लगभग 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हमारी गाड़ी असम के डिब्रूगढ़ से गुवाहाटी की ओर बढ़ रही थी. बाहर का मौसम बेहद सुहावना हो चुका था. कुछ देर पहले हुई बारिश के बाद हवा में गीली मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू घुली हुई थी. खुले शीशे से ठंडी हवा के झोंके चेहरे को छू रहे थे. मैं गाड़ी की पिछली सीट पर बैठा था, जबकि मेरे सहयोगी अंकित सिंह आगे वाली सीट पर ईयरफोन लगाए गाने सुन रहे थे. उधर, ड्राइवर ने गाड़ी में मोहम्मद रफी का पुराना गीत चला रखा था.
मेरी नजरें बाहर फैले असम के हरे-भरे खेतों, पेड़ों और हरियाली पर टिकी थीं, लेकिन मन में यही चल रहा था कि अगली स्टोरी किस विषय पर की जाए. तभी सड़क के किनारे बसे एक छोटे से गांव में मेरी नजर पड़ी. छोटे-छोटे घरों के बीच एक खुले मैदान में करीब 20-25 बच्चे, जिनकी उम्र 14 से 16 साल के बीच रही होगी जो नृत्य कर रहे थे.
उन्हें देखते ही मैंने तुरंत ड्राइवर दीपांकर से कहा, 'गाड़ी रोको… गाड़ी रोको…', लेकिन दीपांकर उस वक्त मोहम्मद रफी के गीत और मौसम की मस्ती में ऐसे डूबे हुए थे कि मेरी आवाज उन तक ठीक से पहुंच ही नहीं पाई. बाहर से आती हवा, पेड़ों की सरसराहट और गाने की धुन के बीच गाड़ी आगे बढ़ती रही. तभी मैंने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा,'गाड़ी यू-टर्न लीजिए.' उन्होंने हैरानी से पूछा, 'क्या हुआ? कुछ सामान गिर गया क्या?' मैंने कहा,'नहीं, रास्ते में कुछ बच्चे डांस कर रहे थे. उनसे बात करते हैं, उनका प्रदर्शन रिकॉर्ड भी कर लेते हैं.'
दीपांकर मुस्कुराए और बोले, 'छोटे बच्चे होंगे… बिहू आने वाला है, उसकी रिहर्सल कर रहे होंगे.' बस, इतना सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ गई और दिमाग में ये ख्याल भी कि शायद यहां एक बेहद सुंदर और जीवंत स्टोरी मिल सकती है.
दीपांकर ने आगे जाकर यू-टर्न लिया और लगभग आधा किलोमीटर आगे बढ़ने के बाद हम उसी जगह लौट आए, जहां मैंने बच्चों को नृत्य करते देखा था. जैसे ही हमारी गाड़ी हाईवे किनारे रुकी, सभी बच्चे अचानक ठिठक गए. उनकी निगाहें एकटक मुझ पर और मेरे सहयोगी अंकित सिंह पर टिक गईं.
हाई-वे किनारे बिहू की रिहर्सल
मेरे हाथ में आज तक का माइक और अंकित के हाथ में कैमरा देखकर लगभग सभी बच्चे घबराकर या शायद शर्माकर पास ही बनी एक छोटी-सी झोपड़ी की ओर भाग गए. ऐसा लगा मानो कैमरा देखते ही वो या तो संकोच में आ गए हों, या फिर थोड़ा डर गए हों. मैं गाड़ी से उतरा और कुछ बच्चों को आवाज़ लगाई, 'अरे… आप सब बाहर आइए…' कुछ बच्चे धीरे-धीरे फिर बाहर आ गए.
तब मैंने पूछा, 'आप सब में से हिंदी कौन बोल लेता है?' बच्चों के उस समूह में से करीब 16 साल की पिंकी ने हाथ उठाया और कहा, 'भैया, मुझे हिंदी अच्छे से आती है.' फिर मैंने पिंकी से कहा, 'इन सबको बताइए कि हम दिल्ली से आज तक के लिए असम चुनाव की कवरेज करने आए हैं और आप लोगों से कुछ बात करना चाहते हैं.'
एक तरफ मैं पिंकी से बात कर रहा था तभी दूसरी तरफ जो बाकी बच्चे पहले झोपड़ी में चले गए थे, वे भी धीरे-धीरे बाहर आने लगे. कुछ ही देर में वो सब एक-दूसरे के साथ छोटे-छोटे समूह बनाकर खड़े हो गए. बातचीत के दौरान बच्चे शर्माते हुए, मुस्कुराते हुए मेरी बात समझने की कोशिश कर रहे थे.
मेरी बात सुनने के बाद पिंकी ने बाकी बच्चों को बताया कि हम वहां क्यों आए हैं और क्या रिकॉर्ड करना चाहते हैं. तभी हाथ में ढोल/तबला लिए रघु भी बाहर आए और बोले, 'मुझे भी हिंदी आती है… लेकिन थोड़ा-थोड़ा…' उनके 'थोड़ा-थोड़ा' कहने के अंदाज में ऐसी मासूमियत थी कि ये सुनते ही आसपास खड़े सभी बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े.
रघु के साथ अनिरुद्ध भी बाहर आए, जिनके हाथ में बांसुरी थी. अब माहौल पूरी तरह सहज हो चुका था और सभी बच्चे हमसे बात करने के लिए तैयार हो गए. बातचीत शुरू करने से पहले मैंने बच्चों से अनुरोध किया कि वो जो बिहू नृत्य की रिहर्सल कर रहे थे, वह एक बार हमें करके दिखाएं. यह सुनते ही सभी बच्चे तुरंत एक लाइन में खड़े हो गए.
उधर, रघु और अनिरुद्ध जो तबला और बांसुरी बजाने वाले थे, एक कोने में जाकर खड़े हो गए. उनका प्रदर्शन शुरू होता, उससे पहले ही अंकित ने कैमरा उनकी ओर तान दिया और रिकॉर्डिंग शुरू हो गई. रघु ने तबला बजाना शुरू किया. अनिरुद्ध की मीठी बांसुरी की धुन हवा में घुलने लगी और फिर लाइन में खड़े बच्चे धीरे-धीरे एक साथ आगे बढ़े, उन्होंने एक घेरा बनाया और फिर बिहू नृत्य का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन किया कि वहां का पूरा दृश्य मानो जीवंत हो उठा. कुछ ही देर बाद मैं भी उस घेरे के बीच जाकर खड़ा हो गया और मेरे चारों ओर बच्चों ने नृत्य करते हुए पूरा माहौल उत्सव में बदल दिया. करीब 15 से 20 मिनट तक ये प्रदर्शन चलता रहा.
उसके बाद मैं बच्चों के साथ वहीं जमीन पर बैठ गया और उनसे बातचीत शुरू की. इस रिहर्सल के दौरान कुछ बच्चे हाथ में जापी लिए भी दिखाई दिए.
बता दें कि जापी असम की पारंपरिक टोपी होती है, जिसे आमतौर पर बांस और ताड़ के पत्तों से बनाया जाता है. इसका आकार गोल और छतरी जैसा होता है. बच्चों से बातचीत के दौरान मैंने भी एक जापी अपने सिर पर रख ली, ताकि मेरी रिपोर्टिंग में असम और बिहू की एक झलक और अधिक जीवंत दिखाई दे. करीब 20 से 25 बच्चों के उस समूह में से केवल तीन बच्चे हिंदी अच्छी तरह बोल पाते थे. बाकी बच्चों को हिंदी समझ तो आती थी, लेकिन बोलने में उन्हें थोड़ी दिक्कत हो रही थी.
इसलिए मैंने तय किया कि जो बच्चे हिंदी में सहज हैं, उनसे विस्तार से बात की जाए. सबसे पहले मैंने बात की पिंकी दास से. पिंकी ने बताया कि वो असम के सबसे बड़े त्योहार बिहू की तैयारी कर रही थीं और उसी के लिए नृत्य का अभ्यास कर रही थीं.
मामा का क्रेज
उन्होंने कहा कि बिहू उनके लिए सिर्फ त्योहार नहीं, बल्कि खुशी, परंपरा और उत्सव का बड़ा अवसर है. उस दिन बच्चे नए कपड़े पहनते हैं, घर-घर जाते हैं और उत्सव मनाते हैं. पिंकी ने ये भी बताया कि वो बचपन से ये सब करती आ रही हैं. उन्होंने आगे कहा कि उनकी मां भी यह नृत्य बहुत अच्छे से जानती हैं और उन्होंने ही पिंकी को ये नृत्य सिखाया है. चूंकि चुनावी माहौल था, इसलिए मैंने उनसे पूछ लिया कि उन्हें सबसे अच्छे नेता कौन लगते हैं. इस पर पिंकी ने बिना झिझक कहा, 'मुझे मामा बहुत पसंद हैं.' 'मामा' शब्द सुनते ही मैंने पूछा, 'क्या तुम हिमंत बिस्वा सरमा की बात कर रही हो?'
पिंकी ने तुरंत कहा, 'हां…' उन्होंने कहा कि उन्होंने असम के लिए बहुत अच्छे काम किए हैं.
पिंकी के मुताबिक, उन्हें एक साइकिल मिली, उनकी दादी को दस हजार रुपये मिले और उनका कच्चा घर अब पक्का बन चुका है. मैं पिंकी और बाकी बच्चों से बातचीत कर ही रहा था कि तभी पिंकी की मां वहां पहुंचीं. उनके हाथ में एक चटाई थी. मुझे देखते ही उन्होंने कहा,'बाबू, इस चटाई पर बैठ जाइए.' मैंने मुस्कुराते हुए कहा, 'नहीं अम्मा, जमीन पर बैठने का आनंद ही अलग है.' तभी मेरा माइक पिंकी के साथ बैठी नेहा की ओर गया.
नेहा ने भी बताया कि वे बिहू की तैयारियों में जुटी हैं, क्योंकि यह असम का बहुत बड़ा त्योहार है. उन्होंने कहा कि बिहू वाले दिन वे नए कपड़े पहनती हैं, अलग-अलग घरों में जाती हैं और नृत्य के माध्यम से इस पूरे उत्सव का हिस्सा बनती हैं. जब मैंने उनसे पूछा कि उन्हें कौन-सा नेता पसंद है तो नेहा ने कहा कि उन्हें हिमंत बिस्वा सरमा सबसे ज़्यादा पसंद हैं. उनकी वजह पूछने पर नेहा ने कहा कि उनके आने के बाद असम में लोगों को नौकरियां मिलनी शुरू हुई हैं.
'जुबिन दा को दिलाए न्याय'
नेहा का कहना था कि पहले नौकरी के लिए लोगों को बहुत संघर्ष करना पड़ता था, लेकिन अब वे अपने कई ऐसे सीनियर्स को जानती हैं, जिन्हें पढ़ाई करते-करते ही नौकरी मिल गई. फिर मैंने उनसे पूछा कि असम सरकार का ऐसा कौन-सा काम है, जिससे छात्रों को सबसे अधिक फायदा हुआ हो. इस पर नेहा मुस्कुराईं और बोलीं, 'सरकार सब कुछ कर रही है… बस जुबिन दा को न्याय दिला दे.'
नेहा ने कहा कि जुबिन दा की हत्या हुई है और उनके हत्यारों को सजा दिलाना सरकार का काम है. उनकी इच्छा थी कि यह काम जल्द से जल्द पूरा हो.
असम चुनाव कवरेज के दौरान करीब दो हफ्तों में मैंने ये बात गहराई से महसूस की कि यहां के लोगों के दिलों में जुबिन गर्ग के लिए एक अलग ही दीवानगी है. लोग उन्हें सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं और असमिया अस्मिता का प्रतीक मानते हैं. यही भाव इन बच्चों में भी साफ दिखाई दे रहा था. जैसे ही जुबिन गर्ग की चर्चा हुई, मैंने वहां बैठे बच्चों से पूछा कि क्या उन्हें उनका कोई गाना आता है और अगर आता है तो क्या वो हमें सुनाएंगे? बस, इतना सुनना था कि बच्चों ने एक-दूसरे की ओर देखा और फिर एक साथ गाना शुरू कर दिया. वह पल बेहद आत्मीय, सहज और भावुक था. तभी कैमरा मेरे बाईं ओर बैठे शान की ओर घूम गया जो दसवीं कक्षा में पढ़ते थे.
शान ने बताया कि बिहू असम के लिए बहुत बड़ा त्योहार है और वे राजनीति से ज़्यादा इस बात को लेकर उत्साहित हैं कि बिहू आने वाला है. हालांकि, जब मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें कोई नेता पसंद है तो उन्होंने कहा, 'हमने किसी नेता को नहीं, सिर्फ हिमंत बिस्वा सरमा को देखा और जाना है… क्योंकि सब उन्हें मामा-मामा कहते हैं.'
'मैं भी पत्रकार बनना चाहती हूं...'
मेरी शान से बातचीत चल ही रही थी कि अचानक नेहा ने मेरी ओर देखते हुए कहा, 'मैं भी आपकी तरह एक पत्रकार बनना चाहती हूं.' नेहा के इतना कहते ही वहां बैठे सभी बच्चे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे और उसी हंसी-मज़ाक के बीच हमारी बातचीत भी अपने खूबसूरत अंत की ओर बढ़ गई.
जैसे ही बातचीत खत्म हुई और वापसी का समय आया, बच्चों ने एक साथ तस्वीर खिंचवाई. गाड़ी की ओर बढ़ते समय पिंकी ने ज़ोर से चिल्लाकर 15 तारीख को बिहू के उत्सव में आने का निमंत्रण दिया. असम की मिट्टी की सौंधी खुशबू और बच्चों की वह मासूम हंसी गुवाहाटी तक के सफर में साथ रही. ये कहानी सिर्फ चुनाव की नहीं थी, बल्कि उन सपनों और उम्मीदों की थी जो असम के सुदूर गांवों में आज भी संगीत और नृत्य के माध्यम से जीवित हैं.
पीयूष मिश्रा