असम का बदलता सियासी गणित: बीजेपी का बढ़ता वर्चस्व, कांग्रेस के सामने 'वोट को सीट' में बदलने की चुनौती

असम की राजनीति में पिछले दशक में बड़ा बदलाव आया है. भारतीय जनता पार्टी ने वोट और सीट दोनों में मजबूत पकड़ बनाई, जबकि कांग्रेस को वोट को सीट में बदलने में दिक्कत हुई. असम गण परिषद, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दल शामिल हैं. वहीं चाय बागान में बूथ घाटने से प्वाइंट और कॉम्प्लेक्स हो गए हैं.

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असम में सीएम हिमंंता बिस्वा सरमा बीजेपी के तो गौरव गोगोई कांग्रेस के प्रमुख चेहरे हैं (Photo- ITG) असम में सीएम हिमंंता बिस्वा सरमा बीजेपी के तो गौरव गोगोई कांग्रेस के प्रमुख चेहरे हैं (Photo- ITG)

पल्लवी पाठक

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 10:04 PM IST

असम में जारी विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दल आमने-सामने हैं. राज्य के आंकड़े भी इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कैसे पिछले एक दशक में राज्य का पॉलिटिकल मैप पूरी तरह से बदल गया है. एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत करते हुए अपनी सीटों और वोट शेयर में काफी बढ़ोतरी की है, जबकि कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट प्रतिशत को सीटों में तब्दील करना रही है. 

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राज्य के क्षेत्रीय दलों के घटते प्रभाव और चाय बागान वाले इलाकों में वोटिंग के गिरते स्तर ने चुनावी समीकरणों को और मुश्किल बना दिया है. चुनाव से पहले बीजेपी का बढ़ता वर्चस्व, गठबंधन की अहमियत और उम्मीदवारों का बैकग्राउंड राज्य की भावी राजनीति को तय करने में निर्णायक भूमिका निभाएंगे.

बीजेपी ने इस दौरान तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की है. 2011 में पार्टी को सिर्फ 11.5% वोट और 5 सीटें मिली थीं. लेकिन 2016 में यह बढ़कर 29.5% वोट और 60 सीटों तक पहुंच गई. 2021 में बीजेपी ने 33.2% वोट हासिल किए और 60 सीटें बरकरार रखीं. वहीं, कांग्रेस जो कभी राज्य की सबसे बड़ी पार्टी थी, उसका प्रदर्शन लगातार गिरा है. 2011 में कांग्रेस को 39.4% वोट और 78 सीटें मिली थीं. 2016 में यह घटकर 31% वोट और 26 सीटों पर आ गई. 2021 में सीटें थोड़ी बढ़कर 29 हुईं, लेकिन वोट शेयर हल्का घटकर 29.7% रह गया.

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क्षेत्रीय दलों की बात करें तो असम गण परिषद (AGP) का असर कम होता गया है. उसका वोट शेयर 2011 में 16.3% से घटकर 2021 में 7.9% रह गया. सीटें भी 10 से घटकर 9 हो गईं. 2021 में AGP बीजेपी के साथ गठबंधन में थी. ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) ने अपनी मौजूदगी बनाए रखी है, लेकिन उसका असर सीमित रहा. उसका वोट शेयर 2011 में 12.6%, 2016 में 13% और 2021 में 9.3% रहा. सीटें 18 से 13 और फिर 16 के बीच रही हैं. 2021 में यह कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा थी.

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) का प्रभाव ज्यादा तेजी से घटा है. उसका वोट शेयर 2011 में 6.1% से गिरकर 2021 में 3.4% रह गया. सीटें भी 12 से घटकर सिर्फ 4 रह गईं. डेटा से साफ है कि बीजेपी ने न सिर्फ वोट बढ़ाए, बल्कि उन्हें सीटों में बदलने में भी सफलता पाई. वहीं कांग्रेस को अच्छे वोट मिलने के बावजूद वह उन्हें सीटों में बदलने में पीछे रह गई. इससे यह भी दिखता है कि सही गठबंधन और वोट बंटवारे की रणनीति कितनी अहम होती है.

उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों पर नजर डालें तो AIUDF के 37% उम्मीदवारों पर क्रिमिनल केस दर्ज हैं, जिनमें 30% गंभीर क्रीमिनल केस की श्रेणी में आते हैं. कांग्रेस में 28% उम्मीदवारों पर क्रीमिनल  केस हैं (20% गंभीर), जबकि AGP में यह आंकड़ा 23% है (19% गंभीर). बीजेपी में यह प्रतिशत कम है, जहां 9% उम्मीदवारों ने आपराधिक मामले घोषित किए हैं, और ये सभी गंभीर श्रेणी में आते हैं.

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मतदान प्रतिशत की बात करें तो 2021 में 2016 के मुकाबले गिरावट देखी गई. 2016 में जहां 84.7% मतदान हुआ था, वहीं 2021 में यह घटकर 82.4% रह गया. सबसे ज्यादा गिरावट अपर असम के चाय बागान वाले इलाकों में हुई. डिब्रूगढ़ में करीब 5.5%, जोरहाट में 5% और तिनसुकिया में 4.8% की गिरावट दर्ज की गई.

कुछ सीटों पर यह गिरावट और ज्यादा थी. डिब्रूगढ़ की चाबुआ सीट पर 7.4%, तिनसुकिया की डूमडूमा में 6.3% और जोरहाट की मरियानी में 6.1% की कमी आई. इसकी साफ वजह तो नहीं पता, लेकिन चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों और उनके पलायन को इसकी एक बड़ी वजह माना जा सकता है.

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