तो रहें, लेकिन उन पर सिडिंकेट राज या स्थानीय दबंगों की छाया न रहे. इसी मौके का बीजेपी ने फायदा उठा लिया. बीजेपी के सुरक्षा और सम्मान नैरेटिव ने पकड़ ली. लोगों को भरोसा होने लगा कि नई सरकार में सम्मान से जी सकते हैं.
4. 'मां-दीदी' से जुड़ाव, लेकिन 'सुनवाई' की कमी से दूरी
ममता बनर्जी ने खुद को बहुत साल तक माँ-दीदी के रूप में प्रोजेक्ट किया. महिलाओं ने उन्हें अपने संघर्ष, सादगी और जिद के कारण अपनाया भी था. लेकिन जब स्थानीय स्तर पर शिकायतों, खासकर घरेलू हिंसा, छेड़खानी, जमीन विवाद और दहेज विवाद पर पुलिस या पार्टी के जरिए न्याय नहीं मिला, तो वही महिलाएं मायूस होने लगीं.
5. महिला मतदाता: चुप समर्थन से खुली नाराजगी तक
एनडीए सरकार की ओर से महिलाओं के लिए विधायिका में आरक्षण लाने की कोशिश ने बीजेपी को एक मजबूत प्रो वुमन नैरेटिव दिया. बीजेपी ने विपक्षी दलों को महिला विरोधी बताकर माहौल बनाया, जिसका असर जमीनी स्तर पर खासकर कस्बों और छोटे शहरों में दिखा. सुरक्षा को लेकर यs भावना उभरने लगी कि एक बार बदलकर देखना चाहिए.
6. सरकारी कर्मचारी के बीच सातवें वेतन आयोग की गूंज
लंबे समय से राज्य सरकारी कर्मचारियों में वेतन और डीए को लेकर असंतोष जमा था. वे खुद को दूसरे राज्यों के मुकाबले पिछड़ा हुआ महसूस कर रहे थे. बीजेपी की ओर से 45 दिन के भीतर सातवें वेतन आयोग को लागू करने और लाखों रिक्त पद भरने का वादा बहुत ठोस और समयबद्ध संदेश बनकर उभरा.
यह संदेश सिर्फ मौजूदा कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहा. उनके परिवारों, संविदा कर्मियों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं तक फैल गया. आखिरी 5–6 दिनों में चाय की दुकानों, कोचिंग सेंटर्स और सरकारी दफ्तरों के आसपास यही चर्चा लोगों के मतदान निर्णय को प्रभावित करती दिखी.
7. 'डबल इंजन' बनाम 'सिंगल इंजन': विकास की नई बहस
बीजेपी ने चुनाव को मोदी बनाम ममता की सीधी टक्कर के रूप में पेश करते हुए कहा कि केंद्र की योजनाएं या तो रोकी जा रही हैं या उनका श्रेय बदल दिया जा रहा है. दूसरी ओर टीएमसी अपनी कल्याणकारी योजनाओं और बंगाली अस्मिता के नैरेटिव के साथ मैदान में थी, लेकिन बेरोजगारी का मुद्दा लगातार उभरता रहा.
शहरी और कस्बाई इलाकों में डबल इंजन सरकार की बात की बात कही गई. इससे निवेश, सड़कें, इंडस्ट्रियल पार्क जैसी ठोस चीजों की उम्मीद जगाई गई. बहुत से युवाओं और मध्यमवर्गीय मतदाताओं ने इसे एक मौका माना कि वेलफेयर बना रहेगा, लेकिन शायद रोजगार के मौके बढ़ जाएंगे.
8. SIR, आउटसाइडर नैरेटिव और वोटर लिस्ट की राजनीति
SIR के तहत मतदाता सूची की बड़े पैमाने पर समीक्षा ने चुनाव में एक नया मोड़ जोड़ा. बीजेपी ने इसे शुद्धिकरण की प्रक्रिया बताते हुए दावा किया कि वर्षों से फर्जी या बाहरी वोट से जनादेश बदला जाता रहा है. अब केवल असली नागरिक वोट डाल सकेंगे. सीमा से सटे और संवेदनशील इलाकों में यह नैरेटिव पहचान, नागरिकता और जनसांख्यिकी के डर से जुड़कर बीजेपी के पक्ष में ध्रुवीकरण का कारण बना.
बिश्वजीत