'100 करोड़ वसूली' केस में परमबीर सिंह पर 5 हजार का जुर्माना, सचिन वाजे से पूछताछ

एंटीलिया बम और मनसुख हीरेन मर्डर केस में आरोपी बर्खास्त पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे की आज जस्टिस चांदीवाल आयोग के सामने पेशी हुई. उनसे 100 करोड़ रुपये की वसूली केस में पूछताछ की गई.

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बर्खास्त पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे बर्खास्त पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वाजे

दिव्येश सिंह

  • मुंबई,
  • 22 जून 2021,
  • अपडेटेड 2:16 PM IST
  • जस्टिस चांदीवाला आयोग कर रही है जांच
  • अनिल देशमुख पर है भ्रष्टाचार का आरोप

एंटीलिया बम और मनसुख हीरेन मर्डर केस में आरोपी और पुलिस सेवा से बर्खास्त इंस्पेक्टर सचिन वाजे की आज जस्टिस चांदीवाल आयोग के सामने पेशी हुई. सचिन वाजे से मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की ओर से पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख पर लगाए गए आरोपों के बारे में पूछताछ की जाएगी. फिलहाल वाजे न्यायिक हिरासत में है.

इसके अलावा जस्टिस चांदीवाल आयोग ने पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर हलफनामा नहीं दाखिल किए जाने पर जुर्माना लगाया है. आयोग ने परमबीर पर 5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और इस पैसे को मुख्यमंत्री कोविड फंड में जमा करने का आदेश दिया है.

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पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख पर मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने 100 करोड़ रुपये की वसूली का आरोप लगाया था. इन आरोपों की जांच के लिए महाराष्ट्र सरकार ने जस्टिस चांदीवाल आयोग का गठन किया गया है. इन्हीं आरोपों के कारण अनिल देशमुख को गृह मंत्री पद से हटा दिया था और पूरे मामले की जांच ईडी और सीबीआई कर रही है.

पिछले दिनों ही महाराष्ट्र सरकार ने जस्टिस चांदीवाल आयोग को सिविल कोर्ट की शक्तियां प्रदान दी. हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कैलाश उत्तमचंद चांदीवाल की अगुआई वाली एक सदस्यीय समिति का गठन 30 मार्च को किया गया था. तीन मई को जारी एक अधिसूचना में राज्य सरकार ने जांच समिति को सिविल कोर्ट की शक्तियां प्रदान की हैं.

क्या है पूरा मामला
परमबीर सिंह ने मुंबई के पुलिस कमिश्नर पद से हटाए जाने और राज्य होम गार्ड का डीजी बनाए जाने के बाद 20 मार्च को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा था. सिंह ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कुछ पुलिस अधिकारियों को हर महीने मुंबई के बार और रेस्तरां से 100 करोड़ रुपये की वसूली करने को कहा था.

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इस पूरे मामले की जांच के लिए सरकार ने एक आयोग का गठन किया था. इस पर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि समिति को न्यायिक आयोग नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसे जांच आयोग अधिनियम 1952 के तहत शक्तियां नहीं दी गई हैं. इसके बाद सरकार ने आयोग को सिविल कोर्ट की शक्तियां दे दी थी.

 

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