साधारण लिबास, छोटा कद और सपाट बोलचाल वाले अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने फिर जनाधार दिया है. अभी केजरीवाल को आम आदमी पार्टी बनाए पूरा दशक भी नहीं बीता है, और उन्हें तीसरी बार दिल्ली के चीफ मिनिस्टर की कुर्सी मिल गई है.
जानिए- इस आम आदमी के खास बनने का पूरा सफर. इनकम टैक्स अफसर की नौकरी से इस्तीफा देकर सड़क पर उतरकर आंदोलन करने वाले अरविंद केजरीवाल कैसे बन गए दिल्ली के सीएम, कैसे आम आदमी तक अपनी पहुंच बनाई.
अरविंद केजरीवाल का जन्म 16 अगस्त 1968 को हरियाणा के हिसार जिले में हुआ था. वो घर में अपने तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े हैं. उनके पिता का नाम गोविंद और माता का नाम गीता है.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का जन्म
जन्माष्टमी के दिन हुआ था. इसलिए उनके दादा-दादी ने उन्हें कृष्णा नाम से बुलाने
का फैसला लिया. लेकिन, आज दुनिया उन्हें अरविंद केजरीवाल, दिल्ली के
मुख्यमंत्री के रूप में जानती है.
केजरीवाल ने हरियाणा के हिसार स्थित कैंपस स्कूल और इसके
बाद सोनीपत स्थित क्रिस्चियन मिशनरी स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी
की. अरविंद केजरीवाल की स्कूल कैंपस लाइफ के बारे में बात करें तो वो कक्षा
में चुपचाप बैठकर सीखने वाले स्टूडेंट के तौर पर जाने जाते थे. उनकी छवि
बचपन में भी एक साफ़-सुथरा चेहरा और मोटे बालों में कंघी किए हुए लड़के की
थी.
अरविंद केजरीवाल को क्रिकेट और फुटबॉल से ज्यादा शतरंज और किताबें पसंद थी. वो एक
पेंसिल और स्केचबुक हमेशा अपने साथ रखते थे. जब वो 11 साल के थे, तब भी वो
अपने कमरे में पेड़, घर, जानवर, आदि जो भी देखते थे, उसे अपने कमरे में
उकेर देते थे. पढ़ाई में भी अच्छे होने के कारण पहली ही बार में उन्हें आईआईटी खड़गपुर में दाखिला मिल गया.
यहां से केजरीवाल ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की.
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने सन्
1989 में टाटा स्टील से अपना करियर शुरू किया. पहली पोस्टिंग जमशेदपुर हुई. तीन साल यहां काम करने के बाद सन् 1992 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और सिविल सर्विस की तैयारी करने लगे.
अरविंद केजरीवाल ने संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) क्लीयर
करके आईआरएस अधिकारी की जिम्मेदारी संभाली. आईआरएस की ट्रेनिंग के दौरान उनकी मुलाकात सुनीता से हुई, जिनसे प्रेम के बाद उन्होंने शादी की. आईआरएस अफसर के तौर पर भारत सरकार
के अधीन काम करने लगे. यहीं से इन्होंने राजनीति के जमीनी पहलुओं को ठीक से
समझा.
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने सन्
1989 में टाटा स्टील से अपना करियर शुरू किया. पहली पोस्टिंग जमशेदपुर की
गई. तीन साल यहां काम करने के बाद सन् 1992 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और सिविल सर्विस की तैयारी करने लगे.
यूपीएससी निकालने के बाद उनका इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर का पद मिला. लेकिन बाद में उन्होंने यहां भी नौकरी छोड़ दी और सामाजिक कार्यों में लग गए. सरकारी कामों में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए केजरीवाल ने 'सूचना का अधिकार' के लिए काम किया. इसके लिए उन्हें वर्ष 2006 में मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला.
IRS की नौकरी छोड़कर समाजसेवा के लिए सड़कों पर आए अरविंद केजरीवाल को शुरुआत में अन्ना हजारे जैसे बड़े समाजसेवियों का साथ मिला. अरविंद केजरीवाल ने ‘सूचना का अधिकार’ के लिए आंदोलन शुरू कर दिया.
साल 2011 में स्वराज की मांग को लेकर अन्ना हजारे के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू हुआ. इस आंदोलन का मुख्य चेहरा भले ही अन्ना हजारे थे, लेकिन इसमें मुख्य सहयोगी के तौर पर अरविंद केजरीवाल की टीम थी.
ये आंदोलन लंबे समय तक चला लेकिन भूख हड़ताल और बड़े विरोध प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस सरकार की ओर से स्वराज की मांग पूरी तरह नहीं मानी गई. यहीं से उन्होंने राजनीति में आने की घोषणा की. उनके इस कदम का तब कई लोगों ने विरोध भी किया. लेकिन केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी की नींव रखी और राजनीति में आने का ऐलान किया. केजरीवाल की राजनीतिक यात्रा में उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल ने पूरा साथ दिया. केजरीवाल सीएम बने तो सुनीता ने आईआरएस के पद से इस्तीफा दे दिया.
पहली बार साल 2013 में आम आदमी पार्टी कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरी. इनके प्रचार का तरीका खर्चीली रैलियों से अलग था. मोहल्ला सभाओं के जरिये प्रचार और लोगों तक पहुंच बनाई और मानो कोई चमत्कार हो गया. दिल्ली की जनता ने उन्हें पूर्ण बहुमत दिया. तब से आम आदमी पार्टी की जीत का सिलसिला जारी है. अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की जनता ने तीसरी बार मुख्यमंत्री के तौर पर सिर आंखों पर बैठाया है.