नेपाल ने कसी छात्र राजनीति पर नकेल...जानिए भारत में कब-कब छात्र आंदोलनों पर लगी रोक

पड़ोसी देश नेपाल में इन दिनों एक नई बहस छिड़ी हुई है. प्रधानमंत्री बालेन शाह की मुहिम के बाद नेपाल के कई प्रमुख शिक्षण संस्थानों और खासकर त्रिभुवन यूनिवर्सिटी (TU) में छात्र राजनीति को पूरी तरह से बैन करने की तैयारी हो रही है. कैंपस में अब न झंडे दिखेंगे, न ही नारों की गूंज. लेकिन सवाल यह है कि लोकतंत्र की जननी कही जाने वाली छात्र राजनीति पर यह प्रहार क्यों? और क्या भारत में भी कभी ऐसा हुआ है?

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Student union ban In India (Photo: ITG) Student union ban In India (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:55 PM IST

भारत में छात्र राजनीति और आंदोलन का इतिहास बहुत पुराना है. स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज तक छात्रों ने सामाजिक, शैक्षणिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद की है. उनके इस आक्रोश से कई बार सरकारों को अपना कदम वापस लेने पड़ा है और कई नीतियों में बदलाव करना पड़ा है. इसके साथ ही कुछ मौकों पर प्रशासन ने सक्रिय रूप से नियंत्रण और रोक की भी कोशिश की है. पड़ोसी देश नेपाल में इन दिनों हालात सही नहीं हैं. प्रधानमंत्री बालेन शाह ने प्रमुख शिक्षण संस्थानों और खासकर त्रिभुवन यूनिवर्सिटी (TU) में छात्र राजनीति को पूरी तरह से बैन करने की तैयारी हो रही है.

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पुराना है इतिहास 

छात्र राजनीति भारत के राजनीतिक धारा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. 1970 के दशक में बिहार छात्र आंदोलन ने पूरे देश में राजनीतिक चेतना को उभारा और बाद में जेपी आंदोलन जैसे बड़े आंदोलनों को जन्म दिया, जिसने तत्कालीन सरकारों को चुनौती दी. भारत में छात्र संगठन जैसे All India Students’ Association (AISA) समेत कई अन्य यूनियनों ने शिक्षा, रोजगार, समानता और सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाई. 

नेपाल में क्यों लगा बैन? 

नेपाल में छात्र संगठनों पर आरोप हैं कि वे पढ़ाई से ज्यादा राजनीतिक दलों के हथियार के रूप में काम कर रहे थे. हड़तालों और तालाबंदी के कारण परीक्षाएं समय पर नहीं हो पा रही थीं. हॉस्टल्स में अवैध कब्जा और शिक्षकों के साथ बदसलूकी की घटनाओं ने आम छात्रों को राजनीति से दूर कर दिया. 

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भारत में कब-कब लगा छात्र राजनीति पर ब्रेक

भारत में छात्र राजनीति का इतिहास आजादी की लड़ाई से जुड़ा है, लेकिन कई बार सरकारों और अदालतों ने इस पर कड़े प्रहार किए हैं:

इमरजेंसी (1975-77): इंदिरा गांधी के दौर में जब देश में इमरजेंसी लगा, तो सबसे पहले छात्र आंदोलनों को कुचला गया. जेपी आंदोलन के समय दिल्ली (JNU/DU) से लेकर पटना यूनिवर्सिटी तक के छात्र नेताओं को जेल में डाल दिया गया था. इस दौरान इमरजेंसी में राजनीतिक गतिविधियों, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों, और प्रेस समेत कई चीजों पर रोक लगी थी और छात्र नेताओं को भी गिरफ्तार किया गया था. 

लिंगदोह कमेटी की सिफारिशें (2006): सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी इस कमेटी ने छात्र संघ चुनावों के लिए कड़े नियम बनाए (जैसे उम्र सीमा और खर्च पर रोक). कई यूनिवर्सिटीज ने इन नियमों का पालन न होने पर सालों तक चुनाव नहीं कराए. 

AMU और जामिया का विवाद: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और जामिया मिलिया इस्लामिया में भी समय-समय पर अनुशासन और सुरक्षा का हवाला देते हुए छात्र संघों को भंग किया जाता रहा है. 

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (2019): छात्र राजनीति की नर्सरी कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ को भंग कर छात्र परिषद (Student Council) मॉडल लाने की कोशिश हुई, जिसका भारी विरोध हुआ. 

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