भारत में अपना पहला घर खरीदने का सपना देख रहे लोग सालों से एक ही उम्मीद में बैठे हैं कि शायद प्रॉपर्टी के दाम गिरेंगे और वे घर खरीदेंगे, लेकिन 2026 की हकीकत कुछ अलग नजर आ रही है. प्रॉपर्टी की कीमतें कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही हैं, और अब विशेषज्ञों का कहना है कि "बाजार गिरने" का इंतजार करना शायद एक बड़ी गलती साबित हो सकता है.
चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस बदलाव की ओर इशारा किया है. उनका तर्क है कि भारत का रियल एस्टेट अब सिर्फ दिखावे की तेजी या पूरे शहर के औसत दामों पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े छोटे-छोटे बाजारों का खेल बन चुका है.
नितिन कौशिक ने लिखा, "अगर आप अपना पहला घर खरीदने के लिए रियल एस्टेट में 'बड़ी गिरावट' का इंतजार कर रहे हैं, तो शायद आप गलत नक्शा देख रहे हैं." उन्होंने आगे कहा कि सालाना 5% की औसत बढ़ोतरी की बात सुनने में तो अच्छी लगती है, लेकिन यह जमीनी हकीकत को पूरी तरह नहीं दिखाती.
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पहला घर खरीदने का सही समय कब?
नितिन कौशिक ने एयरपोर्ट के पास होने वाले विकास को एक सटीक उदाहरण के रूप में पेश किया है, उनके अनुसार, नवी मुंबई और नोएडा के जेवर में बन रहे नए अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों के आसपास की संपत्तियों के दामों में जबरदस्त तेजी आई है. उदाहरण के तौर पर, पनवेल और यमुना एक्सप्रेसवे जैसे इलाकों में कीमतों में 15-20% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. खास बात यह है कि यह बढ़त केवल सट्टेबाजी की वजह से नहीं, बल्कि वहां बढ़ते रोजगार और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण हुई है.
इसी तरह का बदलाव बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी दिख रहा है, जहां अब विकास का केंद्र केवल पुराने आईटी कॉरिडोर नहीं रह गए हैं. कौशिक बताते हैं कि अब ध्यान उत्तर बेंगलुरु की ओर शिफ्ट हो गया है, जहां बेहतर कनेक्टिविटी के कारण हेब्बल और देवनहल्ली जैसे इलाके शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं. वहीं गुरुग्राम में द्वारका एक्सप्रेसवे, जो कभी देरी की वजह से अटका हुआ था, अब हकीकत बन चुका है और इसके आसपास के आवासीय प्रोजेक्ट्स की कीमतों में सालाना लगभग 19% की वृद्धि देखी गई है.
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टियर 2 शहर बन रहे हैं विकल्प
महानगरों में घर खरीदने की क्षमता से बाहर हो चुके लोगों के लिए अब टियर-2 शहर एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहे हैं. लखनऊ, इंदौर और नागपुर जैसे शहरों में न केवल मांग बढ़ रही है, बल्कि यहां घर खरीदना भी सस्ता है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन शहरों में किराये से होने वाली आय (रेंटल यील्ड) 6-7% तक पहुंच गई है, जो मुंबई के 3% से भी कम के औसत के मुकाबले कहीं ज्यादा आकर्षक है.
नितिन कौशिक हाउसिंग मार्केट के भीतर एक बड़े विभाजन या 'टू-स्पीड मार्केट' की ओर भी इशारा करते हैं. साल 2026 में रियल एस्टेट अब "खरीदो और भूल जाओ" वाला निवेश नहीं रह गया है. आज बाजार स्पष्ट रूप से दो हिस्सों में बंट गया है एक तरफ शानदार प्रोजेक्ट्स हैं और दूसरी तरफ बाकी साधारण संपत्तियां. कौशिक के अनुसार, किसी विकसित होते कॉरिडोर में बड़े और नामी बिल्डर द्वारा बनाई गई गेटेड कम्युनिटी के फ्लैट की कीमत 12-14% की दर से बढ़ रही है, जबकि पास ही में बनी सामान्य और अकेली इमारतों में यह बढ़त 4% को पार करने के लिए भी संघर्ष कर रही है.
लोग ब्रांड पर कर रहे हैं भरोसा
अब खरीदार कम जाने-पहचाने बिल्डर्स द्वारा दिए जाने वाले डिस्काउंट के झांसे में नहीं आ रहे हैं. वे कम कीमत के बजाय ब्रांड पर भरोसा, प्रोजेक्ट के समय पर पूरा होने और भविष्य की सुख-सुविधाओं को अधिक महत्व दे रहे हैं. यही वजह है कि ब्रांडेड प्रोजेक्ट्स तेजी से बिक रहे हैं, जबकि खराब योजना वाले प्रोजेक्ट्स बिना बिके खाली पड़े हैं.
इसके साथ ही निवेश के तर्क में भी एक बड़ा बदलाव आया है. अधिकांश महानगरों में किराये से होने वाली कमाई संपत्ति की बढ़ती कीमत के मुकाबले पीछे छूट गई है. कौशिक का तर्क है कि आज के खरीदार तुरंत मिलने वाले किराये के बजाय भविष्य में संपत्ति को बेचने पर मिलने वाली कीमत को ध्यान में रखकर खरीदारी कर रहे हैं. उन्होंने जोर देते हुए कहा, "2026 में आप किराये के लिए घर नहीं खरीदते, बल्कि भविष्य में उसे मिलने वाली ऊंची कीमत के लिए खरीदते हैं. " उनका मानना है कि पूरे शहर के औसत रुझान को देखकर निवेश करना अक्सर औसत या निराशाजनक रिटर्न ही देता है.
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