प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपील की है कि कुछ वक्त सोना खरीदने से बचना चाहिए. साथ ही पीएम मोदी ने पेट्रोल-डीजल की खपत कम करते हुए वर्क फ्रॉम होम को बढ़ाने पर जोर दिया है. पीएम मोदी की इन सभी अपील की पीछे की वजह है विदेशी मुद्रा यानी फॉरेक्स का ज्यादा से ज्यादा बचाना. इसके बाद से लोगों के मन में सवाल है कि आखिर विदेशी मुद्रा बचाने के पीछे की वजह क्या है, क्यों ऐसा करने पर जोर दिया जा रहा है और ऐसा करने से हमारा क्या फायदा होगा... तो समझते हैं आखिर विदेशी मुद्रा को बचाने की बात क्यों कही जा रही है.
पहली नजर में ये बातें आम अपील लग सकती हैं, लेकिन इसके पीछे देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी बड़ी चिंता छिपी है. दरअसल, भारत उन देशों में शामिल है, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. चाहे कच्चा तेल हो, सोना हो या इलेक्ट्रॉनिक सामान... इन सबके लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है. जैसे भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का 90 फीसदी आयात करता है.
साथ ही, भारत दुनिया के सबसे बड़े सोने के आयातकों में से एक है. इसका मतलब है कि इन चीजों को खरीदने के लिए भारत दूसरे देशों को डॉलर में भुगतान कर रहा है. अब जब ये सामान ज्यादा खरीदा जाएगा तो आयात बढ़ेगा और देश का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से खर्च होने लगेगा. अब सरकार इस विदेशी मुद्रा से खर्चे को कम करने की कोशिश कर रही है.
विदेशी मुद्रा आखिर होती क्या है?
पहले आपको बता दें कि भारत किसी दूसरे देश से सामान खरीदता है तो भुगतान भारतीय रुपये में नहीं, बल्कि ज्यादातर अमेरिकी डॉलर में करता है. भारत के पास जो डॉलर, यूरो, पाउंड जैसी विदेशी करेंसी का भंडार होता है, उसे विदेशी मुद्रा भंडार या फॉरेक्स रिजर्व कहा जाता है.
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में संकट आता है, तेल महंगा होता है और रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब यही विदेशी मुद्रा देश को संभालने का काम करती है. अभी कुछ ऐसी ही स्थिति है. साथ ही अभी डॉलर के मुकाबले रुपया भी काफी कमजोर है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक अनिश्चितता के बीच मंगलवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 95.50 पर पहुंच गया.
इस उदाहरण से समझिए...
इस पूरे मसले को आसान भाषा में समझने के लिए एक देश को परिवार की तरह समझिए. मान लीजिए कि एक परिवार की कमाई 1 लाख रुपये है, लेकिन अब पेट्रोल के रेट बढ़ गए तो इस कमाई का बड़ा हिस्सा पेट्रोल पर खर्च होने लगा और फैमिली की बचत कम होने लगी. इससे फैमिली के घर चलाने में मुश्किल आने लगेगी और या तो कर्ज बढ़ेगा या सेविंग कम होगी. अब देश के स्तर पर समझें तो भारत निर्यात आदि कई तरीके से डॉलर कमाता है.
लेकिन, जब तेल और सोना, बहुत महंगा हो जाता है, तो देश में आने वाले डॉलरों की तुलना में देश से बाहर जाने वाले डॉलरों की संख्या अधिक हो जाती है. इससे चालू खाता घाटा बढ़ जाता है. अब जब रुपया कमजोर है तो ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है और जब डॉलर की मांग बढ़ती है तो पैसा और ज्यादा कमजोर हो जाता है.
रुपया कमजोर होने से 100 डॉलर के भुगतान के लिए 95 के हिसाब से भुगतान करना होगा, अगर ये कम होता तो कम पैसे देने पड़ते. वैसे तो रुपया कमजोर हो जाए और भाव ना बढ़े तब भी एक्स्ट्रा पैसा देना पड़ता है और अभी दोनों स्थिति है. भाव भी बढ़ रहे हैं और रुपया भी कमजोर है. ऐसे में ज्यादा नुकसान की स्थिति है.
इस वजह से सरकार की ओर से कहा जा रहा है कि आयात वाली चीजों का इस्तेमाल कम किया जाए ताकि डॉलर में भुगतान कम करना पड़े. इससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर ज्यादा असर ना पड़े.
विदेशी मुद्रा बचेगी तो क्या होगा?
अगर देश के पास पर्याप्त डॉलर होते हैं तो रुपये पर दबाव कम पड़ता है. लेकिन, डॉलर की कमी होने लगे तो रुपया कमजोर होने लगता है. अगर आयात कम होगा तो रुपया भी मजबूत होगा और इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ता है. इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें नियंत्रित रहेंगी. अगर डॉलर महंगा हो जाए तो तेल खरीदना भी महंगा हो जाता है.
इसके साथ ही अगर किसी युद्ध, महामारी या वैश्विक मंदी जैसी स्थिति आ जाए तो विदेशी मुद्रा भंडार देश के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है. जिन देशों के पास बड़ा फॉरेक्स रिजर्व होता है, उन्हें वैश्विक बाजार ज्यादा भरोसेमंद मानता है. इसलिए भारत की साख को बचाए रखने के लिए भी ये जरूरी है.
क्या ये किसी बड़े आर्थिक संकट का संकेत है?
ऐसा नहीं है कि भारत किसी तत्काल आर्थिक संकट में है. लेकिन, दुनिया में इस समय कई तरह की अनिश्चितताएं हैं. मिडिल ईस्ट में हो रही जंग, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याओं का असर भारत पर भी पड़ सकता है. ऐसे में सरकार अभी से लोगों को सतर्क रहने और गैर-जरूरी आयात कम करने का संदेश दे रही है.
विदेशी मुद्रा बचाना सिर्फ सरकार या रिजर्व बैंक की जिम्मेदारी नहीं होती. आम लोगों की आदतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. कम ईंधन खर्च करना, गैर-जरूरी आयातित सामान से बचना और घरेलू उत्पादों को बढ़ावा देना सीधे देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करता है.
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