हिन्दी और हिन्दू विरोध की लहर उठाते खुद बह गए स्टालिन-उदयनिधि!

डीएमके का हिंदी और हिंदू विरोधी रुख उसकी वैचारिक नींव 'द्रविड़ आंदोलन' से गहराई से जुड़ा है. डीएमके खुद को हिंदी, हिन्दू और उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व के विरोध में स्थापित करता है. पार्टी ने इन मुद्दों को अपनी राजनीतिक पहचान और वोट बैंक को एकजुट रखने के लिए किया है. लेकिन इस बार ये दांव औंधे मुंह गिरता दिख रहा है.

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पिछले 5 वर्षों में DMK लीडरशिप ने हिन्दू और हिन्दी विरोध को अपना मुख्य एजेंडा रखा है. (Photo: ITG) पिछले 5 वर्षों में DMK लीडरशिप ने हिन्दू और हिन्दी विरोध को अपना मुख्य एजेंडा रखा है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:19 PM IST

तमिलनाडु की राजनीति में 2026 का विधानसभा चुनाव एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है. शुरुआती रुझानों और नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि राज्य की पारंपरिक सत्ता संरचना जहां दशकों से DMK और AIADMK के बीच सीधा मुकाबला होता था अब टूटती नजर आ रही है. इस बार तमिलनाडु के राजनीतिक परिदृश्य पर सिने स्टार और तमिलगा वेट्री कड़गम (Tamilaga Vettri Kazhagam-TVK) थलपति विजय की शानदार एंट्री हुई है. ऐसा लग रहा है कि ओपनिंग पारी में ही विजय  तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. 

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इस बार उभरती ताकत के रूप में Tamilaga Vettri Kazhagam और उसके नेता विजय ने पूरे चुनावी समीकरण को ध्वस्त कर दिया. 2021 में सत्ता में आई डीएमके तमिलनाडु में दूसरी बार सत्ता में आने से चूकती दिख रही है. 

234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है. शुरुआती रुझानों में TVK करीब 109 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि AIADMK+ गठबंधन 65 और DMK+ मात्र 60 सीटों पर सिमट गया है.

रुझानों में DMK का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा है और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सत्ता पर पकड़ ढीली पड़ती दिख रही है.

तमिलनाडु में हिन्दी और हिन्दू विरोध की राजनीति के जरिये सत्ता में लौटने की कोशिश कर रहे एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन एंटी इंकमबेंसी लहर में बह गए हैं.

इस चुनाव में सीएम एमके स्टालिन और उदयनिधि स्टालिन ने पूरे अभियान को 'हिन्दी थोपने' और 'द्रविड़ पहचान' के नारे पर केंद्रित किया. डीएमके ने केंद्र की तीन भाषा नीति का विरोध किया और ये नैरेटिव बनाने की कोशिश की कि BJP का तमिलनाडु की सत्ता में आना हिन्दी और हिन्दू एजेंडे को थोपने के समान होगा. 

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लेकिन DMK की यह रणनीति इस बार पार्टी के लिए कामयाब होती नहीं दिख रही है. 

जहां तक 'हिन्दी विरोध' की बात है, यह तमिलनाडु की राजनीति का नया मुद्दा नहीं है. राज्य में भाषा और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति लंबे समय से मौजूद रही है. DMK खुद इसी विचारधारा की प्रमुख वाहक रही है. लेकिन इस बार सिर्फ हिन्दी विरोध का मुद्दा नहीं चल पाया.  

यह भी पढ़ें: Tamil Nadu, Puducherry Chunav Result 2026 Live: तमिलनाडु में चमका थलपति विजय का सितारा, राहुल-स्टालिन को झटका

हाई वोटिंग परसेंटेज ने साबित किया कि युवा और शहरी मतदाता पुरानी द्रविड़ियन राजनीति से ऊब चुके हैं. वे गवर्नेंस, रोजगार, शिक्षा और डीएमके शासन से मुक्ति चाहते थे. 

डीएमके की नैया डुबोने में पार्टी के हिन्दू विरोध स्टैंड का बड़ा रोल रहा. 

जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को कहा डेंगू-मलेरिया

सीएम एमके स्टालिन के पुत्र और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में एक बयान देकर राज्य की राजनीति में आग लगा दी. 

डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने दो सितंबर 2023 को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई सामाजिक बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराया. 

उदयनिधि स्टालिन ने कहा था, "सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटने वाला विचार है, इसे खत्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है."

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उन्होंने आगे यह भी कहा था कि, "जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है. इसे समाज से पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए."

'सनातन का विरोध करते रहेंगे'

उदयनिधि स्टालिन के इस बयान पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई और उनपर मुकदमे भी दर्ज हुए लेकिन उदयनिधि अपने स्टैंड पर कायम रहे. 

उदयनिधि ने नवंबर 2023 में फिर कहा, "मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा है. मैं अपने बयान के संबंध में कानूनी परिणाम भुगतने के लिए तैयार हूं. मैंने जो कहा वह सही था और मैं इसका कानूनी तौर पर सामना करूंगा. मैं अपना बयान नहीं बदलूंगा."

उदयनिधि ने आगे कहा, 'हम कई वर्षों से सनातन के बारे में बोल रहे हैं जबकि नीट छह साल पुराना मुद्दा है. सनातन कई सौ साल पुराना मुद्दा है, हम इसका हमेशा विरोध करेंगे.

चुनाव के नतीजे बताते हैं कि सनातन धर्म को लेकर स्टालिन की ये टिप्पणी तमिलनाडु के मतदाताओं में सही मैसेज लेकर नहीं गई. कई हिन्दू मतदाताओं ने DMK की सनातन धर्म पर टिप्पणियों, मंदिर नियंत्रण और सांस्कृतिक नीतियों से नाराजगी जताई. हिन्दू-विरोध की उनकी कथित छवि ने DMK को नुकसान पहुंचाया. 

डीएमके पर अक्सर यह भी आरोप लगता है कि वह हिंदू धार्मिक और चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग के माध्यम से मंदिरों के प्रबंधन और उत्सवोंमें बाधाएं डालकर हिंदुओं के धार्मिक मामले में दखल दे रहे हैं. 

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विजय की TVK ने तमिलनाडु के मतदाताओं के मन में पैदा हुए इस खालीपन को भरा. विजय ने तमिल गौरव पर जोर तो दिया लेकिन अति-विरोधी नरेटिव से दूरी बनाए रखी. उनकी पार्टी ने भ्रष्टाचार, युवा बेरोजगारी और बदलाव का नारा दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि शहरी क्षेत्रों, युवा और मध्य वर्ग के वोट TVK की तरफ बह गए. 

DMK का भारी पतन और TVK का डेब्यू में 100 प्लस सीटों का आंकड़ा तमिलनाडु की राजनीति में पोस्ट-ड्राविडियन युग की शुरुआत माना जा रहा है.  DMK-AIADMK की फाइट अब त्रिकोणीय हो गई है. 

विजय अगर सपोर्ट के साथ सरकार बनाने में सफल होते हैं तो यह तमिल सिनेमा से सीधे सत्ता तक का अनोखा सफर होगा. 

2021 में 10 साल बाद हुई थी DMK की वापसी

2021 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में DMK ने 10 साल बाद धमाकेदार वापसी की थी. तब डीएमके ने 133 सीटें जीतीं थी. जबकि डीएमके गठबंधन को कुल 189 सीटें मिली थीं. DMK ने 10 साल बाद सत्ता में वापसी की थी और स्टालिन सीएम बने थे. राज्य में यह 25 साल बाद DMK की पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी. 

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