भारत में निवेश के दो सबसे बड़े और पारंपरिक स्तंभ रहे हैं सोना और जमीन, हमारे देश में सदियों से लोग निवेश के नाम पर सोना खरीदते हैं या जमीन में पैसे लगाते हैं. खास बात ये है कि दोनों ही आम लोगों के बजट से बाहर होते जा रहे हैं. लेकिन रविवार को पीएम मोदी के एक साल तक सोना न खरीदने की अपील के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या अब लोग निवेश के लिए रियल एस्टेट सेक्टर का रूख करेंगे.
पीएम की इस अपील का सीधा उद्देश्य भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है. लेकिन इस अपील ने निवेशकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. अगर 'गोल्ड' की चमक कम होती है, तो क्या भारतीय मध्यम वर्ग का पैसा अब रियल एस्टेट में लगेगा.
भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, हमारी जरूरतों का लगभग 90% सोना विदेशों से आयात किया जाता है, जिसके भुगतान के लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. पीएम मोदी का तर्क है कि यदि लोग एक साल तक सोने की खरीद टाल दें, तो यह पैसा देश के भीतर रहेगा और विकास कार्यों में काम आएगा.
यह भी पढ़ें: चीन में घर 20 साल पुराने भाव पर, क्या भारत में भी आएगा रियल एस्टेट संकट?
रियल एस्टेट की ओर निवेश का झुकाव क्यों?
वोमेकी ग्रुप के फाउंडर और चेयरमैन गौरव के सिंह का कहना है 'भारत में निवेश की पारंपरिक धारणाओं में एक बड़ा बदलाव आ रहा है. सदियों से 'सेफ हेवन' माने जाने वाले सोने के प्रति निवेशकों का नजरिया अब बदल रहा है. यदि निवेशक केवल एक साल के लिए भी सोने से दूरी बनाते हैं, तो इसका सीधा और सकारात्मक असर रियल एस्टेट सेक्टर पर पड़ेगा. आज का खरीदार महज बचत नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ठोस 'रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट' चाहता है. बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, एक्सप्रेसवे और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स ने प्रॉपर्टी को सोने की तुलना में अधिक आकर्षक बना दिया है. खास तौर पर मिडिल क्लास और युवा निवेशक अब जमीन और घर को अपनी वित्तीय सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ मान रहे हैं. '
सोने में निवेश न करने की स्थिति में रियल एस्टेट सबसे स्वाभाविक विकल्प बनकर उभरता है. भारतीय निवेशक उन संपत्तियों पर अधिक भरोसा करते हैं जिन्हें वे देख और छू सकते हैं. सोने की तरह, जमीन भी एक भौतिक संपत्ति है जो सुरक्षा का एहसास देती है.
प्रतीक ग्रुप के एमडी प्रतीक तिवारी का कहते हैं- 'भारत में निवेश का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है. पहले लोग सोने में निवेश करते थे, लेकिन अब नई पीढ़ी प्रॉपर्टी में निवेश करना पसंद कर रही है. अगर गोल्ड में निवेश एक साल तक कम होता है तो उसका सीधा फायदा हाउसिंग सेक्टर को मिल सकता है. खासकर रेडी-टू-मूव और प्रीमियम प्रोजेक्ट्स में निवेश बढ़ने की संभावना ज्यादा रहेगी, क्योंकि लोग अब सिर्फ सुरक्षित निवेश नहीं बल्कि बेहतर लाइफस्टाइल भी चाहते हैं.'
यह भी पढ़ें: क्या काले धन को खपाने का जरिया है रियल एस्टेट, रेरा पर क्यों नहीं है लोगों को भरोसा!
एचसीबीएस डेवलपमेंट्स के ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर सौरभ सहारन का मानना है ' सोना केवल वैल्यू स्टोर करता है, जबकि प्रॉपर्टी से किराया और एसेट वैल्यू में बढ़ोत्तरी जैसे कई लाभ मिलते हैं.' सहारन का तर्क है कि यदि लोग एक साल के लिए सोने में निवेश कम करते हैं, तो बढ़ते इंफ्रास्ट्रक्चर के इस दौर में रियल एस्टेट निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक और भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरेगा.'
अग्रशील इंफ्राटेक की सीईओ प्रेक्षा सिंह कहती हैं - 'अगर एक साल तक लोग गोल्ड में निवेश कम करते हैं, तो उसका बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट की तरफ आ सकता है. खासकर दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और नोएडा जैसे शहरों में लोग अब ऐसी प्रॉपर्टी तलाश रहे हैं, जहां उन्हें सिर्फ संपत्ति नहीं बल्कि नियमित रिटर्न और भविष्य में कीमत बढ़ने का फायदा भी मिले'.
ट्रेवॉक के मैनेजिंग डायरेक्टर गुरपाल सिंह चावला का कहना ' निवेशक अब सोने के बजाय अधिक स्थिर और दीर्घकालिक मूल्य देने वाली संपत्तियों को प्राथमिकता दे रहे हैं.' चावला के अनुसार, यदि सोने की मांग घटती है, तो बेहतर लोकेशन और मजबूत रिटर्न की संभावना वाले प्रोजेक्ट्स निवेशकों के लिए पहली पसंद बनकर उभरेंगे.
यह भी पढ़ें: 'सोना ना खरीदें...' आसान भाषा में समझिए देश में डॉलर बचाने को क्यों कह रहे पीएम मोदी?
एमआरजी ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर रजत गोयल का कहना है 'अब लोग केवल पैसा सुरक्षित रखने के लिए निवेश नहीं करते, बल्कि ऐसी संपत्ति चाहते हैं जिसकी कीमत समय के साथ तेजी से बढ़े.' उनके अनुसार, रियल एस्टेट की खूबी यह है कि इसमें रहने के साथ-साथ किराये से कमाई का दोहरा लाभ मिलता है. रजत गोयल मानते हैं कि दिल्ली-एनसीआर और गुरुग्राम जैसे इलाकों में बेहतर सड़कों और सुविधाओं के कारण प्रॉपर्टी की डिमांड बढ़ी है, जिससे यह सेक्टर निवेशकों के लिए भविष्य का सबसे पसंदीदा विकल्प बनता जा रहा है.
तेजी से बढ़ रहे हैं प्रॉपर्टी के रेट
2025-26 के रुझान बताते हैं कि दिल्ली-NCR, मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में प्रॉपर्टी की कीमतों में 15-20% की वार्षिक वृद्धि देखी गई है, जो सोने के औसत रिटर्न (लगभग 10-12%) से कहीं अधिक है. सोना लॉकर में पड़ा रहता है, लेकिन एक फ्लैट या दुकान हर महीने किराया देता है. यह 'पैसिव इनकम' मध्यम वर्ग के लिए महंगाई से लड़ने का एक बड़ा हथियार है.
मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में घर खरीदना अब औसत आय वाले व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है. मुंबई में एक 2BHK की कीमत आय के मुकाबले 15 गुना तक पहुंच गई है. ऐसे में, जो लोग पहले ₹1-2 लाख का सोना खरीदते थे, वे सीधे फ्लैट तो नहीं खरीद सकते, लेकिन वे REITs (Real Estate Investment Trusts) और फ्रैक्शनल ओनरशिप (Fractional Ownership) की ओर मुड़ रहे हैं.
यह डिजिटल रियल एस्टेट निवेश का एक ऐसा तरीका है, जहां आप कम पैसों में भी बड़ी कमर्शियल प्रॉपर्टी के हिस्सेदार बन सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम की अपील के बाद रियल एस्टेट सेक्टर के लिए यह एक सुनहरा मौका है. देश में इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो रहा है. नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट , द्वारका एक्सप्रेसवे और कोस्टल रोड (मुंबई) जैसे प्रोजेक्ट्स ने आस-पास की जमीनों की कीमतों को रातों-रात बढ़ा दिया है. यदि कोई निवेशक एक साल तक सोना नहीं खरीदता, तो वह उस पैसे को किसी उभरते हुए शहर में 'रेजिडेंशियल प्लॉट' के डाउन पेमेंट के तौर पर इस्तेमाल करना ज्यादा फायदेमंद समझेगा.
यह भी पढ़ें: स्पेन में मिल रहा है मुफ्त में घर, जॉब का भी ऑफर, बस पूरी करनी होगी एक शर्त
स्मिता चंद