जब चीन ने वियतनाम के खिलाफ छेड़ी जंग, उल्टे पांव भागना पड़ा था

आज के दिन ही चीन ने वियतनाम के खिलाफ जंग छेड़ दी थी. दशकों तक युद्ध की विभिषिका झेलने के बाद भी वियतनाम ने सख्ती से जवाब दिया और चीन को खदेड़ दिया था.

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जब चीन ने कंबोडिया पर हमला किया, महीने भर चला था खूनी संघर्ष (Photo - Pexels) जब चीन ने कंबोडिया पर हमला किया, महीने भर चला था खूनी संघर्ष (Photo - Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:55 AM IST

आज का दिन इतिहास में चीन और वियतनाम के बीच शुरू हुई एक जंग के लिए जाना जाता है. जब वियतनाम ने कंबोडिया के तानाशाह  को उखाड़ फेंकने की कार्रवाई की. कंबोडिया से सहानुभूति रखने वाले चीन ने इसके जवाब में 17 फरवरी 1979 को वियतनाम के खिलाफ जंग शुरू कर दी.

1975 में वियतनाम युद्ध की समाप्ति के बाद वियतनाम और चीन के बीच तनाव में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई थी. अपना प्रभाव बढ़ाने के प्रयास में, वियतनाम ने लाओस में सैन्य उपस्थिति दर्ज  की. चीन के प्रतिद्वंद्वी सोवियत संघ के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया और जनवरी 1979 में पोल ​​पॉट के कंबोडियाई शासन को उखाड़ फेंका. इसके ठीक एक महीने बाद, चीनी सेना ने आक्रमण किया.एक महीने तक चले खूनी और भीषण संघर्ष के बाद चीन को पीछे हटना पड़ा.

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पोल पॉट एक राजनीतिक नेता थे जिनकी कम्युनिस्ट खमेर रूज सरकार ने 1975 से 1979 तक कंबोडिया पर शासन किया। उस दौरान, अनुमानित 15 लाख से 20 लाख कंबोडियाई लोग भुखमरी, फांसी, बीमारी या अत्यधिक काम के कारण मारे गए थे. खमेर रूज ने एक वर्गहीन कम्युनिस्ट समाज स्थापित करने के प्रयास में विशेष रूप से बुद्धिजीवियों, शहरी निवासियों, वियतनामी मूल के लोगों, सरकारी कर्मचारियों और धार्मिक नेताओं को निशाना बनाया. कुछ इतिहासकार पोल पॉट शासन को हाल के इतिहास के सबसे बर्बर और हत्यारी शासनों में से एक मानते हैं.

पोल पॉट और खमेर रूज के क्रूर शासनकाल के दौरान कंबोडिया में रहने वाले लाखों लोगों को मार डाला गया था. उनके शवों को सामूहिक कब्रों में दफनाया गया था. पोल पॉट और खमेर रूज सरकार ने वियतनाम युद्ध के दौरान कंबोडिया शरण लेने वाले वियतनामी शरणार्थियों पर बम बरसाए थे. अमेरिका की वापसी के बाद जब जनवरी 1975 में शरणार्थियों से भरी कंबोडिया की राजधानी पर अंतिम हमला शुरू हुआ, जिसमें खमेर रूज ने हवाई अड्डे पर बमबारी की और नदी के रास्तों को अवरुद्ध कर दिया. सत्ता संभालने के लगभग तुरंत बाद, खमेर रूज ने नोम पेन्ह के 25 लाख निवासियों को वहां से निकाल दिया. 

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शुरुआत में, पोल पोट ने पर्दे के पीछे रहकर ही शासन किया. प्रिंस नोरोडोम के इस्तीफे के बाद, वे 1976 में प्रधानमंत्री बने। उस समय तक, कंबोडियाई और वियतनामी लोगों के बीच सीमा पर झड़पें नियमित रूप से हो रही थीं. 1977 में लड़ाई तेज हो गई, और दिसंबर 1978 में वियतनामी सेना ने 60,000 से अधिक सैनिकों के साथ-साथ हवाई और तोपखाने की टुकड़ियां सीमा पार भेजीं. 7 जनवरी 1979 को उन्होंने नोम पेन्ह पर कब्जा कर लिया और पोल पोट को जंगल में वापस भागने पर मजबूर कर दिया, जहां उसने फिर से गुरिल्ला अभियान शुरू कर दिए.

इसके ठीक एक महीने बाद, 17 फरवरी 1979 को चीनी सेना ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया. लाखों चीनी सैनिकों ने वियतनाम की उत्तरी सीमा पार करके देश पर आक्रमण किया और दोनों देशों के बीच 600 किलोमीटर लंबी सीमा पर भीषण हमला किया. इतिहासकारों के दृष्टिकोण से, चीन द्वारा वियतनाम पर किया गया एक महीने तक चला.

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गंभीर और सावधानीपूर्वक तैयारी के कुछ महीनों बाद, 17 फरवरी की सुबह तड़के, 400 टैंकों और 1,500 तोपों से लैस चीनी सेना ने वियतनाम की सीमावर्ती प्रांतीय राजधानियों की ओर एक साथ हमला किया, जब वहां के निवासी सो रहे थे. करीब एक महीने तक चले खूनी और भीषण संघर्ष के बाद चीन को  खदेड़ दिया गया.

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एक अनुमान के अनुसार, इस युद्ध में  लगभग 28,000 चीनी मारे गए और 43,000 घायल हुए, जबकि वियतनामी मृतकों की संख्या 10,000 से कम बताई गई. 1991 के अंत में चीन-वियतनाम संबंधों पूरी तरह से सामान्य होने के बाद हनोई और बीजिंग दोनों ने जीत का दावा किया. लेकिन, मोर्चे से चीन को पीछे हटना पड़ा था और जानमाल का ज्यादा नुकसान भी चीन को होने का ही अनुमान लगाया गया.

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