अपना खुद का घर खरीदना हर व्यक्ति का एक बड़ा सपना होता है. अक्सर आप सोशल मीडिया पर नए-नए प्रोजेक्ट के ऐड देखते हैं, जिसमें आपसे कई लुभावने दावों के साथ किफायती घर दिलाने का वादा किया जाता है, साथ ही इस तरह से प्रचार किया जाता है कि अभी नहीं खरीदा तो कभी नहीं. हम मान लेते हैं कि हमारा बजट और हमारी जरूरतें बस इसी प्रोजेक्ट से पूरी होंगी. लेकिन हकीकत इससे कोसों दूर होती है. रियल एस्टेट की दुनिया में एक शब्द बहुत प्रचलित है 'ऑल-इनकॉस्ट'.
अक्सर घर खरीदार केवल फ्लैट की बेस प्राइस को ही अंतिम कीमत समझ लेते हैं, लेकिन जब कागजी कार्रवाई और पजेशन का समय आता है, तो जेब पर 15% से 25% तक का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाता है. आइए जानते हैं उन छिपे हुए खर्चों के बारे में, जिनका जिक्र बिल्डर अक्सर आखिरी समय में करता है.
स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज: यह किसी भी घर की खरीद का सबसे बड़ा अतिरिक्त खर्च है. सरकार अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर स्टाम्प ड्यूटी वसूलती है. यह अलग-अलग राज्यों में प्रॉपर्टी की कुल वैल्यू का 4% से 8% तक हो सकता है, इसके अलावा, 1% रजिस्ट्रेशन फीस भी देनी होती है. उदाहरण के लिए अगर आप 50 लाख का घर खरीद रहे हैं, तो केवल सरकारी शुल्क ही 3 से 4 लाख रुपये तक हो सकता है, जिसका उल्लेख बिल्डर के शुरुआती विज्ञापन में नहीं होता.
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जीएसटी (GST) का गणित: अगर आप 'अंडर-कंस्ट्रक्शन' प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं, तो आपको जीएसटी देना होगा. रेडी-टू-मूव फ्लैट्स पर जीएसटी नहीं लगता. सामान्य घरों पर यह 5% और किफायती घरों पर 1% होता है. हालांकि, बिल्डर इसे अक्सर अंतिम कोटेशन में जोड़ते हैं. बिल्डर आपसे पजेशन के समय 1 से 2 साल का एडवांस मेंटेनेंस शुल्क मांग सकते हैं. इसके अलावा, एक 'सिंकिंग फंड' (भी जमा कराया जाता है, जिसका उपयोग भविष्य में बिल्डिंग की बड़ी मरम्मत के लिए होता है. विज्ञापन में इसे कभी नहीं दिखाया जाता, लेकिन चाबी मिलने से पहले यह एक मुश्त बड़ी रकम (50,000 से 2 लाख रुपये तक) हो सकती है.
पार्किंग और पीएलसी: क्या आपको लगता है कि फ्लैट के साथ पार्किंग मुफ्त है? अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं है. प्रमुख शहरों में एक कार पार्किंग स्लॉट की कीमत 2 लाख से 10 लाख रुपये तक हो सकती है.
अगर आपका फ्लैट किसी खास दिशा में है, तो बिल्डर आपसे पीएलसी के नाम पर प्रति वर्ग फुट अतिरिक्त चार्ज वसूलता है. यह बेस प्राइस को 10-15% तक बढ़ा सकता है.
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बिल्डर की चालाकी से कैसे बचें?
किसी भी प्रोजेक्ट में निवेश करने से पहले उस राज्य की RERA (Real Estate Regulatory Authority) वेबसाइट पर प्रोजेक्ट का विवरण देखें. बिल्डर को वहां सभी खर्चों का खुलासा करना अनिवार्य है. साइन करने से पहले एग्रीमेंट के बारीक अक्षरों को पढ़ें. देखें कि क्या वहां 'अतिरिक्त शुल्क' जैसा कोई कॉलम है. वहीं हमेशा कारपेट एरिया के आधार पर कीमत की तुलना करें, न कि सुपर बिल्ट-अप एरिया के आधार पर.
एक स्मार्ट खरीदार वही है जो घर की बेस प्राइस में 20% का मार्जिन लेकर चले. अगर बिल्डर आपको सभी खर्चों की ब्रेक-अप लिस्ट देने में कतराता है, तो समझ लीजिए कि दाल में कुछ काला है,
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