भारत और उज्बेकिस्तान की सेनाओं के बीच सातवीं बार आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास डस्टलिक 2026 सफलतापूर्वक खत्म हो गया है. यह अभ्यास 12 अप्रैल से 25 अप्रैल 2026 तक उज्बेकिस्तान के नमांगन में गुरुमसराय फील्ड ट्रेनिंग एरिया में चला. कुल दो हफ्ते तक चले इस अभ्यास का मकसद था दोनों देशों की सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और संयुक्त ऑपरेशन की क्षमता बढ़ाना.
खासकर अर्ध-पहाड़ी इलाकों में लड़ाई के लिए दोनों सेनाएं साथ में तैयार हुईं. शुरू से अंत तक अभ्यास में रणनीतिक ड्रिल्स, खास हथियारों की ट्रेनिंग और अंत में पूरी संयुक्त मिशन की जांच हुई. इससे दोनों देशों के सैनिकों ने एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझा और भरोसा बढ़ाया.
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डस्टलिक अभ्यास क्या है और क्यों जरूरी है?
डस्टलिक अभ्यास भारत और उज्बेकिस्तान के बीच नियमित होने वाला संयुक्त सैन्य अभ्यास है. इसका नाम उज्बेकिस्तान की पुरानी संस्कृति से लिया गया है. यह अभ्यास दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के साथ काम करने का मौका देता है. आजकल दुनिया में सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ रही हैं इसलिए दो देशों की सेनाएं साथ ट्रेनिंग करके अपनी कमजोरियां दूर करती हैं और ताकत बढ़ाती हैं.
इस बार सातवीं बार हुआ डस्टलिक 2026 खास इसलिए था क्योंकि इसमें अर्ध-पहाड़ी इलाके में लड़ाई पर पूरा फोकस रहा. दोनों देशों के सैनिकों ने मिलकर छोटी-छोटी रणनीतियों से लेकर बड़े मिशनों तक का अभ्यास किया. इससे दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और मजबूत हुआ.
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अभ्यास में सैनिकों ने क्या-क्या किया?
अभ्यास के दौरान सैनिकों को कई तरह की ट्रेनिंग दी गई. पहले सामान्य रणनीतिक ड्रिल्स हुईं फिर खास हथियारों का इस्तेमाल सिखाया गया. अंत में पूरा अभ्यास छह अलग-अलग ऑपरेशनल चरणों में बांटा गया. इन चरणों में सैनिकों को टोह लेने वाली टीम, हवाई हमला करने वाली टीम, निगरानी टीम, हेलीकॉप्टर से फायरिंग टीम, घर में घुसकर ऑपरेशन करने वाली टीम और रिजर्व टीम में बांटा गया.
रिजर्व टीम में इंजीनियर और मेडिकल के सैनिक भी शामिल थे. दोनों देशों ने मिलकर संयुक्त कमांड और कंट्रोल सेंटर बनाया जिससे पूरा प्लानिंग और एक्जीक्यूशन एक जगह से होता रहा. ड्रोन से निगरानी, मैदान में खुद सुधार, बार-बार रिहर्सल और अंत में पूरी जांच करके देखा गया कि दोनों सेनाएं कितनी अच्छी तरह साथ काम कर सकती हैं.
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अंतिम चरण में क्या खास हुआ?
अभ्यास के आखिरी दिनों में सभी छह चरणों को पूरी तरह रिहर्सल किया गया. सैनिकों ने वास्तविक युद्ध जैसी स्थिति बनाकर ट्रेनिंग ली. टैक्टिकल ड्रोन से ऊपर से नजर रखी गई. जमीन पर सैनिकों ने अपनी तरकीबें अपनाईं और बार-बार दोहराकर हर छोटी गलती सुधारी.
अंत में संयुक्त मिशन की वैलिडेशन यानी जांच हुई जिसमें सब कुछ बिल्कुल सही पाया गया. इससे साबित हुआ कि भारत और उज्बेकिस्तान की सेनाएं मिलकर किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं. अर्ध-पहाड़ी इलाके में यह ट्रेनिंग दोनों देशों के लिए बहुत उपयोगी साबित हुई क्योंकि दोनों देशों के पास ऐसे इलाके हैं जहां यह ज्ञान काम आएगा.
अभ्यास के अंत में एक समारोह आयोजित किया गया जिसमें दोनों देशों के खास मेहमानों और बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले सैनिकों को सम्मानित किया गया. इसके बाद कमांडर्स डिनर हुआ जिसमें दोनों देशों के कमांडरों ने एक-दूसरे से मुलाकात की. दोनों देशों के सैनिकों ने एक-दूसरे की संस्कृति और तरीके समझे जिससे भविष्य में और मजबूत साझेदारी बनेगी. यह अभ्यास सिर्फ ट्रेनिंग नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच लंबे समय तक चलने वाले रक्षा संबंधों की मजबूत नींव साबित हुआ.
शिवानी शर्मा