बंगाल में RSS का 'साइलेंट स्ट्राइक', चाय-चनाचूर और कानाफूसी... ऐसे पलटी ममता की सत्ता

संघ ने ऑटो ड्राइवरों, चाय की दुकानों और ब्यूटी पार्लर की 'दीदियों' के जरिए एक ऐसा अदृश्य 'विस्पर कैंपेन' चलाया जिसने घर-घर तक पैठ बना ली. यह कहानी उसी माइक्रो-रणनीति की है, जिसने जन-आक्रोश की दबी हुई लहर को एक प्रचंड चुनावी सुनामी में बदल दिया.

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बंगाल में RSS के 'पोरिबोर्तन' मॉडल की पूरी इनसाइड स्टोरी (Photo-ITG) बंगाल में RSS के 'पोरिबोर्तन' मॉडल की पूरी इनसाइड स्टोरी (Photo-ITG)

युद्धजीत शंकर दास

  • नई दिल्ली,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST

पश्चिम बंगाल में भाजपा का 'महा-परिवर्तन' किसी शोर-शराबे वाले चुनावी विज्ञापनों का नतीजा नहीं, बल्कि एक साल के निरंतर और मौन जमीनी संघर्ष की परिणाम था. कभी ऑटो ड्राइवर की बातों में छिपे 'कट-मनी' के विरोध में, तो कभी गांव के छोटे से पार्लर में महिला सुरक्षा पर हुई अनौपचारिक चर्चाओं में यह अभियान हर घर की चाय और चनाचूर तक जा पहुंचा था. यह एक ऐसा अदृश्य चुनाव प्रचार था, जिसका शोर सड़कों पर नहीं बल्कि लोगों के संवाद में था.

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आमतौर पर जब राजनीति में कोई बड़ी लहर आने वाली होती है, तो उसके संकेत पहले से ही दिखने लगते हैं. सबको पता चल जाता है कि सुनामी आने वाली है, लेकिन बंगाल चुनाव में बाहर से ऐसा कोई संकेत नहीं दिख रहा था. वहां जनता के अंदर ही अंदर एक 'खामोश लहर' चल रही थी. लोग चिंता, डर, अत्याचार और निराशा से भरे हुए थे. भाजपा को इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए बस एक छोटे स्तर पर काम करने की ज़रूरत थी. उनके वैचारिक संगठन, RSS और उससे जुड़े लोगों ने खामोश रणनीति अपनाई. उन्होंने बड़े-बड़े शोर-शराबे के बजाय, ज़मीनी स्तर पर लोगों के बीच जाकर धीरे-धीरे अपनी बात पहुंचाई और देखते ही देखते, यह बात हवा की तरह हर जगह फैल गई.

4 मई को, 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणामों ने इस अभियान के प्रभाव को उजागर कर दिया, जहां भाजपा ने 294 सीटों में से 207 सीटें जीतकर प्रचंड जीत दर्ज की. वहीं, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस 2021 की 215 सीटों से घटकर मात्र 80 सीटों पर सिमट गई.  BJP को ज़बरदस्त फायदा हुआ, 2021 में 77 सीटों से बढ़कर 2026 में 207 सीटों तक पहुंची और पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाई.

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कैसे ऑटो ड्राइवरों ने किया प्रचार? 

जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे भाजपा नेताओं की बड़ी रैलियों ने ऊर्जा भरने का काम किया, वहीं दूसरी ओर भाजपा और संघ से जुड़े संगठनों ने माइक्रो-मीटिंग्सकीं, संदेश पहुंचाने के लिए स्थानीय व्यवसायों का उपयोग किया और "विस्पर कैंपेन" चलाया. इसी बीच, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में नई जान फूंकी और टीएमसी सरकार की विफलताओं को उजागर करते हुए, कल्याणकारी योजनाओं और विकास के वादों को जन-जन तक पहुंचाने में मदद की.

पश्चिम बंगाल में आरएसएस  के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने, नाम न छापने की शर्त पर इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि संघ के सहयोगियों और भाजपा ने चाय की दुकानों, ब्यूटी पार्लर, किराना स्टोर और ऑटो चालकों के माध्यम से मतदाताओं तक अपना संदेश पहुंचाया. उन्होंने कहा, "एक साल से अधिक समय से, कोलकाता के 50,000 ऑटो-रिक्शा चालक भाजपा के लिए चुपचाप प्रचार कर रहे थे. वे ग्राहकों के साथ बातचीत के दौरान राजनीतिक महत्व की एक या दो बातें कह दिया करते थे."

ब्यूटी पार्लर में प्रचार

आमतौर पर लोग मशहूर हस्तियों को 'इन्फ्लुएंसर' मानते हैं, लेकिन आरएसएस और भाजपा ने पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ज़मीनी जुड़ाव रखने वाले स्थानीय लोगों का इस्तेमाल किया. आरएसएस सदस्य ने बताया कि इन "स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों" की पहचान बहुत पहले ही कर ली गई थी और उनसे संपर्क साधा गया था. उन्होंने बताया, "हमने शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में किराना स्टोर, ब्यूटी पार्लर और चाय की दुकानें चलाने वाले लोगों तक पहुंच बनाई, जब मैं ब्यूटी पार्लर की बात करता हूं, तो मेरा मतलब चकाचौंध वाले बड़े पार्लर से नहीं, बल्कि कॉलोनियों और बहुत छोटे कस्बों में स्थित पार्लरों से है."

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हालांकि संघ के संगठन किसी भी राजनीतिक दल के लिए औपचारिक प्रचार नहीं करते हैं, लेकिन वे चुनाव से पहले व्यापक स्तर पर मतदाता संपर्क कार्यक्रम आयोजित करते हैं. हिंदू पहचान और हिंदुत्व के इर्द-गिर्द की राजनीति ने उस राज्य में अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, जहां 34 वर्षों तक वामपंथी दलों और फिर अगले 15 वर्षों तक टीएमसी (TMC) का शासन रहा. बंगाल में बांग्लादेश से अवैध अप्रवास और जनसांख्यिकीय परिवर्तन चुनाव के बड़े मुद्दे थे.

हुगली जिले के चंदननगर में आरएसएस से जुड़े संगठन 'हिंदू जागरण मंच' के संयोजक सारनाथ घोष ने कहा कि जागरूकता फैलाने में सोशल मीडिया एक "गेमचेंजर" साबित हुआ है. पेशे से वकील घोष ने कहा, "बंगाल के लोग देख रहे थे कि उनके आसपास क्या हो रहा है."

घोष ने आगे बताया, "हमने मतदाताओं के सामने हिंदुओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को प्रमुखता से रखा. हमने उनसे पूछा कि सत्ता में बैठा कौन सा व्यक्ति आपको सुरक्षित रहने और बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन करने में मदद करेगा. " उन्होंने यह भी जोड़ा, "हम किसी से भाजपा को वोट देने के लिए नहीं कहते. हमने हिंदुत्व के प्रति जागरूकता पैदा की है और उसी विचारधारा वाले राजनेताओं को इसका लाभ मिल रहा है." बंगाल चुनाव के लिए संघ की लामबंदी का मूल मंत्र 'सूक्ष्म स्तर पर काम और खामोशी' रहा है.

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घोष ने समझाया, "हमने लगभग 10 लोगों के साथ मिलकर 'खामोश संदेश ' देने पर जोर दिया, जो बाद में जाकर 100 और लोगों के बीच इस बात को फैलाते हैं." पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रवक्ता बिमल शंकर नंदा ने इंडिया टुडे डिजिटल को बताया कि पार्टी ने चुनाव से पहले लगभग 2.5 लाख बड़ी और छोटी बैठकें कीं.

नंदा ने कहा कि अधिकांश छोटी बैठकें और संपर्क कार्यक्रम भाजपा की मंडल समितियों द्वारा आयोजित किए गए थे, उन्होंने आगे कहा, "हमारा पूरा ध्यान बूथ स्तर पर केंद्रित था."

कार्यकर्ताओं की छोटी टीमें शाम को लोगों के घर चाय और 'चनाचूर' पर मिलने जाती थीं. ज्यादातर समय, वहां कोई राजनीतिक चर्चा या वोट के लिए दबाव नहीं होता था. यह केवल जान-पहचान बढ़ाने और सामाजिक चर्चाओं के लिए किया गया एक संपर्क कार्यक्रम था.

जमीनी कार्यकर्ताओं को पता था कि जनता के बीच एक 'खामोश लहर' चल रही है, और उसे बस एक हल्का सा धक्का देने की जरूरत थी. आरजी कर (RG Kar) बलात्कार-हत्या कांड, संदेशखाली का उत्पीड़न, सिंडिकेट और 'कट-मनी' की वसूली, और तृणमूल समर्थित गुंडों के हाथों होने वाले उत्पीड़न ने बंगाल में "पोरिबोर्तन" के लिए एक उपजाऊ जमीन तैयार कर दी थी. 

पश्चिम बंगाल में इस बार चुनावी माहौल पूरी तरह बदला हुआ था. आरएसएस नेता जिष्णु बसु के अनुसार, बंगाल के लोगों को अपना अस्तित्व और पहचान खतरे में महसूस हो रही थी, जिसके कारण रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई. यह बदलाव केवल किसी दल के प्रचार का नतीजा नहीं था, बल्कि टीएमसी सरकार के कथित कुशासन, भ्रष्टाचार और अपराधियों के आतंक के खिलाफ जनता का स्वाभाविक गुस्सा था. लोगों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी थी कि सत्ता के संरक्षण में अपराधी आम जनता का शोषण कर रहे हैं. अंततः, इस दमघोंटू माहौल से तंग आकर पूरे समाज ने एकजुट होकर बदलाव के लिए मतदान किया, जहां संघ और भाजपा ने केवल उस दबे हुए गुस्से को एक दिशा देने का काम किया. 

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एक शांत अभियान और भाजपा का मजबूत ढांचा

दक्षिण कोलकाता के टॉलीगंज में चाय की दुकान चलाने वाले एक आरएसएस (RSS) कार्यकर्ता ने बताया कि लोग टीएमसी के खराब शासन से पहले से ही वाकिफ थे. उन्होंने कहा, "जब 2025 में उत्तर बंगाल और कोलकाता भीषण बाढ़ से जूझ रहे थे, तब ममता बनर्जी मशहूर हस्तियों के साथ उत्सव मना रही थीं. " चुनाव से पहले मतदाताओं को ऐसी ही घटनाओं की याद दिलाई गई.

जहां एक ओर संघ से जुड़े संगठन धीरे-धीरे बढ़ रहे थे, वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा के सदस्यों की संख्या में भी भारी उछाल आया. 2021 की तुलना में इस बार भाजपा का 'घर-घर अभियान' इसलिए सफल रहा क्योंकि पार्टी का संगठन अब बहुत अधिक मजबूत और व्यवस्थित हो चुका था. भाजपा प्रवक्ता बिमल शंकर नंदा के अनुसार, 2019 से ही लोग भाजपा से जुड़ रहे थे, लेकिन तब संगठन बिखरा हुआ था. 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले केंद्रीय नेतृत्व ने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास भरा और उन्हें संगठित किया.

इस संगठन को खड़ा करने में सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव और बिप्लब देब जैसे नेताओं ने अहम भूमिका निभाई, पार्टी ने लगभग 44,000 बूथों की पहचान की और उन्हें उनकी मजबूती के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा. हर 30 से 60 मतदाताओं पर एक 'पन्ना प्रमुख' नियुक्त किया गया, जो मतदान के दिन तक लगातार उनके संपर्क में रहा.

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प्रोफेसर और भाजपा प्रवक्ता बिमल नंदा ने बताया कि 2021 के चुनाव में टीएमसी ने मतदाता सूची की गड़बड़ियों का फायदा उठाकर फर्जी वोट डलवाए थे, लेकिन इस बार 'SIR' अभियान के जरिए फर्जी नामों को हटाया गया और केंद्रीय बलों की तैनाती ने लोगों को बिना डरे वोट देने में मदद की.  नंदा ने कहा कि बंगाल के लोग अपराध, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी को लेकर बेहद गुस्से में थे. आरजी कर (RG Kar) कांड और साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज में हुए बलात्कार के मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए और टीएमसी की छवि को नुकसान पहुंचाया.

भाजपा और संघ ने करीब एक साल तक लोगों की इसी नाराजगी को चुपचाप पहचाना और उसका सही इस्तेमाल किया. इसी का नतीजा रहा कि 4 मई को ममता बनर्जी की सरकार को हार का सामना करना पड़ा और भाजपा ने भारी जीत दर्ज की. बड़ी रैलियों के साथ-साथ इस शांत प्रचार और छोटे स्तर पर की गई रणनीति ने बंगाल में भाजपा की लहर पैदा कर दी.
 

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