कांशीराम की जयंती को लेकर क्यों सपा से खफा हैं मायावती? समझें कैसे विरासत पर शुरू हो गई सियासत

उत्तर प्रदेश में कांशीराम की विरासत को लेकर सियासत गर्मा गई है. सपा कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने का ऐलान कर दलित वोटों को साधने की कवायद में है. वहीं बसपा प्रमुख मायावती ने सपा के मिशन कांशीराम को नाटकबाजी करार दिया है.

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सपा के मिशन कांशीराम से मायावती क्यों खफा (File photo-PTI) सपा के मिशन कांशीराम से मायावती क्यों खफा (File photo-PTI)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 27 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:13 PM IST

उत्तर प्रदेश में दलित और अति पिछड़े समुदाय के बीच राजनीतिक चेतना जगाने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम के बहाने समाजवादी पार्टी एक नई इबारत लिखने की कवायद में है. डॉ. अंबेडकर की विरासत और बसपा के तमाम नेताओं को अपने साथ मिलाने के बाद अखिलेश यादव ने अब बसपा प्रमुख मायावती की सबसे बड़ी ताकत रहे कांशीराम में अपना सियासी भविष्य तलाश रहे हैं. 

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अखिलेश यादव अपने यादव-मुस्लिम वोटबैंक को साधे रखते हुए दलित वोटों को जोड़ने पर काम कर रहे हैं. इसे अखिलेश ने पीडीए फॉर्मूला का नाम दिया. 2024 में सपा का यह दांव सफल भी रहा है. 2027 में उसे और भी ज्यादा मजबूती देने के लिए सपा 15 मार्च को बसपा संस्थापक कांशीराम की 91वीं जयंती को बड़े पैमाने पर मानने का प्लान बनाया है. 

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को निर्देश दिया है कि आगामी 15 मार्च को कांशीराम की जयंती को प्रदेश के सभी जिले में 'बहुजन दिवस' या पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) दिवस के रूप मनाए. अखिलेश के 'मिशन कांशीराम' को लेकर बसपा प्रमुख मायावती खफा हैं और सपा की कवायद को राजनीतिक नाटकबाजी करार दे रही हैं. 

कांशीराम की जयंती के बहाने सपा का लॉर्जर प्लान?
कांशीराम ने ही बसपा का गठन किया था और यूपी सहित देशभर में दलित राजनीति खड़ी की थी, जिसके सहारे मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की सीएम रहीं. यूपी में बसपा के दलित मतदाताओं को अखिलेश अपने साथ लेने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. अखिलेश अब लोहिया के साथ अंबेडकर-कांशीराम की विचारधारा को लेकर चलना चाहते हैं ताकि दलित समाज के विश्वास को जीत सके. 

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सपा इस बार कांशीराम की जयंती को सूबे के जिलों में मानने का ऐलान किया है. सपा प्रमुख के निर्देश के बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल ने मंगलवार को सभी जिला अध्यक्षों, सांसदों, विधायकों,पूर्व सांसदों और विधायकों और पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों को इन कार्यक्रमों के संबंध में निर्देश जारी किए. 

उन्होंने कहा कि कांशीराम ने अपने जीवन को हमेंशा दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच एकता और भाईचारे के लिए समर्पित कर रखा था. इसीलिए उनके जयंती को बहुजन समाज दिवस या पीडीए दिवत कहा जाता है. कांशीराम की जयंती पर सपा से जिले स्तर पर कार्यक्रम कर रही है, जिसमें बड़ी संख्या में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को लोग एक जुट होंगे.

सपा का कांशीराम के साथ कैसा सियासी कनेक्शन
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते है कि बसपा संस्थापक कांशीराम के बहाने अखिलेश की कोशिश दलित समाज के साथ भावनात्मक रिश्ता कायम रखने की है. वह दलित समाज को यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि सपा भी कांशीराम का सम्मान और सियासी अहमियत देने में किसी तरह से पीछे नहीं है. कांशीराम को सपा अपनाने की कोशिश 2022 के चुनाव के बाद से ही शुरू कर दिया था. 

2023 में अखिलेश यादव ने रायबरेली के गौरा ब्लॉक में कांशीराम की मूर्ती अनावरण किया था. इसके अलावा  कांशीराम 1991 में यादव परिवार के गृह क्षेत्र इटावा से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता थे और उसके बाद 1993 में सपा-बसपा का पहली बार गठबंधन हुआ था, लेकिन गेस्ट हाउस कांड के बाद गठबंधन टूट गया था. हालांकि, 2019 में सपा और बसपा फिर एक साथ मिलकर चुनाव लड़े, लेकिन बाद में मायावती ने गठबंधन तोड़ दिया. इसके बाद ही अखिलेश यादव ने दलित वोटों को साधने के स्टैटेजी बनाई.

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कांशीराम की सियासी प्रयोगशाला से निकले अंबेडकरवादी विचारधारा वाले नेताओं को अखिलेश पहले से पार्टी में राजनीतिक अहमियत दे रहे हैं. इंद्रजीत सरोज से लेकर रामअचल राजभर, आरके चौधरी, लालजी वर्मा, त्रिभवन दत्त, डॉ. महेश वर्मा और नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे पुराने बसपाई अखिलेश के साथ हैं. कांशीराम से सियासत का हुनर सिखने वाले नेताओं के साथ-साथ कांशीराम को भी अखिलेश अपनाने जा रहे हैं, उसके पीछे बसपा के कोर वोटबैंक को अपने पाले में लाने की रणनीति मानी जा रही है.

सपा 50 फीसदी वोट शेयर हासिल करने का बना रही प्लान
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि यूपी में करीब 20 फीसदी दलित वोटर हैं. दलित समाज के विश्वास को जीतने की कोशिश है, क्योंकि सपा इस बात को बाखूबी समझती है कि यादव-मुस्लिम वोटों के सहारे बीजेपी से सत्ता नहीं छीन सकती है. कांशीराम के जरिए दलित और अपिछड़े वर्ग के वोटबैंक को अपने साथ जोड़ने में सफल हो जाती है तो सपा को पास एक बड़ा सियासी आधार हो जाएगा. 2012 के बाद से बसपा का सियासी ग्राफ लगातार गिरा है. ऐसे में सपा की कोशिश बसपा के दलित और अति पिछड़ों को अपने पाले में लाने की है.

2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का कोर वोटबैंक दलित समुदाय का वोट भी सपा को पहले से ज्यादा मिला. दलित मतदाताओं का झुकाव जिस तरह से सपा की तरफ हुआ है, उससे अखिलेश यादव के हौसले बुलंद हो गए हैं. यूपी की राजनीति में अखिलेश अपना सियासी वोटों का आधार 32 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी प्लस ले जाने की है. अखिलेश यादव की नजर बसपा के वोटबैंक पर है, जिसे साधने की कवायद कर रहे हैं. बीजेपी से मुकाबले के लिए सपा 50 फीसदी से मजबूत आधार वोटबैंक तैयार करना चाहती है, जिसके दम पर वह बीजेपी के साथ दो-दो हाथ कर सके. अखिलेश की इस रणनीति ने मायावती को खफा कर दिया है. 

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सपा से मायावती हुई खफा और जमकर साधा निशाना 
मायावती की सियासत के बैकबोन कांशीराम ही रहे हैं, जिन्होंने गांव-गांव घूम-घूमकर दलित राजनीति खड़ी की है.ऐसे में कांशीराम को लेकर दलितों के बीच आज भी उसी तरह का सम्मान है. अब उसकी कांशीराम के बहाने अखिलेश दलितों के विश्वास जीतने की कोशिश में हैं, जिसे लेकर मायावती ने अखिलेश यादव और सपा को 'घोर अवसरवाद' करार देते हुए मोर्चा खोल दिया है. मायावती ने कहा कि सपा का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग और बसपा विरोधी रहा है. 

बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने को मायावती ने कहा कि यह सपा की विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाजी के सिवाय कुछ नहीं है. सपा का इस प्रकार का व्यवहार शुद्ध रूप से उपेक्षित वर्गों के वोटों का स्वार्थ हासिल करने का छलावा और दिखावा है, जैसा कि अन्य विरोधी पार्टियां भी इन वर्गों के वोटों के स्वार्थ के लिए करती हैं. 

अखिलेश के पीडीए फॉर्मूले पर बसपा ने खड़े किए सवाल
बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने कहा कि ये सपा के लोगों का नाटक है. जिस कांशीराम के नाम पर ये लोग जयंती मनाने का आज नाटक कर रहे हैं, उनके नाम पर जब मायावती ने जिला बनाया था, वो बात अखिलेश यादव को हजम नहीं. कांशीराम नगर के बदलकर अखिलेश ने कासगंज रख दिया था. जो व्यक्ति कांशीराम के नाम पर बने जिले, विश्वविद्यालय और पार्क हो बर्दाश्त नहीं कर सका, वो उनकी विचारधारा को लेकर कैसे आगे बढ़ सकता है. 

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विश्वनाथ पाल ने अखिलेश यादव के PDA के नारे पर भी सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने कहा कि अखिलेश के PDA के नारे का मतलब 'परिवार दल अलायंस'. इनके परिवार में बिखराव है. शिवपाल यादव पहले ही पार्टी बना चुके थे और अब उन्हें ये साथ लेकर आ गए हैं.  इनके भाई की पत्नी बीजेपी की सदस्य हैं और राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष हैं. इनके दूसरे भाई धर्मेंद्र यादव का बहनोई बीजेपी में है और करहल से चुनाव लड़ा थे. इन्होंने परिवार का अलांयस करने के लिए PDA बनाया है.यानी परिवार दल अलायंस. ये कभी P से पिछड़ा बताते हैं, कभी कुछ और बताते हैं. ऐसे ही A से कभी अल्पसंख्यक, कभी आधी आबादी (महिला), कभी आदिवासी, कभी अगड़ा बताते हैं. 

दलित वोटों के लिए शह-मात का खेल शुरू 
मायावती ने सपा और भाजपा को एक-दूसरे की पूरक बताते हुए उन पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है. इस तरह से उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सपा सरकार ने कांशीराम के नाम पर बने संस्थानों और जिलों के नाम बदले. सपा के कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाने को लेकर बसपा ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है, क्योंकि मायावती इसे केवल दलितों को अपनी ओर करने का चुनावी पैंतरा मानती हैं.

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कांशीराम के संस्थापक होने के नाते मायावती बसपा की एकमात्र वारिस के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करना चाहती हैं, और दलित वोटों के बिखराव को रोकने के लिए उनकी विचारधारा का इस्तेमाल कर रही हैं.  कांशीराम की जयंती का अवसर उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज और दलित मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की कवायद में अखिलेश हैं तो मायावती ने सपा को दलित विरोधी बताकर अपने कोर वोटबैंक को जोड़े रखने की कवायद में है. इस तरह बसपा और सपा के बीच शह-मात का खेल शुरू हो गया है. ऐसे में देखना है कि यूपी के दलितों का दिल कौन जीत पाता है? 

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