केरल का सबसे उत्तरी निर्वाचन क्षेत्र- कासरगोड के मंजेश्वरम में ये मेरी पहली यात्रा थी. 'सांभर सारू?', रेस्तरां के कर्मचारियों ने पूछा… मैं रुका और फिर पूछा. 'करी करी', उसने कहा. तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं मंजेश्वरम में हूं, जो कर्नाटक से सटी सीमा पर स्थित है.
कन्नड़ में सारू का मतलब करी होता है. मंजेश्वर की जिंदगी राज्य के बाकी हिस्सों से अलग है. मुझे लगा कि मैं केरल से ज़्यादा कर्नाटक में हूं. यही बात इस निर्वाचन क्षेत्र को खास बनाती है. जैसा कि किसी ने सही कहा है, ये एक ‘मिनी इंडिया’ है, जहां कन्नड़, तुलु और मलयालम बोलने वाली आबादी काफी ज्यादा है.
'आप केरल से आए हैं?', किसी ने मेरे वीडियो पत्रकार टिंकू से पूछा, जो मंजेश्वर रेलवे स्टेशन की तस्वीरें ले रहे थे. हम दोनों ने हैरानी से एक-दूसरे को देखा. 'क्या हम केरल में नहीं खड़े हैं?', मैंने पूछा. 'हां हां', उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि एजुकेशन से लेकर हेल्थ और व्यापार तक, यहां के निवासी पड़ोसी राज्य कर्नाटक, खास तौर पर मंगलौर पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं.
इस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं के मन को समझना एक बेहद मुश्किल काम है. ये सीट मतगणना के दिन पूरे राज्य को असमंजस में डाल देती है. ये एक ऐसी अप्रत्याशित सीट है जहां भविष्यवाणियां करना नामुमकिन है और गलत भी हो सकता है.
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श्रीमठ अनंतेश्वर मंदिर के पास एनडीए उम्मीदवार के. सुरेंद्रन का इंतजार करते हुए एक वरिष्ठ नागरिक ने कहा, 'यहां के मतदाताओं की राजनीतिक विचारधारा स्पष्ट नहीं है. उनमें से 40% बदलते हालात के आधार पर पार्टियों का चुनाव करते हैं, जबकि 60% पार्टी की राजनीति का समर्थन करते हैं.'
यहां कौन जीतेगा? मैंने एक नारियल की दुकान के पास मिली एक महिला से पूछा. उसने मुस्कुराते हुए कहा, 'बीजेपी.' मंजेश्वरम अनोखा है और ये बात उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार में भी झलक रही थी. वहां पोस्टरों या फ्लेक्स की भरमार नहीं थी, बल्कि आमने-सामने की मुलाकातें थीं.
मेरा अगला पड़ाव एलडीएफ उम्मीदवार के.आर. जयानंद के चुनाव प्रचार स्थल पर था. वहां भी सिर्फ व्यक्तिगत बातचीत ही हुई. केरल में चुनाव प्रचार स्थलों पर आमतौर पर ऐसा नहीं होता. इस चुनाव में एलडीएफ का योगदान बहुत कम है. हालांकि, उनकी भूमिका इस क्षेत्र के विधायक का फैसला करने में अहम हो सकती है.
एलडीएफ उम्मीदवार के.आर. जयानंद अपनी सरकार के विकास कार्यों पर भरोसा कर रहे हैं. उन्होंने कन्नड़ लहजे में मलयालम में आत्मविश्वास जाहिर किया और कहा, 'ये निर्वाचन क्षेत्र बाकी निर्वाचन क्षेत्रों से बहुत अलग है. मतदाता मौजूदा हालात के आधार पर फैसला करते हैं. 2006 में सीपीआईएम ने ये सीट जीती थी. 2026 में भी ऐसा ही होगा.
मंजेश्वरम के उतार-चढ़ाव को देख चुके एक बुजुर्ग ने कहा कि IUML एक बार फिर ये सीट जीतेगी. उन्होंने धीमी आवाज में मुझसे कहा,'अगर बीजेपी के जीतने की संभावना बनती है तो कुछ वामपंथी वोट भी IUML के पक्ष में जा सकते हैं. कुछ भी हो सकता है.'
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UDF के मौजूदा विधायक एकेएम अशरफ जब विधायक कार्यालय में मिले तो वो शांत और संयमित दिखे. उन्होंने कहा कि पिछले पांच सालों से वो लोगों के संपर्क में हैं और आक्रामक चुनाव प्रचार उनकी तरजीह नहीं है. हालांकि, विधायक ने पिछले दो कार्यकालों में अपनी पार्टी की जीत के बीच आए बदलाव को नजरअंदाज नहीं किया, जिसमें उनकी पार्टी को पहले बड़ी जीत मिली थी और अब बहुत कम अंतर से जीत मिल रही है. उन्होंने अभी-अभी अपना नामांकन दाखिल किया था.
उन्होंने कहा, 'मुझे बहुत उम्मीदें हैं. 2021 में मैं पहली बार चुनाव लड़ रहा था, हालांकि मैं स्थानीय निकाय चुनावों में सक्रिय रहा हूं. इन पांच सालों में मैं मंजेश्वरम के लोगों के सुख-दुख में उनके साथ रहा हूं. पिछले पांच सालों में मैंने कुछ ऐसे हस्तक्षेप किए हैं जिन पर पूरे राज्य ने ध्यान दिया है.'
महेश्वरम एकमात्र ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है जहां IUML और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है. अशरफ ने कहा कि इसे हिंदू-मुस्लिम मुकाबला नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा, 'ये निर्वाचन क्षेत्र धर्मनिरपेक्ष लोगों की भूमि है. आप इसके कई उदाहरण ले सकते हैं.'
SDPI ने इस बार मौजूदा विधायक के नाम से मिलते-जुलते नाम वाले उम्मीदवार को मैदान में उतारा है- केएम अशरफ. IUML को SDPI के इस कदम पर चिंता है.
मैंने महेश्वर का दौरा करने के बाद विजेता का अनुमान लगाने की चुनौती ली थी, लेकिन कई अन्य लोगों की तरह मैं भी इसमें असफल रहा. ये एक ऐसा माहौल है जहां चुनावी नतीजे व्यापक जनादेश से नहीं, बल्कि बारीक स्तर के बदलावों से तय होते हैं.
शिबिमोल