बात इसी बीते बुधवार की है. मैं ग्रेटर नोएडा स्थित 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान' (Institute of Archaeology) गई थी. मुझे उम्मीद थी कि 25 एकड़ में फैला यह विशाल कैंपस चहल-पहल से भरा होगा, लेकिन वहां पहुंचकर जो मैंने देखा वो कल्पना से परे था.
इस पूरे कैंपस में सन्नाटा पसरा था. यहां दूर-दूर तक इंसान तो छोड़िए कोई जानवर भी नजर नहीं आ रहा था. न ही ग्रीनरी देखकर ऐसा लग रहा था कि ये कैंपस जीवंत है. अब सोचिए, साल 2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने इस विजन के साथ इसका उद्घाटन किया था कि यह पुरातत्व के क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा केंद्र बनेगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही है.
इतिहास और उद्घाटन का वो दिन...
इस संस्थान की नींव 28 अक्टूबर 2016 को तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने रखी थी. उद्घाटन के वक्त पीएम मोदी ने एक्स (X) पर लिखा था, 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय पुरातत्व संस्थान हमारी आने वाली पीढ़ियों को गौरवशाली अतीत से जोड़ने का एक शानदार प्रयास है.'
जब मैं मुख्य गेट पर पहुंची, तो वहां संस्थान का नाम बड़े अक्षरों में लिखा था. लेकिन ताज्जुब की बात यह थी कि उपाध्याय का 'U' और इंस्टीट्यू की स्पेलिंग से 'I' और 'E' गायब थे. बाद में मुझे ऐसा लगा कि यह अधूरा नाम वाकई उस अधूरेपन की शुरुआत थी मुझे कैंपस के अंदर हर जगह मिलने वाला था.
एंट्री: जहां सिस्टम पर ही सवाल खड़े हो गए
कैंपस के अंदर घुसना एक जंग जैसा था. गार्ड्स ने साफ कह दिया, 'मैडम, किसी से बात करवाओ अंदर.' मैंने प्रशासन को कई बार फोन किया, लेकिन हमेशा की तरह किसी ने नहीं उठाया. करीब 15 मिनट तक गेट पर बहस चलती रही. आखिरकार एक सुरक्षा गार्ड के साथ मुझे अंदर जाने की इजाजत मिली.
अंदर कदम रखते ही 25 एकड़ का पूरा एरिया नजर आया. चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें, खूबसूरत दीवारें... सब कुछ था. पर जो नहीं था, वो था 'जीवन'. न कोई छात्र, न फैकल्टी, न कोई हलचल. न कारें, न बाइक. बस इमारतें खामोश खड़ी थीं.
सन्नाटे के बीच एक लंबी सैर
गेट से मुख्य बिल्डिंग तक पहुंचने में 5 मिनट पैदल चलना पड़ा. मैंने गार्ड से पूछा, 'भैया, यहां कितने कमरे हैं?' उसने जवाब दिया, 'मैडम, बहुत कमरे हैं, पूरा तो नहीं पता, बड़ा कैंपस है ना.' तीन साल से वहां तैनात गार्ड को कमरों की गिनती नहीं पता थी.
मुख्य इमारत के सामने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की एक विशाल प्रतिमा लगी है. यह इमारत चार मंजिला है. गार्ड ने बताया कि चौथी मंजिल पर ऑफिस हैं, तीसरी पर क्लास चलती हैं और पहली-दूसरी मंजिल पर लैब और लाइब्रेरी हैं. लेकिन उसने यह भी जोड़ा, 'मैडम, पहली और दूसरी मंजिल तो ज्यादातर बंद ही रहती है.' यह सुनकर मैं सोच में पड़ गई कि इतनी बड़ी लैब और लाइब्रेरी बंद क्यों हैं?
आर्किटेक्चर शानदार पर इमारत बेजान
इमारत के अंदर घुसते ही उसके आर्किटेक्ट ने जैसे मेरी नजरें बांध लीं. ये कोई आधुनिक कांच की बिल्डिंग नहीं है, बल्कि इस पर पारंपरिक नक्काशी और फूलों के डिजाइन हैं. बीच में एक आंगन है जिसकी छत पारदर्शी है ताकि प्राकृतिक रोशनी आ सके. कहना पड़ेगा कि एएसआई (ASI) के तहत आने वाला ये संस्थान विजुअली बहुत इम्प्रेसिव है, बस यहां से रूह गायब है.
चौथी मंजिल पर पहुंचने तक मुझे एक भी इंसान नहीं दिखा. वहां सिर्फ एक गार्ड अपने फोन पर कुछ देख रहा था. जब मैंने उससे कमरों की संख्या पूछी, तो वही जवाब मिला-'पता नहीं मैडम.'
धूल, ताले और खाली गलियारे...
जैसे-जैसे मैं अंदर बढ़ी, खालीपन और गहराता गया. एक कोने में टूटी मेज और दो धूल भरी कुर्सियां पड़ी थीं. चौथी मंजिल के ज्यादातर कमरों पर ताले लटके थे. गलियारे धूल से पटे थे, सन्नाटा ऐसा कि अपनी ही आहट सुनाई दे. वॉशरूम चालू हालत में नहीं थे. किसी भी कोने से ऐसा नहीं लग रहा था कि यहां कोई पढ़ाई या एकेडमिक एक्टिविटी होती है. अधिकारी से मिलने के लिए मुझे 20 मिनट इंतजार करना पड़ा.
फैकल्टी नहीं है, और यह कोई 'कमी' नहीं बल्कि 'डिजाइन' है!
जब मैंने अधिकारी (अनाम रहने की शर्त पर) से पूछा कि यहां कोई फैकल्टी क्यों नहीं है, तो उन्होंने जो कहा वो चौंकाने वाला था. उन्होंने बताया, 'उद्घाटन के वक्त से ही यहां कोई फैकल्टी नहीं है, क्योंकि इस संस्थान का कॉन्सेप्ट ही ऐसा है.'
उनके मुताबिक, यहां क्लासरूम टीचिंग के बजाय फील्ड ट्रेनिंग पर जोर दिया जाता है. एएसआई के अधिकारी और एक्सपर्ट्स आते हैं और गेस्ट लेक्चर देकर चले जाते हैं. जब मैंने डिग्री में हो रही देरी पर सवाल किया, तो बस इतना कहा गया, 'कोई समस्या होगी.'
बिना सिलेबस की पढ़ाई?
सिलेबस के सवाल पर अधिकारी ने कहा कि यहां कोई फिक्स्ड सिलेबस नहीं है. सब कुछ प्रैक्टिकल एक्सपोजर और फील्डवर्क पर आधारित है. छात्र 60-60 दिनों के लिए फील्ड विजिट पर जाते हैं और आकर रिपोर्ट लिखते हैं. सवाल यह उठता है कि बिना किसी स्ट्रक्चर्ड सिलेबस के परीक्षाएं कैसे होती हैं और छात्रों का मूल्यांकन किस आधार पर किया जाता है?
पूरे देश से सिर्फ 15 छात्र!
अधिकारी ने पुष्टि की कि पूरे देश से यहां सिर्फ 15 छात्रों का ही इनटेक (Intake) फिक्स है. फिलहाल बैच में 10 लड़कियां और 5 लड़के हैं. 25 एकड़ के कैंपस, 1000 सीटों वाले ऑडिटोरियम और म्यूजियम के लिए यह संख्या नाममात्र की लगती है.
संस्थान में कहने को तो 6-7 ऑफिस हैं जैसे एक्सकैवेशन, अंडरवाटर आर्कियोलॉजी, साइंस ब्रांच आदि. लेकिन मुझे पूरे दौरे के दौरान सुरक्षाकर्मियों के अलावा कोई स्टाफ मूवमेंट नजर नहीं आया.
हॉस्टल: जहां सन्नाटा जैसे बस गया है?
पीछे के गेट से मैं हॉस्टल की तरफ गई. हाउसकीपिंग स्टाफ से पूछा कि कितनी लड़कियां रहती हैं, तो उन्होंने कहा- 'हमें नहीं पता, अंदर पूछ लो.' लेकिन हॉस्टल के अंदर भी सन्नाटा पसरा था. एक महिला गार्ड ने हिचकिचाते हुए बताया कि यहां 10 लड़कियां रहती हैं. जब मैंने छात्रों से मिलने की इच्छा जताई, तो एक फोन कॉल के बाद मुझे मना कर दिया गया-'मैडम, ऊपर से ऑर्डर है, आप नहीं मिल सकतीं.'
वो सवाल, जिसका जवाब कैंपस के पास भी नहीं था
जैसे ही मैं बाहर निकली, एक गार्ड मुझे गेट तक छोड़ने आया. जाते-जाते भी मेरी आंखें किसी छात्र को ढूंढ रही थीं, पर कोई नहीं दिखा.
सवाल वही है कि 289 करोड़ रुपये, 25 एकड़ जमीन, प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटन और एएसआई के इतने सारे विभाग... फिर भी यह कैंपस इतना अदृश्य और खाली क्यों है? मैं बिना किसी जवाब के लौट आई. जवाब शायद उन बंद कमरों और धूल भरे गलियारों के पास भी नहीं था.
प्रिंसी शुक्ला