Chandranath Rath Murder Case: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की हत्या के मामले में पुलिस ने तीन ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया है, जिन पर शूटआउट में शामिल होने का शक है. मगर नकली नंबर प्लेट, घिसे हुए चेसिस नंबर और शूटआउट में शामिल तमाम गाड़ियों को लावारिस छोड़े जाने के बावजूद आखिर पुलिस इस हत्याकांड में शामिल आरोपियों तक कैसे पहुंची? पुलिस की तफ्तीश का ये पहलू बेहद अहम है. फिलहाल, ये कहा जा सकता है कि मोहरे तो पकड़े गए, लेकिन असली मास्टरमाइंड का पकड़े जाना अभी बाकी है.
दो कार. निसान माइक्रा. खेल देखिए कि दोनों ही कारों का नंबर हु-ब-हू एक था. यानी सेम टू सेम. अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? तो इसी सवाल में पश्चिम बंगाल के सीएम शुभेंदु अधिकारी के पीए रहे चंद्रनाथ रथ की हत्या का राज छुपा है. क्योंकि मामले की जांच कर रही पश्चिम बंगाल पुलिस की एसआईटी यानी स्पेशल इनवेस्टिगेशन टीम को जब हत्या में नकली नंबर प्लेट वाली इस कार के इस्तेमाल का पता चला, तो पुलिस भी कुछ देर के लिए ऐसे ही उलझ गई थी.
लेकिन इसे आप इंस्टैंट कर्मा कहें, तकदीर का खेल या फिर पुलिस इनवेस्टिगेशन का कमाल. एक नकली नंबर प्लेट के सहारे आखिरकार पश्चिम बंगाल की पुलिस उन किरदारों तक पहुंचने में कामयाब हो गई, जिन पर चंद्रनाथ रथ की हत्या में शामिल होने का शक है. शक है कि इन्हीं लोगों ने मिल कर चंद्रनाथ की जान लेने वाले शूटआउट को अंजाम दिया. लेकिन आखिर नकली नंबर प्लेट के सहारे पुलिस कैसे चंद्रनाथ के शूटरों तक पहुंची? शूटरों ने आखिर किसके इशारे पर चंद्रनाथ का क़त्ल किया? ये पूरी इनवेस्टिगेशन हम आपको सिलसिलेवार तरीके से बताएंगे, लेकिन पहले ये जान लीजिए कि पुलिस ने फिलहाल इस सिलसिले में जिन तीन चेहरों को गिरफ्तार किया है, वो कौन हैं? और करते क्या हैं?
किरदार नंबर-1 राज सिंह किरदार
किरदार नंबर-2 मयंक राज मिश्रा
किरदार नंबर-3 विक्की मौर्या
इनमें मयंक राज मिश्रा और विक्की मौर्या को जहां बिहार के बक्सर से पकड़े जाने की बात सामने आई है, वहीं राज सिंह को पुलिस ने अयोध्या से पकड़ा है. वैसे तो राज सिंह यूपी के बलिया का रहने वाला है, लेकिन खबरों के मुताबिक इन दिनों वो बक्सर में ही रह रहा था, जबकि उसकी गिरफ्तारी की लोकेशन की बात करें, तो वो अयोध्या है. यूपी और बिहार पुलिस की मदद से इन तीनों को धर दबोचने के बाद बंगाल पुलिस इन्हें लेकर फिलहाल बंगाल लौट चुकी है और लोकल कोर्ट ने तीनों को 13 दिनों के लिए रिमांड पर सीआईडी के हवाले भी कर दिया है, ताकि चंद्रनाथ की हत्या की पूरी साजिश का सच सामने आ सके और मास्टरमाइंड का चेहरा बेनकाब हो.
आपको याद होगा कि बुधवार 6 मई की रात को चंद्रनाथ रथ की गाड़ी को मध्यमग्राम इलाके में शूटरों ने निसान माइक्रा कार से रोक लिया था. जिसके बाद पर उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाईं थी. चूंकि इस निसान कार को शूटरों ने चंद्रनाथ की कार के आगे आड़े-तिरछे तरीके से लगा दिया था, शूटआउट के बाद प्लानिंग के मुताबिक उन्होंने इस कार को मौका-ए-वारदात पर ही छोड़ दिया और बाइक पर सवार होकर मौके से फरार हो गए थे. पुलिस ने मौके से कार जब्त तो कर ली, लेकिन उसकी तफ्तीश को तब पहला झटका लगा, जब उसे पता चला कि इस कार का नंबर प्लेट तो नकली है. असल में पुलिस ने जब कार के नंबर प्लेट के सहारे उसके मालिक से बात की, तो कार सिलिगुड़ी में रजिस्टर्ड विलियम जेम्स की निकली. ऐसे में पुलिस को अब शूटआउट में इस्तेमाल हुई असली कार का पता लगाना था.
पुलिस ने अब इस काम के लिए रिवर्स सर्चिंग की शुरुआत की और मौका-ए-वारदात तक पहुंचने के कार के पूरे रूट को ट्रैक करना चालू किया. पुलिस को शक था कि इस वारदात में यूपी या बिहार के शूटर शामिल हो सकते हैं. इसी इनपुट के सहारे पुलिस यूपी और बिहार को कनेक्ट करने वाले रूट पर लगे सीसीटीवी कैमरों की मोनिटरिंग कर रही थी. पुलिस को शूटआउट के सही वक्त का भी पता था. ऐसे में पुलिस ने अंदाजा लगाया कि अगर शूटर इस कार में बैठ कर बंगाल पहुंचे, तो उन्होंने कितने समय पहले बंगाल में एंटर किया होगा. इसी आधार पर पुलिस ने कुछ बॉर्डर्स पर फोकस किया. इस कोशिश में पुलिस को हावड़ा के करीब बाली टोल प्लाज़ा की जानकारी मिली, जहां से ये कार मौका-ए-वारदात की तरफ बढ़ी थी.
और बस यहीं से पुलिस को इस शूटआउट का सबसे बड़ा क्लू मिला. टोल प्लाज़ा में कार की तस्वीरें तो खैर कैद हुई ही थीं, पता चला कि शूटरों ने यहां फास्टैग या कैश की जगह यूपीआई के जरिए टोल का पेमेंट किया था. अब पुलिस इस यूपीआई की गहराई में उतरी और उससे जुड़े मोबाइल नंबर और बैंक डिटेल्स की जानकारी जुटाई और कडी दर कड़ी जोड़ती हुई आखिर राज सिंह, मयंक राज मिश्रा और विक्की मौर्या तक जा पहुंची.
अब सवाल ये है कि पुलिस को इस कार की रिवर्स सर्चिंग का ख्याल कैसे आया? क्यों पुलिस ने वारदात के बाद बाइक से भागे शूटरों के फुटेज वगैरह का पता करने की जगह पीछे मुड़ कर तफ्तीश करने का फैसला किया? तो इसका जवाब है कि शूटरों ने अपनी शातिराना चाल से खुद ही पुलिस को ऐसा करने के लिए मजबूर कर दिया. आपको पता है कि शूटर अपनी कार मौका-ए-वारदात पर ही छोड़ कर दो बाइक में बैठ कर फरार हो गए थे. लेकिन उन्होंने दोनों ही बाइकों को मौका-ए-वारदात से कुछ किलोमीटर के फासले पर लावारिस छोड़ दिया था. ऐसे में शूटर इसके आगे किसी प्राइवेट गाड़ी से निकले या उन्होंने पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल किया, ये पता करना एक मुश्किल काम था.
उधर, कार पर लगे नकली नंबर प्लेट के सहारे जब पुलिस सिलिगुड़ी पहुंची तो पता चला कि कार के मालिक विलियम जेम्स ने अपनी निसान माइक्रा कार को कुछ रोज़ पहले बिक्री के इरादे से ओएलएक्स पर डाला था. समझा जाता है कि यहीं शूटरों को ये पता चला कि अमूक नंबर की निसान माइक्रा कार बिक्री के लिए उपलब्ध है. अब शूटरों के पास निसान माइक्रा पहले से ही थी, तो उन्होंने वही नकली नंबर अपनी निसान माइक्रा पर लगा लिया, जिससे उन्हें शूटआउट को अंजाम देना था.
ऐसे में पुलिस कार के जेनुइन मालिक तक तो पहुंच गई, लेकिन जिस कार से वारदात को अंजाम दिया गया, उसके मालिक तक पहुंचना तकरीबन नामुमकिन सी बात थी. क्योंकि शूटरों ने वारदात को अंजाम देने से पहले ना सिर्फ उसका नंबर चेंज किया था, बल्कि का चेसिस नंबर तक घिस दिया था. लिहाजा अब पुलिस के पास एक रास्ता था और वो था वारदात को अंजाम देने से पहले कार जिस रास्ते से आई, उसकी रूट मैपिंग करना और इसी कोशिश में पुलिस को कामयाबी मिल गई.
हालांकि शूटआउट में शामिल होने के इल्जाम में अयोध्या से पकड़े गए बलिया के राज सिंह को लेकर और कहानी सामने आई है. जानकारी के मुताबिक राज सिंह सभासद का चुनाव लड़ चुका है और बाहुबलियों के साथ उठने-बैठने का शौकीन रहा है. यूपी के कई बाहुबलियों के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आ चुकी हैं, जबकि कत्ल के एक मामले में उसका नाम भी आ चुका है. लेकिन चंद्रनाथ रथ की हत्या में उसकी असली भूमिका का सामने आना अभी बाकी है.
वैसे तो बंगाल पुलिस ने इस मामले पर अभी अपना मुंह सी रखा है, लेकिन राज सिंह की मां जामवंती देवी ने अपने बेटे को बेकसूर बताते हुए पुलिस से गुहार लगाई है. उनका कहना है कि वो 7 मई को अपने बेटे के साथ लखनऊ गई थी, इसके बाद 8 मई को वो किचौड़ा गए और 9 मई को अयोध्या पहुंचे. इसी दिन एसओजी ने उनके बेटे राज सिंह को उठा लिया और अगले दिन बंगाल वाले केस में उसकी गिरफ्तारी दिखाई. राज सिंह की मां का कहना है कि इस बात से ये साफ होता है कि उनके बेटे का इस मामले में कोई रोल नहीं है.
अब राज सिंह की मां की इस थ्योरी पर यकीन करें, तो फिजिकली राज सिंह का मौका-ए-वारदात पर मौजूद होना थोड़ा मुश्किल लगता है. क्योंकि अगर वारदात 6 मई की रात हुई है, तो 7 मई की सुबह उसका बलिया में होना अपने परिवार के साथ होना मुश्किल लगता है. लेकिन इससे ये साबित नहीं होता कि उसकी इस केस में कोई भूमिका नहीं है. मुमकिन है कि उसका इस केस में रोल किसी लाइनर या फेसलिटेटर का हो. हालांकि पश्चिम बंगाल की पुलिस ने फिलहाल राज सिंह की भूमिका को लेकर साफ-साफ तो कुछ नहीं कहा है, लेकिन जिस तरह राज सिंह समेत तीन को गिरफ्तार कर रिमांड पर लिया गया है, उससे इशारा मिलता है कि इस मामले में उनका कोई ना कोई रोल जरूर है.
इस केस में फिलहाल पुलिस ने तीन आरोपियों को धर दबोचा है, लेकिन तीनों की गिरफ्तारी से साफ है कि ये इस केस के मास्टमाइंड नहीं है. शूटआउट के तौर तरीके से ये बात पहले ही दिन से साफ थी कि ये कत्ल सोची समझी साजिश के तहत किराये के कातिलों के जरिए करवाया गया. ऐसे में वो शख्स कौन है, जिसने चंद्रनाथ के कत्ल की सुपारी दी, फिलहाल पुलिस इसका पता लगाना चाहती है. अब तक की खबरों के मुताबिक इस केस में कम से कम 7 से 8 लोगों के शामिल होने का शक भी बंगाल पुलिस को है. एसआईटी को लगता है कि जिस तरह से इस वारदात को अंजाम दिया गया, उससे लगता है कि इस प्लानिंग कम से कम एक से डेढ़ महीना पहले से की जा रही थी.
वरना रात के अंधेरे में बीच सड़क पर पूरी तैयारी से ना तो उनकी गाड़ी को घेर कर रोका जाता और ना ही उन्हें निशाना बना कर बिल्कुल प्वाइंट ब्लैंक रेंज से फायरिंग की जाती. खबरों के मुताबिक चंद्रनाथ के कत्ल के लिए कातिलों ने कम से कम दस गोलियां चलाईं, जिनमें से 3 गोलियां चंद्रनाथ को लगीं. चंद्रनाथ रथ की हत्या को जिस तरह से अंजाम दिया गया, वो कातिलों की हताशा और उनकी बेसब्री को दिखाता है. कातिलों ने पहले उनकी रेकी की, दूर तक पीछा किया, बीच सड़क पर उनकी गाड़ी रोकी और फिर प्वाइंट ब्लैंक रेंज से ताबड़तोड़ गोलियां चला कर उनकी जान ली.
और तो और तैयारी के तौर पर कत्ल में इस्तेमाल एक कार और दो बाइक के नंबर प्लेट तक पहले ही चेंज कर दिए. ये चंद्रनाथ की डेस्पैरेट किलिंग यानी हर हाल में की गई हत्या की तरफ इशारा करती है. यानी कातिल चाहते थे कि चंद्रनाथ किसी भी कीमत पर बच ना पाएं. उनकी हर हाल में मौत हो. कोई भी कातिल ऐसा तभी करता है, जब वो सुपारी लेकर किसी काम को अंजाम दे रहा हो और पूरी तरह कमिटेड हो. या फिर मकतूल से ऐसी भयानक रंजिश रखता हो कि उसे किसी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहता हो. अचानक हुए झगड़े या सियासी खेमेबाजी में हुए कत्ल में इस तरह का डेस्पैरेशन यानी बेसब्री नहीं दिखता.
(सुप्रतिम बनर्जी के साथ लखनऊ में संतोष शर्मा और कोलकाता से तापस सेनगुप्ता का इनपुट)
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