भारत के चुनावी इतिहास के पन्नों में, सत्ता-विरोधी लहर हमेशा एक अभिशाप रही है, एक ऐसा बोझ, जो पुन: चुनाव की इच्छा रखने वाली किसी भी सरकार के गले की फांस बन जाता है. लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों के इस दौर में, जिसका आने वाले कई वर्षों तक अध्ययन किया जाएगा, भाजपा ने भारतीय राजनीति में वह कर दिखाया है, जिसे कभी लगभग असंभव माना जाता था, उसने सत्ता में होने को एक 'संपत्ति' में बदल दिया, जबकि विपक्ष उसी लहर की भेंट चढ़ गया, जिसे उसने कभी दूसरों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था.
नतीजों की यह कहानी इतनी अजीब और नाटकीय है कि यह किसी फिल्मी ड्रामे जैसी लगती है. भाजपा ने असम और पुडुचेरी में अपनी सत्ता बरकरार रखी. तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल खो दिया, वह उस सदन में लगभग 100 सीटों पर सिमट गई, जहां कभी उसका दबदबा था.
द्रमुक (DMK), जो कभी तमिलनाडु की राजनीति का निर्विवाद स्वामी था, राज्य में तीसरे स्थान पर खिसककर अपमानित हुआ है. केरल में एलडीएफ (LDF) की केवल हार नहीं हुई है, बल्कि उसका पूरी तरह सफाया हो गया है. विपक्ष केवल हारा नहीं है, वह पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है.
सत्ता में रहने का विरोधाभास और भाजपा ने इसे कैसे सुलझाया
भारतीय राजनीति की पारंपरिक सोच बहुत स्पष्ट रही है, सरकारें चुनाव हारती हैं. मतदाता पुराने चेहरों से ऊब जाते हैं, शिकायतें और असंतोष बढ़ता जाता है और विपक्ष को बस एक विश्वसनीय विकल्प के साथ सामने आना होता है. 2024 के लोकसभा परिणाम, जहां भाजपा ने खुद राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता-विरोधी लहर के झटकों का अनुभव किया, इस नियम की पुष्टि करते दिखे. ऐसे में सवाल उठता है कि पार्टी ने राज्य स्तर पर 'गुरुत्वाकर्षण के इस नियम' को चुनौती देने में सफलता कैसे पाई?
असम में भाजपा का फॉर्मूला शायद इसका सबसे सटीक उदाहरण है. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक 'दबंग और सक्रिय' कार्यशैली के साथ शासन किया है, उन्होंने खुद को कानून-व्यवस्था, बाढ़ प्रबंधन या भूमि सुधार जैसे मामलों में निर्णायक कार्रवाई का पर्याय बना लिया है. महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने विकास और योजनाओं के वितरण के नैरेटिव को कभी थमने नहीं दिया. यह सुनिश्चित किया गया कि जनकल्याणकारी योजनाएं न केवल लागू हों, बल्कि उनका पुरजोर प्रचार भी हो.
हर बना हुआ घर, हर बिछी हुई सड़क और हर लाभार्थी का पंजीकरण एक राजनीतिक संवाद में बदल दिया गया. मतदाताओं को यह महसूस नहीं हुआ कि वे किसी पुरानी सरकार को फिर से चुन रहे हैं, बल्कि उन्हें लगा कि वे एक निरंतर चल रहे 'मिशन' या प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं.
भाजपा ने वह बात समझ ली जो उसके प्रतिद्वंद्वी नहीं समझ पाए, सत्ता समर्थक होने का मतलब पसंद किया जाना नहीं है. इसका मतलब है कि आपकी ज़रूरत है.
पुडुचेरी में स्थितियां अलग थीं, लेकिन सिद्धांत वही रहा. केंद्र शासित प्रदेश में एनडीए गठबंधन ने केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रभावी ढंग से लाभ उठाया और अपने अभियान को केवल विचारधारा के बजाय ठोस लाभों पर केंद्रित रखा. इसका परिणाम दक्षिण में भाजपा के बढ़ते कदमों के रूप में सामने आया, जो आकार में भले ही छोटा हो, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है.
तृणमूल कांग्रेस (TMC) का पतन
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के धराशायी होने के स्तर को शब्दों में बयां करना कठिन है. ममता बनर्जी के कद्दावर नेतृत्व में लगातार प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली पार्टी आज 100 सीटें भी नहीं जीत पाई है. जो अब सदन में महज एक छोटा सा हिस्सा है. टीएमसी को निगल जाने वाली सत्ता-विरोधी लहर कोई दबी हुई आहट नहीं, बल्कि एक भीषण 'गर्जना' थी.
इसके कारण जगजाहिर हैं, लेकिन उन पर फिर से गौर करना जरूरी है. 'कट-मनी' संस्कृति को लेकर व्यापक आक्रोश, कानून-व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति, बूथ स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप जो दशक भर के शासन में और गहरे हो गए थे, और आम बंगालियों के बीच यह भावना कि सरकार अब लापरवाह और अहंकारी हो गई है. ममता बनर्जी का व्यक्तिगत ब्रांड, जिसे कभी अजेय माना जाता था, सत्ता में दस से अधिक वर्षों के संचित बोझ को नहीं संभाल सका. टीएमसी ने इस तरह शासन किया जैसे उसकी अजेयता स्थायी हो, लेकिन मतदाताओं ने इस मुगालते को बड़ी बेरहमी से तोड़ दिया.
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तमिलनाडु का चौंकाने वाला जनादेश
अगर बंगाल के नतीजे एक बड़ी हार हैं, तो तमिलनाडु के नतीजे किसी शॉक से कम नहीं हैं. एम.के. स्टालिन के नेतृत्व में द्रमुक (DMK) ने पूरे आत्मविश्वास के साथ इन चुनावों में प्रवेश किया था, उनके पास सांसदों की बड़ी संख्या थी, एक मजबूत द्रविड़ वैचारिक पहचान थी और एक ऐसा केंद्रीकृत पार्टी तंत्र था, जिसने 2021 के विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया था. लेकिन आज वह तीसरे स्थान पर खिसक गई है. वह भी तमिलनाडु जैसे राज्य में.
द्रमुक का यह पतन कई विफलताओं का मिला-जुला परिणाम है. सरकार अपनी जनहितकारी योजनाओं को तमिलनाडु के मतदाताओं के लिए एक 'महसूस की जाने वाली हकीकत' में बदलने के लिए संघर्ष करती दिखी. प्रशासनिक विवादों की एक लंबी श्रृंखला, स्थानीय स्तर पर बढ़ता असंतोष और यह धारणा कि स्टालिन सरकार तमिलनाडु के सुशासन के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित कर रही थी, ने पार्टी को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया.
सत्ता-विरोधी लहर के साथ-साथ एक ऊर्जावान विपक्ष और द्रमुक के वोट बैंक में हुई प्रभावी सेंधमारी ने इस हार को और गहरा कर दिया. तीसरे स्थान पर रहना केवल एक हार नहीं है बल्कि यह एक ऐसा अपमान है, जो पार्टी को अपनी जमीनी रणनीति पर सिरे से विचार करने के लिए मजबूर कर देगा.
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केरल में एलडीएफ केवल हारी नहीं है बल्कि पूरी तरह ध्वस्त हो गई है
केरल में एलडीएफ (LDF) की हार अपने आप में एक बड़ी विडंबना समेटे हुए है. पिनराई विजयन की गिनती भारत के सबसे सक्षम मुख्यमंत्रियों में की जाती थी, एक ऐसे तकनीक-प्रेमी और काम करके दिखाने वाले नेता, जिनके बारे में कई लोगों का मानना था कि उन्होंने वास्तव में दोबारा सत्ता में आने का अधिकार कमाया है. और कुछ समय के लिए यह दिखा भी जब उन्होंने 2021 में दोबारा चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया और केरल के इतिहास में सत्ता में वापसी करने वाली दूसरी लेफ्ट सरकार बन गए. लेकिन यह दूसरा कार्यकाल उनके लिए भारी पड़ गया.
शासन में आई शिथिलता, कई हाई-प्रोफाइल विवादों जिनमें सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचने वाले मामले भी शामिल थे और एक अनुशासित व एकजुट होकर चुनाव लड़ने वाले विपक्षी गठबंधन (UDF) ने लेफ्ट की जड़ें हिला दीं. एलडीएफ ने केवल अपनी जमीन ही नहीं खोई, बल्कि वह पूरी तरह साफ हो गई. हार की यह व्यापकता संकेत देती है कि केरल की राजनीति का प्रसिद्ध चुनावी पेंडुलम इस बार बहुत तेजी से घूमा है, और वामपंथ को खुद को फिर से खड़ा करने के लिए महीनों नहीं, बल्कि सालों लगेंगे.
विपक्ष को क्या समझने की जरूरत है?
इन नतीजों के पीछे की गहरी कहानी केवल व्यक्तिगत सरकारों की हार के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि विपक्ष 'हारने' और 'बुरी तरह हारने' के बीच का फर्क समझने में विफल रहा है. सत्ता-विरोधी लहर जब आती है, तो माना जाता है कि वह विपक्ष के लिए मददगार साबित होगी. लेकिन बंगाल, तमिलनाडु और केरल में सत्ताधारी दलों को केवल विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा, बल्कि वे अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंस गए. भ्रष्टाचार, आत्ममुग्धता और जमीनी स्तर पर मतदाताओं से जुड़ाव खत्म होने जैसे कारणों ने एक सामान्य हार को 'ऐतिहासिक पराजय' में बदल दिया.
इसके विपरीत, भाजपा ने सत्ता के पक्ष में लहर बनाने का एक तरह का 'विज्ञान' विकसित कर लिया है. यह तीन स्तंभों पर टिका है. पहला, जनहितकारी योजनाओं का निरंतर लाभ पहुंचाना और उसका श्रेय स्पष्ट रूप से लेन. दूसरा, मजबूत और व्यक्तित्व-आधारित नेतृत्व, जो मुख्यमंत्री और मतदाता के बीच एक व्यक्तिगत रिश्ता बनाता है और तीसरा, एक ऐसा संगठनात्मक ढांचा जो चुनाव की तैयारी को आखिरी समय की दौड़ के बजाय पूरे चार साल चलने वाला निरंतर अभ्यास मानता है. विपक्ष केवल शासन करता है, जबकि भाजपा हमेशा चुनावी मोड में रहती है लगातार, बिना रुके.
भारतीय चुनावी राजनीति का नया मानक
ये नतीजे एक नया बेंचमार्क स्थापित करते हैं. अब उन राज्यों में, जहां भाजपा का नियंत्रण है, सत्ता में होना उसके लिए अपने आप में घातक नहीं रह गया है. वहीं, विपक्षी सरकारों के लिए अब सत्ता हासिल करने से कहीं ज्यादा कठिन उसे बचाए रखना साबित हो रहा है. टीएमसी, द्रमुक और एलडीएफ परिस्थितियों के दुर्भाग्यपूर्ण शिकार नहीं थे. सच्चाई यह है कि इन सरकारों का कामकाज चुनाव जीतने के लिए तो पर्याप्त था, लेकिन जनता के भरोसे को बनाए रखने में वे इतनी नाकाम रहीं कि वे पूरी तरह तबाह हो गईं.
भारतीय मतदाताओं का यही कठोर और निष्पक्ष फैसला है.
भाजपा ने चुनावी जीत का 'कोड' क्रैक कर लिया है. अब कांग्रेस, इंडिया (INDIA) गठबंधन और उन तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों के लिए सवाल यह है जो यह मानते हैं कि केवल मोदी-विरोधी भावना ही उन्हें विधानसभा चुनाव जिता सकती है कि क्या वे अभी तक सही सवाल पूछ भी रहे हैं या नहीं.
अमिताभ तिवारी